ममता

ममता

लेखक - आरती बड़ाईक (अध्यापिका:डीएवी स्कूल) 

भोलू…
यह सिर्फ एक नाम नहीं था, यह मेरे जीवन की एक भावना थी।
वह एक बकरा था, पर मेरे लिए कभी जानवर नहीं रहा। उसकी आँखों में मुझे अपनापन दिखता था, और उसके साथ मेरा रिश्ता किसी खून के रिश्ते से कम नहीं था। मैं उसे अपना भाई मानती थी।
भोलू पूरे भुरे रंग का था। उसके माथे पर एक सफेद तिलक जैसा निशान था, जो उसे औरों से अलग बनाता था। जब वह मुझे देखता, तो ऐसा लगता मानो वह अपनी पहचान उसी तिलक के सहारे जताना चाहता हो।
मेरे मामा के घर एक बकरी थी। एक दिन उसने दो बच्चों को जन्म दिया। माँ का दूध दोनों के लिए था, पर वह दूध केवल एक बच्चे को ही मिल पाता। दूसरा बच्चा धीरे-धीरे कमजोर होता गया। उसकी देह पर मांस नहीं, बस हड्डियाँ ही दिखाई देती थीं। वही कमजोर-सा जीव आगे चलकर मेरा भोलू बना।
मेरी माँ ने उस नन्हे से प्राणी को यूँ ही मरने के लिए छोड़ नहीं दिया। उन्होंने अमूल का दूध घोलकर उसे पिलाना शुरू किया। माँ की ममता शायद किसी जाति, किसी रूप की मोहताज नहीं होती। दूध के साथ-साथ उन्होंने उसे अपना स्नेह भी दिया।
धीरे-धीरे भोलू की आँखों में चमक लौट आई। उसने खड़ा होना सीखा, फिर चलना और कुछ ही समय में दौड़ने भी लगा। अब वह मेरी माँ को पहचानने लगा था—शायद वह उन्हें ही अपनी माँ मान बैठा था।
जब भोलू अमूल का दूध पी-पीकर मजबूत होने लगा, तो उसका व्यवहार भी बदलने लगा। वह ऊँची-ऊँची जगहों पर कूदकर चढ़ जाता और फिर वहाँ से नीचे छलाँग लगा देता। वह यह बार-बार करता। मैं और माँ बैठकर उसे देखते रहते। ऐसा लगता था जैसे भोलू हमें और खुद को यह बताना चाहता हो कि अब वह कमजोर नहीं रहा।
वह भी अब दौड़ सकता है, कूद सकता है—
वह अब मजबूत हो गया है।
समय बीतता गया और एक दिन अचानक एक हादसा हुआ। एक मोटरसाइकिल वाले ने उसे टक्कर मार दी। उसका पैर बुरी तरह घायल हो गया। वह खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। मैंने मन ही मन मान लिया था कि अब भोलू नहीं बचेगा, पर मेरी माँ ने हार नहीं मानी।
माँ ने उसके घायल पैर में लकड़ी बाँधकर सहारा दिया, गर्म कपड़ों से सेक किया, और अपने बच्चे की तरह उसकी देखभाल की। दिन-रात की सेवा और अटूट विश्वास ने अपना चमत्कार दिखाया। भोलू फिर से चलने लगा। उस दिन मुझे लगा—ममता सचमुच जीवन लौटा सकती है।
इसके बाद भोलू सच में हमारे घर का रक्षक बन गया।
मेरी माँ या मेरे अलावा कोई भी अगर घर में प्रवेश करने की कोशिश करता, तो भोलू अपने छोटे-छोटे सींगों से उसपर प्रहार करता और सर के बल धकेलते हुए घर में प्रवेश करने से रोकता, भोलु उसे तब तक धकेलता रहता जब तक वह घर की दहलीज से दूर ना चला जाए। वह हक से हमारे घर को अपना घर मानता था। जैसे कहना चाहता हो—
“यह मेरा परिवार है।”
वह हमारे साथ रहता, हमारे साथ सोता। रात को भूख लगती तो रोने लगता। मैं नींद से उठकर उसे आलू काटकर खिला देती। जब तक बिस्तर न बिछे, वह खड़ा ही रहता। माँ रात में उठतीं, तो वह भी उठ जाता। माँ जहाँ जातीं, भोलू उनके पीछे-पीछे चलता।
एक दिन वह बाहर घास खाने गया और फिर कभी लौटकर नहीं आया। कुछ कुत्तों ने उसे घेर लिया और उसकी जान ले ली। उस दिन माँ और मैं दोनों बहुत रोए। ऐसा लगा जैसे हमने अपने परिवार का एक सदस्य, अपना भाई खो दिया हो। हमने भोलू को अपने ही बागान में दफना दिया—अपनी यादों और आँसुओं के साथ।
भोलू आज हमारे साथ नहीं है, पर वह मेरे दिल में हमेशा जीवित रहेगा।
उसके भुरे रंग का शरीर, माथे का सफेद तिलक, और ऊँचाइयों से लगाई गई उसकी छलाँगें—सब मेरी स्मृतियों में आज भी जीवित हैं।
भोलू ने मुझे सिखाया कि प्रेम किसी रूप, किसी भाषा या किसी प्रजाति का मोहताज नहीं होता।
जहाँ ममता मिलती है, वहीं घुलमिल जाता है, उसे अपना परिवार मान लेता है।