शराब के ठेके और नशा मुक्ति अभियान सरकार की दोहरी तस्वीर

शराब के ठेके और नशा मुक्ति अभियान सरकार की दोहरी तस्वीर

एक हाथ में शराब का लाइसेंस, दूसरे हाथ में नशा मुक्ति का संदेश—आखिर सरकार चाहती क्या है?

हरहर शम्भू (मुख्य संपादक) 

समाज को नशे से मुक्त करने के लिए सरकारी स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। अधिकारी मंचों से नशे के दुष्परिणाम बताते हैं, युवाओं को नशे से दूर रहने की सलाह देते हैं और नशा निवारण कार्यक्रमों में संकल्प दिलाया जाता है। यह निश्चित रूप से एक अच्छी पहल है।

लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।

एक तरफ सरकार शराब की दुकानों और ठेकों के लाइसेंस जारी कर राजस्व जुटाती है, वहीं दूसरी ओर उसके अधिकारी शराब और नशे के खिलाफ जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करते हैं। ऐसे में आम आदमी के मन में स्वाभाविक सवाल उठता है—सरकार की प्राथमिकता नशामुक्त समाज है या शराब से मिलने वाला राजस्व?

यह सवाल शराब के सेवन की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से अधिक नीति की स्पष्टता और सामाजिक जिम्मेदारी का है। सरकार के लिए शराब से मिलने वाला राजस्व निश्चित रूप से आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन शराब की बिक्री से होने वाली सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की कीमत भी समाज को ही चुकानी पड़ती है। शराब की लत से परिवारों में आर्थिक संकट, घरेलू विवाद, अपराध, सड़क दुर्घटनाएं और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं। सबसे अधिक प्रभावित अक्सर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार होते हैं। ऐसे में केवल नशा निवारण शिविर लगाकर या जागरूकता रैली निकालकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

यदि सरकार वास्तव में नशामुक्त समाज की दिशा में गंभीर है, तो उसके प्रयासों में शराब की उपलब्धता, बिक्री का नियमन, नाबालिगों को बिक्री पर सख्ती, अवैध शराब पर कार्रवाई और नशे की गिरफ्त में आए लोगों के पुनर्वास जैसे विषय भी उतनी ही गंभीरता से शामिल होने चाहिए। सरकार को यह भी देखना होगा कि नशा मुक्ति का संदेश केवल सरकारी कार्यक्रमों और भाषणों तक सीमित न रह जाए। स्कूलों, कॉलेजों, गांवों और शहरी बस्तियों में लगातार जागरूकता अभियान चलाने के साथ-साथ परिवारों और सामाजिक संगठनों को भी इस लड़ाई में सहभागी बनाना होगा। यहां सवाल शराब के ठेके खोलने या बंद करने का ही नहीं है। असली सवाल है—सरकार अपनी शराब नीति और नशा मुक्ति नीति के बीच संतुलन कैसे स्थापित करती है? राजस्व और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कठिन जरूर है, लेकिन असंभव नहीं। सरकार शराब से मिलने वाले राजस्व को विकास का साधन मानती है तो उसे शराब से पैदा होने वाले सामाजिक नुकसान को कम करने की जिम्मेदारी भी स्वीकार करनी चाहिए।

नशा मुक्ति कार्यक्रम तभी प्रभावी होंगे जब वे केवल “नशा मत करो” का संदेश देने तक सीमित न हों, बल्कि यह भी सुनिश्चित करें कि नशे की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को इलाज, परामर्श और पुनर्वास की सुविधा मिले। सरकार को तय करना होगा कि नशा मुक्ति अभियान महज औपचारिकता है या वास्तव में एक सामाजिक संकल्प। क्योंकि जनता को भाषण नहीं, नीति में एकरूपता और जमीन पर परिणाम चाहिए। शराब से राजस्व और नशे से मुक्ति—दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश तभी विश्वसनीय होगी, जब सरकार यह साबित करे कि उसकी पहली प्राथमिकता केवल खजाना भरना नहीं, बल्कि समाज को स्वस्थ और सुरक्षित रखना भी है।