झूठे नरेटिव और राजनीतिक परिदृश्य

पत्रकार की कलम से

झूठे नरेटिव और राजनीतिक परिदृश्य

धर्मेंद्र सिंह की कलम से (राज्य प्रमुख -सारांश न्यूज नेटवर्क) 

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में, चुनावों से पहले अक्सर झूठे नरेटिव गढ़े जाते हैं। यह कार्य सरकार बदलने की मंशा से किया जाता है। कांग्रेस के पतन और वामपंथी किले के पश्चिम बंगाल में ढहने के बाद, विभिन्न चुनावों में ऐसे नरेटिव देखे गए हैं। इन नरेटिवों का उद्देश्य मतदाताओं को प्रभावित करना, राजनीतिक माहौल को बदलना, और विपक्ष को मजबूत करना होता है.

झूठे नरेटिव के उदाहरण
कभी-कभी विदेशी ताकतों के साथ कथित मिलीभगत के झूठे नरेटिव गढ़े जाते हैं ताकि भोली-भाली जनता को छला जा सके। यह एक प्रकार का सियासी हथकंडा है जिसका उपयोग राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए किया जाता है। "रजा नहीं फकीर है" या "जिसकी जितनी भागेदारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी" जैसे नारे इस्तेमाल होते हैं। जब बात नारों से नहीं बनती, तो सियासी दांव-पेंच बदले जाते हैं। ये नारे और विमर्श जनता को भावनात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं।
सन 2002 में मुहं नोचवां, 2007 में जातिगत विद्वेष, 2012 में चोटी कटवा, और 2017 में छीनती जैसे मुद्दों ने सरकारों को बदलने में भूमिका निभाई। इन घटनाओं ने राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया और मतदाताओं की भावनाओं को प्रभावित किया।
2022 में यह विमर्श बढ़ा, लेकिन उत्तर प्रदेश में सरकार पुनः आई। अब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और कथित तौर पर ड्रोन और सेध मारी जैसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं। ये मुद्दे मतदाताओं को चिंतित करने और राजनीतिक माहौल को बदलने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं।लोकसभा चुनाव के सर्वेक्षणों के अनुसार, यह विमर्श कामयाब रहा, जहां "संविधान खतरे में है" जैसे नरेटिव ने मोदी सरकार को आने से रोकने का खतरा पैदा कर दिया। यह एक प्रकार का राजनीतिक दांव है जिसका उपयोग विपक्ष द्वारा किया जा सकता है।

एजेंसी और एजेंडा
इन झूठे नरेटिवों के पीछे कौन सी एजेंसी और किसका एजेंडा है, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। राजनीतिक दल और उनके समर्थक अक्सर अपने हितों को साधने के लिए ऐसे नरेटिव गढ़ते हैं। ये नरेटिव मीडिया, सोशल मीडिया, और अन्य संचार माध्यमों के जरिए फैलाए जाते हैं।
झूठे नरेटिव का प्रभाव राजनीतिक परिदृश्य पर गहरा हो सकता है। ये नरेटिव झूठे नरेटिव मतदाताओं की राय को प्रभावित कर सकते हैं और उनके मतदान के फैसले को बदल सकते हैं।
ये नरेटिव राजनीतिक माहौल को गर्मा सकते हैं और विपक्ष को मजबूत कर सकते हैं।झूठे नरेटिव सरकार की छवि को खराब कर सकते हैं और उनकी नीतियों पर सवाल उठा सकता है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में झूठे नरेटिव गढ़े जाने की प्रवृत्ति देखी जा रही है। ये नरेटिव सरकार बदलने की मंशा से गढ़े जाते हैं और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों द्वारा इन नरेटिवों का उपयोग अपने हितों को साधने के लिए किया जाता है