तालचेर क्षेत्र की प्राणवायु में घुल रहा है जहर
अनुराग आचार्य (व्यौरोचीफ)
तालचेर क्षेत्र की प्राणवायु में घुल रहा है जहर। पर्यावरण संरक्षण पर करोड़ों रुपये खर्च किस काम के ?
तालचेर क्षेत्र में प्रदुषण का वर्चस्व दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
जिसके कारण वातावरण ने जीवन को कठिन बना दिया है,लोगो को अब सांस लेने में भी कठिनाई हो रही है। दम घुटने वाली हवा ने अब यहां सांस लेने की आपात स्थिति पैदा कर दी है। हवा इतनी खराब है कि तालचेर का पूरा इलाका एक तरह का गैस चैंबर माना जाता है। इससे केंद्र सरकार ने विभिन्न योजनाओं में करोड़ों रुपये का आदान-प्रदान किया है, और वृक्षारोपण आदि को केवल कागजों तक ही सीमित रखा जा रहा है, जिससे पर्यावरणविदों के बीच चिंताजनक स्थिति पैदा हो गई है। तालचेरे को वन क्षेत्र माना जाता था। लेकिन अब ओडिशा एक औद्योगिक शहर तालचेर के रूप में पूरे भारत में जाना जाता है। अतीत में, हजारों लोग प्राकृतिक संसाधनों से बने आवास में जंगलों के बीच रहते थे और इसी तरह उन जंगलों में रहने वाले जंगली जानवर भी थे। ब्राह्मणी नदी के किनारे आज भी
प्राकृतिक सुंदरता को देखा जा सकता है। इस प्रकृति के कारण यहां बसने वाले लोगों की स्वास्थ्य स्थिति हमेशा अच्छी रहती थी।
लेकिन जिस दिन से कोयले की खदानों को सामने लाया गया और खुदाई शुरू की गई उस दिन से इस क्षेत्र और उसके आसपास के क्षेत्र प्रदूषित होना शुरू हो गए। उस दिन से नभ,जल और भूमि पर काले बादल मंडराने लगे हैं, और पर्यावरण नष्ट होता जा रहा है। वहीं, प्लास्टिक कचरे (प्लास्टिक कचरे) ने पर्यावरण के प्रदूषण को दोगुना कर दिया है। इसके अनुपात में स्थानीय लोग हृदय रोग, टीवी कैंसर, त्वचा रोग, अस्थमा जैसी घातक बीमारियों से पीड़ित हैं, और उनमें से कुछ की मृत्यु हो गई, जबकि अन्य लोगो ने अपनी बिमारी में अपनी जमा पूँजी खर्च कर दिया है,और अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जबकि केंद्र सरकार एमसीएल से हजारों करोड़ का राजस्व ले रही है, विशेष रूप से प्रभावित इलाकों के लिए ऐसी कोई बुनियादी स्वास्थ्य प्रणाली नहीं है। पुरानी स्थिति में वापस लाने के लिए ताजी हवा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना होगा, यहां की संस्थाओ से निकलने वाले अपशिष्ट बिषैले पानी को नालो के माध्यम से ब्राह्मणी नदी में ना छोड़कर उसे छानकर (फिल्टर कर) पुनः प्रयोग करने।
विभिन्न उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाली हानिकारक गैसों को परिष्कृत करने से प्रदुषण को रोका जा सकता है। पर्यावरणविदों ने भी यही राय व्यक्त की है कि इससे प्रदुषण को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। अगर केंद्र सरकार इस पर सख्ती करे तो प्रदुषण पर काबू पाया जा सकता है।





