काले और गोरे अंग्रेज की चिंता क्यों सताती थी अमर शहीद भगत सिंह को
नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)
शहीदे आजम भगत सिंह से एक बार उनके मित्र सुखदेव ने पूछा..अरे भगत तुम इतना उदास क्यों हो,तुम्हे तो खुश होना चाहिए, क्योंकि अब देश की आजादी के दिन दूर नही है।
इस बात पर भगत ने कहा.. *मेरी चिंता आजादी के बाद की स्थितियों को लेकर है,गोरे अंग्रेज देश को छोड़कर चले जायेंगे,लेकिन ये जो काले अंग्रेज(नौकरशाह/नेता/पूंजीपति)है,उनका व्यवहार देश के मेहनतकश गरीब,मजदूर,किसान और मजबूर देशवासियों से कैसा व्यवहार करेंगे??* तब उनके हक की लड़ाई लड़ने के लिए तुम,मैं,पंडित जी,राजगुरु और अशफाक तो नही होंगे न..
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत को करीब नब्बे साल हो गये हैं। आज हम आप इन अमर शहीदों का चित्र पूजन करके खुद को धन्य समझते हैं। लेकिन यथार्थ तो यह है कि हमने इन तमाम अमर शहीदों और उनके सिद्धांतों को पूरी तरह से नकार चुके है।
प्रस्तुत विडियो या इस जैसे दर्जनों घटनाओं को देखकर भगत सिंह जी की चिंता का प्रासंगिक उल्लेख करना जरुरी हो गया है।।
*क्या ऐसी ही आजादी के लिए हमारे शहीदों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था..???*
भगत सिंह कहते थे..*कि क्या फर्क पड़ेगा कि गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज़ सत्ता में आ जाएंगे। लार्ड इर्विन की जगह अगर सर तेज बहादुर सप्रू आ जाएंगे तो भी क्या फ़र्क पड़ेगा? इसलिए देश में राजनीतिक आज़ादी के साथ साथ आर्थिक और सामाजिक आज़ादी भी ज़रूरी है। हमारी लड़ाई केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रह सकती है, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन तक लड़ते रहना जरूरी है। समाज में असमानता और भेदभाव से मुक्ति ज़रूरी है। राष्ट्रमुक्ति का उद्देश्य जनमुक्ति है। देश के लाखों-करोड़ों ग़रीब, किसान, मज़दूर, दलित, सभी कमज़ोर तबक़ों की मुक्ति ही असली आज़ादी होगी। अग्रेजों के चाय जाने और गोरे अंग्रेजों के रह जाने से हालात नहीं बदलेंगे।
इस संबंध में गवर्नर को भगत सिंह जी ने फाँसी से तीन दिन एक पत्र में लिखा था,, कि आप मुझे याने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने उन्हें फाँसी देने के बजाय युद्धबंदी की तरह बंदूक़ से उड़ाए दीजिए....
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क्योंकि हमारा ‘यह युद्ध तब तक चलता रहेगा,जब तक कि शक्तिशाली व्यक्ति भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार जमाए रखेंगे,चाहे ऐसे व्यक्ति आप अंग्रेज़ पूँजीपति,अंग्रेज़ शासक अथवा सर्वथा भारतीय ही क्यों न हों??
भगत सिंह ने इसके आगे कहा था कि आप के जाने के बाद ‘ये लोग( भ्रष्ट भारतीय शासक)आपस में मिलकर लूट का सिलसिला जारी रखेंगे। यदि शुद्ध भारतीय पूँजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का ख़ून चूसा जा रहा हो तब और आज की स्थिति में कोई फ़र्क नहीं रहेगा।’
पत्र के अंत में वह विश्वासपूर्वक एलान करते हैं कि *‘निकट भविष्य में यह युद्ध अंतिम रूप से लड़ा जाएगा और तब यह युद्ध निर्णायक स्थिति में होगा जब साम्राज्यवाद,पूँजीवाद और भ्रष्ट प्रशासनिक व्यव्स्था कुछ समय के मेहमान रह जाएंगे।’
सवाल यह है कि क्या आज के आज़ाद भारत को लेकर भगत सिंह की चिंता नजायज थी??
क्या इस तरह के बेईमान,तानशाह नौकर शाहों और भ्रष्ट जन प्रतिनिधियों के रहते भगत की छेड़ी लड़ाई खत्म हो जानी चाहिए,,या उनके विचारों को भूल जाना चाहिए ?
प्रस्तुत दो चल चित्र देख कर जवाब दीजिए ,क्या यह वही आजाद भारत है, जिसका सपना अमर शहिदो ने देखी थी।
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