क्या एक धर्म से दूसरे धर्म को खतरा हो सकता है
नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)
आजादी के बाद से ही हमारे भारत देश के 90 प्रतिसत.राजनेता हिंदू रहे हैं,वहीं इतने ही संख्या में प्रसाशनिक अधिकारी, भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी और तमाम राज्यों के राजपत्रित अधिकारी भी हिंदू हैं।
देश की सेना अर्धसेना में भी 90 प्रति.से अधिक हिंदू अधिकारी और सैनिक हैं। भविष्य में भी यहां हिंदुओ की संख्या बढ़ते ही रहने वाली है। फिर भी देश में कुछ स्वार्थी लोग के द्वारा इस तरह का अफवाह उड़ाया जा रहा है कि "जागो,, हिंदुत्व खतरे में हैं"।।
मतलब इनका 90 प्रतिशत हिंदुओं के सामर्थ्य पर भी इन मूर्खों का भरोसा नहीं बचा है।। ठीक उसी तरह जिस तरह पाकिस्तान और अफगानिस्तान में 99 प्रतिशत मुस्लिम नेता हैं।सिविल अफसर और सैनिक भी मुस्लिम है। फिर भी वहां के जाहिलो को यह पट्टी पढ़ा दी गई है,कि "जागते रहो तुम्हारे देश के मुसलमान खतरे में हैं"।।*
मेरे हिसाब से एक धर्म को दूसरे धर्म से कभी परेशानी नहीं रही है। असल समस्या कट्टरवादी विचारधारा और स्वार्थपूर्ण राजनीति से उत्पन्न हुई है।। धार्मिक कट्टरता हर जगह हमें विभिन्न रूपों में दिखाई देती है। सच कहूं तो यह एक बीमार मानसिकता है,,जो कभी संघी आतंकवादियों के रूप में इख़लाक़ के हत्यारे बनकर हमारे समक्ष आती है,, तो कभी शहीद अवतार सिंह पाश के क़ातिल बनती हुई दिखती है। कभी यह मानसिकता शहीद मशीरुल हक़ पर गोलियां चलाती है तो कभी जंतर-मंतर पर मानवता को शर्मसार करती है।। *इस तरह की मानसिकता को फैलाने के लिए कभी मंदिर का आड़ लिया जाता है तो कभी मस्जिद के चोंगे को इस्तेमाल किया जाता है।।*
ऐसा नही है कि जिस देश या इलाके में सिर्फ हिंदू है वहां कोई समाजिक हिंसा नहीं है,या जहां मुस्लिम अधिक है वहां शांति है।। जहां एक धर्म के लोग अधिक हैं वो आपस में एक दूसरे से जातीय/वर्ण हिंसा के बीच लड़ मर रहे हैं।। सवर्ण हिंदू दलितों और आदिवासियों से लड़ रहा है,तो शिया सुन्नी और अहमदिया मुस्लिम आपस में खूनी संघर्ष कर रहे हैं।। कुल मिलाकर सांप्रदायिक और जातीय हिंसा सिर्फ मानसिक बीमारी का ही परिणाम है,यह बीमारी समूहों में संक्रमण की तरह फैलती है।। इस तरह की हिंसा का सच में कोई आधार नहीं है।।





