रबिन्द्र गिलुवा ने केंद्रीय विद्यालय चक्रधरपुर में हो आदिवासियों की गाथा सुनाई
केंद्र सरकार के निर्देश पर जनजातीय गौरव वर्ष पखवाड़ा (1-15 नवंबर 2025) पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। यह कार्यक्रम झारखंड स्थापना दिवस और धरती आबा बिरसा मुंडा के जन्मदिवस (15 नवंबर) तक चलेगा। इसमें आदिवासी नायकों के पराक्रम, दूरदर्शिता और योगदान को श्रद्धांजलि दी जाती है। इसीक्रम में, विद्यालय के प्रधानाध्यापक विश्वनाथ हांसदा की अनुमति से शिक्षक नील अभिमन्यु ने चक्रधरपुर के युवा समाजसेवी और साहित्यकार रबिन्द्र गिलुवा को आमंत्रित किया। 6 नवंबर (गुरुवार) को उन्होंने छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को हो आदिवासियों का इतिहास, संस्कृति और योगदान बताया।
प्रधानाध्यापक विश्वनाथ हांसदा ने रबिन्द्र गिलुवा का पौधा दे कर अपने विद्यालय में स्वागत किया और अध्यापक नील अभिमन्यु ने विद्यालय से उनका परिचय करवाया। रबिन्द्र ने हो भाषा में सभी को संबोधित करते हुए कहा: सिंहभूम (कोल्हान) पृथ्वी की मातृभूमि है। इसकी भूमि 3.6 अरब से 3.2 अरब साल पुरानी है—ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका से 20 करोड़ साल से ज्यादा, नकटी के भरंडिया गांव में इको टूरिस्ट प्लेस के शिलान्यास में लिखा है कि यहां के पत्थर 280 करोड़ साल से भी पुराने हैं। हो आदिवासियों की मानकी-मुंडा स्वशासन व्यवस्था इतनी मजबूत है कि कोई बाहरी शासक कोल्हान को अधीन नहीं कर पाया। जल, जंगल, जमीन के लिए कई लड़ाइयां हुईं—जैसे 1820-21 हो विद्रोह और 1831-32 कोल विद्रोह। इसी कारण कोल्हान को अलग राज्य घोषित किया गया और 1837 में विल्किंसन रूल लागू हुआ।
1 जनवरी 1958 को करीब 30,000 से भी अधिक लोग शहीद हुए, और 8 सितंबर 1980 को गुआ में 10 लोग शहीद हुए। उन्होंने आगे कहा: "हम आदिवासी प्रकृति के साथ जीते हैं। चिड़िया का घोंसला या चींटियों की गतिविधि देखकर मौसम का हाल बता देते हैं।"अंत में रबिन्द्र ने सभी छात्रों और शिक्षकों को धन्यवाद दिया।





