विधायकों की वेतन वृद्धि के मामले में चहुँ ओर से घिरा मोहन माझी की सरकार
विधायकों के भारी वेतन वृद्धि से जनअसंतोष, विधायकों द्वारा पुनर्विचार की मांग, केंद्र से मिली फटकार
सतीश शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)
ओड़िशा की गिनती यूँ तो देश के पिछड़े राज्यों में होती है। परंतु एक क्षेत्र में उसने बड़ी छलांग लगाते हुए अपने को देश में सबसे अग्रणी पायदान पर खड़ा कर दिया है। उसने अपने विधायकों-मंत्रियो को गरीबी की यंत्रणा से मुक्त करने के लिए उनके वेतन -भत्तों में तीन गुणा वृद्धि करने का निर्णय किया है। राज्य विधानसभा के शीतकालीन सत्र में 9 दिसंबर को लगभग सर्वसम्मति (एक विधायक को छोड़कर) से पारित चार विधेयकों के जरिए विधायकों, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन व भत्तों में की गई। परंतु माननीयों के वेतन में भारी वृद्धि के बाद उभरे जनाक्रोश को लेकर अब माझी सरकार बड़े असमंजस की स्थिति में फंस गई है।
ओडिशा विधानसभा द्वारा पारित संशोधन विधेयकों के अनुसार विधायकों का मासिक वेतन पैकेज लगभग 1.11 लाख रुपये से बढ़कर 3.45 लाख रुपये हो गया है। मुख्यमंत्री को 3.74 लाख रुपये, उपमुख्यमंत्री को 3.68 लाख रुपये, कैबिनेट मंत्रियों को 3.62 लाख रुपये और राज्य मंत्रियों को 3.56 लाख रुपये प्रतिमाह मिलेंगे। विधानसभा अध्यक्ष का वेतन 3.68 लाख रुपये और उपाध्यक्ष का 3.56 लाख रुपये तय किया गया है। वहीं, नेता प्रतिपक्ष और सरकार के मुख्य सचेतक को 3.62 लाख रुपये प्रतिमाह मिलेंगे। सरकार का तर्क था कि यह वृद्धि आठ साल बाद महंगाई को ध्यान में रखते हुए की गई है। एक ओर सत्ता पक्ष इसे समयानुकूल और आवश्यक कदम बता रहा है, वहीं दूसरी ओर आम जनता इसे महंगाई, बेरोज़गारी और बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे राज्य में असंवेदनशील निर्णय के रूप में देख रही है। विधायकों के वेतन में की गई तीन गुना से अधिक वृद्धि को लेकर जनता और नागरिक संगठनों में तीखी नाराज़गी देखी जा रही है।
नागरिक समाज संगठनों और वाम दलों ने मौजूदा आर्थिक हालात में विधायकों के वेतन में इतनी बड़ी वृद्धि को अनुचित बताते हुए विरोध जताया है। उनका कहना है कि जब राज्य की बड़ी आबादी महंगाई, बेरोज़गारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रही है, तब जनप्रतिनिधियों के वेतन में भारी बढ़ोतरी जनभावनाओं के विपरीत है।
विधानसभा में भी इस विधेयक का विरोध केवल एक भाकपा (माक्र्सवादी) के विधायक लक्ष्मण मुंडा ने किया था।
इस फैसले से 18 महीने पुरानी मोहन माझी सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा है और यह भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भी इस निर्णय से सहमत नहीं है।
केंद्रीय नेतृत्व की फटकार
वेतन वृद्धि प्रस्ताव पारित करवाने के बाद मुख्यमंत्री मोहन माझी को नई दिल्ली बुलाया गया, जहां भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नाराज़गी से अवगत कराया। सूत्रों के अनुसार, इतना बड़ा वेतनवृद्धि का फैसला जनता, अन्य राज्यों के विधायकों और सांसदों के लिए गलत संदेश देने वाला माना गया, क्योंकि सांसदों को इससे कम वेतन और भत्ते मिलते हैं। केंद्रीय नेतृत्व ने यह भी जताया कि पार्टी से परामर्श के बिना लिया गया यह निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नहीं है।
राज्यवासियों में उभरे जनाक्रोश को देखकर अब मुख्य विपक्षी दल बीजू जनता दल अपने पैर पीछे खींच रही है। सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक भी सरकार से निर्णय पर पुनर्विचार करने का आग्रह कर रहे है। इस मुद्दे पर भाजपा विधायक दल की बैठक हुई, जिसमें मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी, मंत्री, विधायक और पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी—प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल शामिल हुए। बैठक में विधायकों के वेतन में प्रस्तावित 200 प्रतिशत से अधिक वृद्धि और जनता की तीखी प्रतिक्रिया पर चर्चा हुई। भाजपा विधायकों मुख्यमंत्री से कहा कि व्यापक जनआक्रोश को देखते हुए इस फैसले पर पुनर्विचार जरूरी है।
इसके बाद बीजू जनता दल (बीजद) के विधायकों ने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी से इन विधेयकों की समीक्षा करने का आग्रह किया।
बीजद अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बढ़े हुए वेतन और भत्ते लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि नेता प्रतिपक्ष के लिए बढ़ाई गई राशि को राज्य के गरीबों के कल्याण में लगाया जाए।
बीजद की मुख्य सचेतक (व्हिप) प्रमिला मलिक ने कहा कि भले ही ये विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुए हों, लेकिन बीजद विधायकों ने जनभावना का सम्मान करने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा, “हमारे नेता नवीन पटनायक हमेशा जनमत का सम्मान करते आए हैं। इसी कारण उन्होंने बढ़ा हुआ वेतन लेने से इनकार किया है। "
हालांकि विधायकों के वेतन में की गई भारी वृद्धि के मुद्दे पर बीजू जनता दल (बीजद) अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने बढ़ा हुआ वेतन और भत्ते लेने से इनकार कर दिया है, लेकिन इस फैसले को लेकर उन्हें विपक्ष की तीखी आलोचना का भी सामना करना पड़ा है। विरोधियों ने उन पर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है।
आलोचकों का कहना है कि बीजद सुप्रीमो ने वेतन वृद्धि का सार्वजनिक रूप से विरोध तो किया, लेकिन न तो विधानसभा के पटल पर संबंधित विधेयक का विरोध किया गया और न ही पार्टी विधायकों को इसके खिलाफ मतदान करने का कोई निर्देश दिया गया। विपक्ष का आरोप है कि यह विरोध अधिकतर प्रतीकात्मक रहा ।
वैसे वेतन वृद्धि के प्रस्ताव को राज्यपाल हरिबाबू कांभमपति की स्वीकृति नहीं मिली है।
राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी क्षेत्रों में अभी भी गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं। ग्रामीण इलाकों में अस्पतालों की बदहाली, शिक्षण संस्थानों में संसाधनों की कमी और युवाओं में बढ़ती बेरोज़गारी सरकार के सामने बड़ी समस्याएँ हैं। ऐसे समय में विधायकों के वेतन में वृद्धि का फैसला जनता को यह संदेश देता है कि सत्ता की प्राथमिकताएँ जनहित से अधिक स्वहित पर केंद्रित हैं। राज्य में विधायकों के वेतन वृद्धि का फैसला केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक प्रश्न भी खड़ा करता है। यदि सरकार जनभावनाओं की अनदेखी करती रही, तो यह असंतोष भविष्य में बड़ा राजनीतिक विरोध का रूप भी ले सकता है।





