सैनिकों की सुरक्षा और भावनाओं पर राजनीति क्यों
नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)
किसी घटना या हमले में जवानों की शहादत से उतनी पीड़ा नही होती जितनी तकलीफ उन आराम फरामोश,बेईमान और गैर जिम्मेदार नेताओं तथा अफसरों के द्वारा घटना की निंदा और शहीद परिवार के प्रति दिखावटी संवेदना प्रकट करने से होती है।।
सच कहूं तो इन लोगों की नजरों में जिंदा जवानों के जान और उनकी जरूरतों की कोई कीमत नहीं होती है।। ये लोग शहादत की हर घटना का राजनीतिक उपयोग करने की फिराक में लगे रहते हैं। सीधे तौर पर कहें तो अपने अपने स्तर पर भावनाओं का व्यापार करते हैं।।
दूसरी तरफ देश की सत्ता में बैठी राष्ट्रवादी पार्टी का दोहरा चरित्र देखें तो पाएंगे कि इस पार्टी के नेताओं को करोड़ो अरबों रुपए खर्च कर नया पार्टी कार्यालय,नया संसद भवन बनवाने और नया उड़नखटोला खरीदने में कोई गुरेज नहीं है,साथ ही इसके खरीदे गए तमाम न्यूज चैनल के दावों को देखें तो वर्ष 2013 के बाद केंद्रीय सत्ता में बैठी पार्टी ने ही भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों को अमेरिका और इजराइल के बाद सबसे ज्यादा आधुनिक साधन और सुविधा दी है।।
दूसरी तरफ जमीनी हकीकत देखेंगे तो पाएंगे कि उरी (कश्मीर) से लेकर बस्तर के घने जगालों तक भारतीय सुरक्षा बल के जवान/सैनिक कपड़ों के बने ऐसे टेंट के साथ दुश्मन से घिरे इलाकों में रहकर बेहद कम संसाधनों के उपलब्धता में अपनी ड्यूटी(देश की सुरक्षा)कर रहे है,जो हल्की सी बारिश और आंधी में ही तहस नहस हो जाती है,या हल्की सी आग तक बर्दास्त नही कर पाती है।। जबकि उरी 2016 हमले के बाद बनी संसदीय जांच समिति ने भारत सरकार को दी गई रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से कहा था, *कि विवादग्रस्त क्षेत्रों में जवानों को सुरक्षित रखने में कपड़ों के बने टेंट कही से सही नही हैं।। इन्हे फौरन बदला जाना जरूरी है।
बताया जाता है कि इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने भी *आयुध निर्माणी बोर्ड को गोपनीय रिपोर्ट भेजी थी। इसमें लिखा था कि शहीद हुए 18 सैनिकों में ज्यादातर की शहादत का कारण आतंकियों की गोली नहीं बल्कि टेंट में आग लगना था।* इस रिपोर्ट के आधार पर आयुध निर्माण बोर्ड ने ओईएफ कानपुर को *"फायर रेजिस्ट फैब्रिक"* से बने टेंट का उत्पादन तेज करने का निर्देश दिया था। परंतु आदेश के पालन में हुई लापरवाही का दुष्परिणाम यह है कि, *आज भी बस्तर सहित अन्य नक्सल या आतंक प्रभावित क्षेत्रों में स्थापित किए गए ज्यादातर कैंपों में जवान कपड़ो के बने पुराने टेंटों में रहते हैं।।*
वहीं इन क्षेत्रों में जवानों के आवागमन के लिए आज भी बीपी वाहन की जगह सामान्य पुरानी पिकप,कपड़ों और टीन की छत वाली पुरानी ट्रकों का ही इस्तेमाल किया जाता है।। जबकि भारतीय मीडिया 2015 से ह यह फर्जी दावा करती रही है कि सैनिकों और जवानों को अत्याधुनिक सुविधाओं वाली सेंसर और विस्फोटक रोधी वाहन आबंटित किए जा चुके हैं। यथार्थ इसके बिल्कुल उलट है,जो आपने हमने अभी *पूंछ (जम्मू) और अरनपुर (दंतेवाड़ा) में देखा है।।*
इतना ही नहीं *आज भी ज्यादातर हमलों और एंबुश में उलझे हमारे जवानों को साधन और रणनीति के अभाव में घंटो बैकप(रि_इनफोर्स)स्पोर्ट नही मिल पाता है।* यहां जवान या तो अपने बूते या ऊपर वाले की मेहरबानी से लड़ाई लड़ कर बचने को मजबूर होते हैं।।
इसके अलावा तमाम असफल सैन्य कार्यवाही(खासकर ऐसे नक्सल हमले के बाद जिसमें बड़ी संख्या में जवानों की जान जाती है)की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं होता है।।*
सिर्फ कड़ी आलोचना और श्रद्धांजलि के बाद एक जांच कमेटी बनाकर खाना पूर्ति कर दी जाती है।। *ताड़मेटला 2010 से बीजापुर 2022 से लेकर अरनपुर 2023 तक की तमाम घटनाओं का अवलोकन कर लीजिए,अगले हमले तक सुरक्षा मामलों के जिम्मेदार सिर्फ मुकदर्शक बने दिखते हैं। हम आप श्रद्धांजलि देकर सब भूल जाते हैं,जिसकी वजह से यही बड़ी विडंबना और दुष्परंपरा आज भी जारी है।।।
अरनपुर के शहीदों को श्रद्धांजलि के साथ बस्तर के सुदूर नक्सल क्षेत्र की एक तस्वीर साझा कर रहा हूं जो यह दिखाने के लिहाज से काफी है,कि सरकारी दावों में कितनी सच्चाई होती है,,और हमारे जवान किन हालातों में हमारी सुरक्षा करते हैं।






