खुद को बचाने में जुटा सरपंच पुलिस और मीडिया बना सुरक्षा कवच

छपकर बिकते थे जो अखबार कभी, सुना है आजकल बिककर छपा करते है!!

खुद को बचाने में जुटा सरपंच पुलिस और मीडिया बना सुरक्षा कवच

सुंदरगढ़ जिला के बिसरा पंचायत अंतर्गत आनेवाले बुदुलजोर गांव के बड़का टोली में कई लोगों को सरकारी आवास योजना का लाभ मिला हुआ था। बिसरा पंचायत के सरपंच ने मध्यस्थता कर किसी कथाकथित ठेकेदार को यह कहकर लाभार्थियो से पैसे दिलवाए की आप लोग ठहरे गरीब आदमी घर कैसे बनाएंगें, यह ठेकेदार है इसे पैसे दे दीजिए आपका घर जल्द् बन जाएगा। पर वर्षो गुजर गए अबतक किसी लाभार्थी का घर नहीं बना। 

इस घटना को लेकर सप्ताह भर पहले सारांश दैनिक के यू ट्यूब पेज पर एक खबर प्रकाशित की गई थी, क्या थी वह खबर नीचे दी गई लिंक पर जाकर देखे। 

 

इस खबर के प्रकाशित होने के बाद बिसरा के सरपंच सुरज नायक अपनी छवि बचाने के लिए भाग दौड़ करने लगा, जिसमें स्थानीय थाना की पुलिस की कार्यवाही और ओडिया समाचार पत्र में छपी खबरो से ऐसा लगता है कि पुलिस और मीडिया सरपंच के लिए सुरक्षा कवच बनाने का काम कर रहे है। 

एक अखबार का शीर्षक है कि "थाना र द्वरस्त हेले ग्रामवासी पुलिस तदन्त" दूसरे अखबार में ठेकेदार को फरार बताया गया है। जिसमें घटना को तीन माह पूर्व का बताया गया है।इनमें यह भी लिखा गया है कि अबतक ठेकेदार पर कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है। 

जबकि घटना वर्षो पुराना है, और धोखाधड़ी का शिकार हुए ग्रामीणो का कहना है कि जब भी वे सरपंच के पास शिकायत करते है, सरपंच उन्हें स्थानीय थाना में लेकर चला जाता है, जहाँ उनकी एक नहीं सुनी जाती।

इन्हीं में से एक लाभार्थी है सनियारों मुन्डा जिन्होंने दिनांक 23-05-2022 को ₹30,000 बिसरा के सेन्ट्रल बैक से निकालकर सरपंच के सामने उनके कहने पर ठेकेदार को दिए थे। इनके साथ ही अन्य तीन लाभार्थीयो ने भी पैसे दिए थे। उन तीनों ने भी सेंट्रल बैक बिसरा से रुपये निकासी कर सरपंच के कहने पर उनके बताए ठेकेदार को पैसे दिए।हालांकि अन्य तीन लोगों का पासबुक अपडेट नहीं था इसलिए सटीक दिनांक की जानकारी नहीं हो पाई।

लाभार्थीयो ने क्या कहा देखे विडियो


पूरा घटनाक्रम देखा जाए तो साफ लग रहा है कि "साराँश दैनिक" में घटना का खुलासा होने के बाद स्थानीय सरपंच अपनी छवि बचाने की पूरी कोशिश कर रहा है, जिसमें पुलिस और मीडिया सरपंच के लिए सुरक्षा घेरा बनाने का काम कर रहे है। अखबार में छपी शीर्षक और तस्वीर दोनों विपरीत कहानी बयाँ कर रहें है। शीर्षक में ग्रामीणो को थाने के दरवाजे पर बताया गया है जबकि तस्वीर में पुलिस कर्मी गाँव में ग्रामीणो के दरवाजे पर नजर आ रहे है। वहीं शिकायतकर्ताओं का कहना है कि वह पिछले माह के 22 तारीख के बाद थाने में गए ही नहीं। इसका अर्थ यही हुआ कि "साराँश दैनिक" में खबर प्रकाशित होने के बाद पुलिस भी हरकत में आई। या फिर सरपंच की छवि को बचाने के लिए पुलिस कार्यवाही करने का दिखावा कर रही है,जिसकी पुष्टि अखबारों के माध्यम से लीपापोती कर की गई। 

इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए कहना गलत ना होगा कि-

छप कर बिकते थे जो अखबार कभी, 

सुना है आजकल बिक कर छपा करते है ! !