झाड़ू मारकर भुगतान जिला पंचायत बस्ती में भ्रष्टाचा का खुला खेल
बस्ती विकास का पहला पैमाना सड़क है। वही सड़क अगर बनने के साथ ही मिट जाए, तो समझिए कि बजट कागज पर दौड़ा और भ्रष्टाचार जमीन पर। बस्ती जनपद की कप्तानगंज विधानसभा के बेंदीपुर बाजार से बेंदीपुर गांव को जोड़ने वाली सड़क की मरम्मत का हाल यही बयान कर रहा है। काम शुरू हुआ और खत्म भी हो गया, पर सड़क जस की तस। न गिट्टी दिखी, न तारकोल जमा, न रोलर चला। ग्रामीण पूछ रहे हैं: मानक कहाँ गए? जवाब मिलता है: झाड़ू मारकर भुगतान ले लो।
क्या है पूरा मामला
प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिला पंचायत बस्ती द्वारा बेंदीपुर बाजार से बेंदीपुर गांव तक संपर्क मार्ग की मरम्मत का कार्य कराया गया। आरोप है कि ठेकेदार ने नाममात्र का काम कर पूरी धनराशि निकालने की तैयारी कर ली। इस मार्ग से नित्य आवागमन करने वाले समाजसेवी चांदा चौबे निवासी रंगनाथ चौबे, जिन्हें क्षेत्र में बाजा चौबे के नाम से जाना जाता है, ने लिखित शिकायत पंचायतीराज मंत्री को सौंपी और टीएसी यानी तकनीकी परीक्षण समिति से जांच की मांग की।
शिकायत का संज्ञान लेते हुए पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने दो सदस्यीय जांच टीम गठित की। पंचायतीराज विभाग अनुभाग-2 के विशेष सचिव जय प्रकाश पाण्डेय के माध्यम से पत्र जारी कर आजमगढ़ जिला पंचायत के अधिशासी अभियंता और गोंडा जिला पंचायत के अभियंता को मौके पर जाकर जांच कर रिपोर्ट देने को कहा गया।
9 अप्रैल को दोनों अभियंता जांच के लिए बेंदीपुर पहुंचे। शिकायत यह है कि शिकायतकर्ता को पूर्व सूचना नहीं दी गई। फिर भी अधिकारियों की गाड़ी पहुंचते ही ग्रामीण मौके पर एकत्र हो गए और निष्पक्ष जांच की मांग की। ग्रामीणों के दबाव पर जांच शिकायतकर्ता की उपस्थिति में कराई गई।
स्थानीय लोगों के आरोप: तीन बिंदु
1. ठेकेदार-इंजीनियर-अधिकारी की तिकड़ी: ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार, अवर अभियंता/सहायक अभियंता और अपर मुख्य अधिकारी के बीच सांठगांठ है। इसी तिकड़ी पर अध्यक्ष की मौन सहमति का भी आरोप लगाया जा रहा है।
2. ऊपर तक पहुंच का दावा - सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि ठेकेदार का दावा है, "जांचें होती रहती हैं, हमारे फर्म का कोई बालबांका नहीं कर सकता।"
3. वित्तीय वर्ष का खेल - "मार्च अंत में बजट खपाने की हड़बड़ी में कागजी खानापूर्ति कर भुगतान करा लेना। यह प्रवृत्ति केवल एक विभाग तक सीमित नहीं, बल्कि सिस्टम की बीमारी बन चुकी है।
यह सिर्फ एक सड़क की बात नहीं
बेंदीपुर की यह सड़क प्रतीक है। प्रदेश के कई जिलों में जिला पंचायत, पीडब्ल्यूडी, आरईएस, मनरेगा जैसी योजनाओं में “बनी और मिटी” सड़कें आम शिकायत हैं।
चरण क्या होना चाहिए और जमीनी हकीकत क्या है
आगणन- थर्ड पार्टी सर्वे, ट्रैफिक लोड के हिसाब से क्रस्ट डिजाइन कॉपी-पेस्ट एस्टीमेट, पुराने रेट
निविदा- पारदर्शी ई-टेंडर, सक्षम फर्म को काम रिंग बना कर टेंडर मैनेज
कार्यादेश- साइट पर बोर्ड, एमबी बुक अपडेट बोर्ड गायब, एमबी बाद में भरी जाती है
गुणवत्ता- फील्ड लैब, कोर कटिंग, थिकनेस जांच झाड़ू मारकर फोटो, सैंपल बदलना
भुगतान- माप के बाद, टीएसी क्लियरेंस एडवांस/रनिंग बिल पर दबाव
रखरखाव- 3-5 साल की गारंटी क्लॉज गारंटी कागज पर, ठेकेदार गायब
जीरो टॉलरेंस बनाम जीरो एक्शन
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार लगातार “जीरो टॉलरेंस ऑन करप्शन” की बात करती है। भ्रष्टाचार मुक्त, भय मुक्त शासन का नारा बुलंद है। पर जमीनी अमल में ढिलाई दिखती है। जब सड़क बनने के साथ ही खत्म हो जाए और जांच टीमें शिकायतकर्ता को बिना बताए पहुंचें, तो “जीरो टॉलरेंस” नारे तक सिमट जाता है।
सवाल यह नहीं कि सरकार की मंशा क्या है। सवाल यह है कि सिस्टम में बैठे कुछ लोग सरकार की आस्तीन के सांप बन गए हैं। पद पर आसीन जनप्रतिनिधि हों या अधीनस्थ अधिकारी, अगर जवाबदेही तय नहीं होगी, तो नारा और हकीकत के बीच की खाई बढ़ती जाएगी।
कानून क्या कहता है
1. उत्तर प्रदेश पंचायती राज अधिनियम जिला पंचायत के निर्माण कार्यों में मानक विचलन, माप पुस्तिका में गड़बड़ी, और बिना कार्य भुगतान कराना दंडनीय है।
2. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988, संशोधित 2018: लोकसेवक द्वारा अवैध परितोषण या पद का दुरुपयोग संज्ञेय अपराध है।
3. जियो-टैगिंग व थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन शासनादेशों में बार-बार कहा गया कि हर कार्य की जियो-टैग फोटो, प्री-ड्यूरिंग-पोस्ट स्टेज, और स्वतंत्र एजेंसी से जांच अनिवार्य है।
4. टीएसी की भूमिका तकनीकी परीक्षण समिति का गठन इसी लिए है कि गुणवत्ता में खेल न हो। पर टीएसी को सूचना दिए बिना जांच, या शिकायतकर्ता की गैर-मौजूदगी में जांच, पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती है।
बस्ती का संदर्भ: राजनीतिक संकेत भी
बस्ती मंडल राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, नाली, खड़ंजा सीधे वोटर से जुड़ा मुद्दा है। अगर विधानसभा चुनाव से पहले “सड़क बनी नहीं और पैसा निकल गया” की खबरें आम हो जाएं, तो सत्ता विरोधी लहर को हवा मिलती है। विपक्ष को मुद्दा घर बैठे मिल जाता है। इसलिए यह केवल इंजीनियरिंग की विफलता नहीं, राजनीतिक आत्मघात भी है।
आगे का रास्ता: 10 ठोस सुझाव
1. थर्ड पार्टी क्वालिटी ऑडिट अनिवार्य- आईआईटी, एनआईटी, पॉलीटेक्निक के सिविल विभाग से रैंडम सैंपलिंग।
2. जियो-टैग + टाइम-स्टैम्प फोटो: कार्य शुरू, 50%, और पूर्ण होने पर ड्रोन फोटो। पोर्टल पर सार्वजनिक।
3. शिकायतकर्ता की उपस्थिति: किसी भी जांच की 48 घंटे पहले लिखित सूचना शिकायतकर्ता को। वीडियो रिकॉर्डिंग।
4. भुगतान लिंक टू परफॉर्मेंस- थिकनेस, कॉम्पैक्शन, बिटुमेन कंटेंट की लैब रिपोर्ट के बिना अंतिम भुगतान नहीं।
5. गारंटी क्लॉज लागू 3 साल तक टूट-फूट पर ठेकेदार से वसूली। ब्लैकलिस्ट का प्रावधान।
6. ई-एमबी अनिवार्य: माप पुस्तिका ऑनलाइन, डिजिटल सिग्नेचर से। ओवरराइटिंग/कटिंग पर ऑटो फ्लैग।
7. सोशल ऑडिट- ग्राम सभा में कार्य का सोशल ऑडिट। प्रस्ताव पारित होने पर ही सीसी जारी।
8. अधिकारी जवाबदेही : जेई, एई, एक्सईएन की एसीआर से लिंक। दोष सिद्ध होने पर वसूली + विभागीय कार्रवाई।
9. व्हिसल-ब्लोअर सुरक्षा- शिकायतकर्ता की पहचान गोपनीय। धमकी पर तत्काल एफआईआर।
10. डैशबोर्ड पारदर्शिता: जिला पंचायत की वेबसाइट पर हर कार्य का स्टेटस, लागत, ठेकेदार, एमबी, फोटो, लैब रिपोर्ट।
मंत्री और शासन से अपेक्षा
पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने जांच बैठाकर सही कदम उठाया। अब जरूरत है कि जांच रिपोर्ट 15 दिन में सार्वजनिक हो। दोषी चाहे ठेकेदार हो, इंजीनियर हो या कोई अधिकारी — रिकवरी के साथ एफआईआर हो। सिर्फ निलंबन से बात नहीं बनेगी। विशेष सचिव जय प्रकाश पाण्डेय को यह सुनिश्चित करना होगा कि टीएसी जांच “कागजी लीपापोती” न बने।जिला पंचायत अध्यक्ष की भी जिम्मेदारी तय हो। अध्यक्ष नीतिगत मुखिया हैं। अगर “तिकड़ी पर अध्यक्ष की मुहर” का आरोप है, तो अध्यक्ष को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई की सिफारिश करनी चाहिए।
ग्रामीणों की भूमिका
बेंदीपुर के लोगों ने 9 अप्रैल को मौके पर पहुंचकर जो किया, वह लोकतंत्र की ताकत है। हर गांव में 5 जागरूक लोग भी ठान लें, तो “झाड़ू मारकर भुगतान” की संस्कृति खत्म हो सकती है। हर कार्य का बोर्ड पढ़िए, फोटो खींचिए, 1076 पर शिकायत करिए, आईजीआरएस पर दर्ज करिए।
निष्कर्ष: सड़कें वोट से बनती हैं, पर भ्रष्टाचार से मिटती हैं
बेंदीपुर की सड़क बता रही है कि समस्या तकनीकी कम, नीयत की ज्यादा है। जब तक ठेकेदार को लगता रहेगा कि “ऊपर तक पहुंच” से सब मैनेज हो जाएगा, तब तक जीरो टॉलरेंस सिर्फ पोस्टर पर रहेगा। सरकार को चाहिए कि वह एक-दो बड़ी मिसाल कायम करे। रिकवरी, एफआईआर, ब्लैकलिस्टिंग और संपत्ति जब्ती — इन चार कदमों से पूरा सिस्टम लाइन पर आ जाएगा।
वरना समय रहते लगाम नहीं लगी तो बस्ती में भाजपा को आने वाले विधानसभा चुनाव में वही पुराना परिणाम देखना पड़ सकता है। क्योंकि जनता नारे नहीं, सड़क पर चलती है। और अगर सड़क ही नहीं बचेगी, तो वोट भी नहीं बचेगा। बेंदीपुर ने सवाल पूछ लिया है। अब जवाब की बारी शासन की है।





