महंगाई भी क्या चुनकर दिखाई जाती है

महंगाई भी क्या चुनकर दिखाई जाती है

महंगाई भी क्या चुनकर दिखाई जाती है?

रसोई गैस, दाल, प्याज, टमाटर और चीनी के दाम बढ़ते हैं तो राजनीति गरमा जाती है। लेकिन मोबाइल रिचार्ज, गुटका, शराब, सिगरेट, जूते, परफ्यूम और दूसरी गैर-जरूरी वस्तुओं की कीमतें कई गुना बढ़ जाएं, तो आखिर राजनीतिक बहस क्यों खामोश हो जाती है?

महंगाई आम आदमी के जीवन से जुड़ा सबसे संवेदनशील मुद्दा है। जब रसोई गैस सिलेंडर महंगा होता है, दाल की कीमत बढ़ती है या प्याज-टमाटर के दाम आसमान छूते हैं, तब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के बयान सामने आने लगते हैं। संसद से लेकर सड़क तक महंगाई पर बहस होती है। राजनीतिक दल इसे जनता की परेशानी और सरकार की नाकामी से जोड़ते हैं।

लेकिन सवाल यह है कि महंगाई की चिंता सिर्फ रसोई तक ही क्यों सीमित रह जाती है?

आज मोबाइल फोन और इंटरनेट हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। मोबाइल रिचार्ज की कीमतों में वृद्धि सीधे करोड़ों उपभोक्ताओं की जेब पर असर डालती है। इसी तरह जूते, कपड़े, परफ्यूम और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, लेकिन इन पर राजनीतिक विमर्श अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।

शराब, सिगरेट और गुटका जैसे उत्पादों के मामले में तो स्थिति और भी दिलचस्प है। इनके दाम बढ़ने पर राजनीतिक दलों की ओर से वैसी तीखी प्रतिक्रिया शायद ही देखने को मिलती है, जैसी प्याज या गैस सिलेंडर के दाम बढ़ने पर दिखाई देती है।

इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हर वस्तु की कीमत बढ़ने का आर्थिक और सामाजिक प्रभाव एक जैसा नहीं होता। खाद्य पदार्थ और ईंधन सीधे परिवार के बजट तथा जीवन-यापन की लागत को प्रभावित करते हैं। वहीं तंबाकू और शराब जैसे उत्पादों की कीमत बढ़ाना कई बार सरकार की कर नीति का हिस्सा होता है, जिसका उद्देश्य राजस्व के साथ-साथ इनके सेवन को हतोत्साहित करना भी हो सकता है।

फिर भी लोकतंत्र में सवाल उठना जरूरी है।

राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे महंगाई को जनता की वास्तविक समस्या के रूप में देखते हैं या केवल राजनीतिक हथियार के रूप में। अगर कीमत बढ़ने से आम नागरिक की जेब प्रभावित होती है, तो मुद्दा उठना चाहिए—चाहे वह वस्तु रसोई गैस हो या मोबाइल रिचार्ज।

दूसरी ओर जनता को भी यह समझना होगा कि हर कीमत वृद्धि को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। आवश्यक वस्तुओं और विलासिता अथवा नशे से जुड़े उत्पादों के बीच अंतर है। सरकार द्वारा लगाए गए टैक्स, उत्पादन लागत, कच्चे माल की कीमत, अंतरराष्ट्रीय बाजार, मांग-आपूर्ति और नियामकीय नीतियां—इन सभी का कीमतों पर प्रभाव पड़ता है।

असल सवाल यह नहीं कि किस चीज की कीमत बढ़ी। असली सवाल यह है कि कीमत बढ़ने का कारण क्या है, उसका बोझ किस पर पड़ रहा है और सरकार उस बोझ को कम करने के लिए क्या कर रही है?

राजनीति में यदि महंगाई का मुद्दा उठाना है तो उसे चयनात्मक नहीं, बल्कि व्यापक नजरिए से उठाना चाहिए। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—दोनों की जिम्मेदारी है कि वे जनता को केवल आंकड़े और आरोप न दें, बल्कि यह भी बताएं कि कीमतें क्यों बढ़ीं और समाधान क्या है।

क्योंकि जनता को सस्ती राजनीति नहीं, समझदार आर्थिक नीति चाहिए।

महंगाई का विरोध तब ही सार्थक होगा, जब विरोध किसी खास सरकार, दल या समय तक सीमित न हो। जनता के हित में सवाल वही है जो हर सरकार से, हर कीमत वृद्धि पर और समान पैमाने से पूछा जाए।

आखिर महंगाई का दर्द राजनीतिक दल देखकर नहीं, जेब देखकर होता है।