कानून की किताब और थाने के जवाब के बीच उलझता सूचना का अधिकार
सूचना का अधिकार (RTI) कानून को भारतीय लोकतंत्र में आम नागरिक का सबसे बड़ा हथियार माना गया है, ताकि प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही तय की जा सके। लेकिन जब रक्षक ही प्रक्रियागत तकनीकी उलझनों का हवाला देकर जानकारी देने से पल्ला झाड़ लें, तो इस कानून की मूल भावना पर गंभीर सवाल उठते हैं। हाल ही में सुंदरगढ़ (ओडिशा) जिले के बंडामुंडा थाना क्षेत्र से सामने आया एक मामला इसी प्रशासनिक उदासीनता का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
मामला बेहद सीधा और जनहित से जुड़ा है। क्षेत्र के एक वरिष्ठ पत्रकार तथा, आरटीआई एक्टीविस्ट ने सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत बंडामुंडा थाने के जन सूचना अधिकारी (PIO) सह थाना प्रभारी से दो बुनियादी सवाल पूछे थे। पहला सवाल यह था कि यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे की संपत्ति को अवैध तरीके से हड़पने के लिए उस पर झूठा आरोप लगाकर ब्लैकमेल करता है, तो यह अपराध किस श्रेणी में आता है? दूसरा सवाल यह था कि ऐसी शिकायत मिलने पर पुलिस द्वारा क्या कानूनी कार्रवाई की जाती है?
ये सवाल किसी व्यक्तिगत केस की केस डायरी या किसी गोपनीय जांच की रिपोर्ट नहीं मांग रहे थे। ये देश के मौजूदा कानून (भारतीय न्याय संहिता/IPC) और पुलिस नियमावली (Police Manual) के तहत एक सामान्य प्रक्रियात्मक जानकारी की मांग कर रहे थे, जिसे जानना हर नागरिक का कानूनी हक है।
लेकिन, लोक सूचना अधिकारी (PIO) सह थाना प्रभारी, बंडामुंडा का जो आधिकारिक जवाब आया, वह न केवल निराशाजनक है बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी से भागने जैसा है। पुलिस ने बेहद संक्षिप्त रूप में लिख दिया कि "वांछित जानकारी पुलिस स्टेशन में उपलब्ध नहीं है। याचिकाकर्ता कृपया इस उद्देश्य के लिए किसी कानूनी विशेषज्ञ (Legal Practitioner) से परामर्श लें।
यह जवाब कई गंभीर सवाल खड़े करता है:
1. कानून की व्याख्या पुलिस का काम नहीं तो किसका है? जिस कानून को लागू करने और जिसके तहत कार्रवाई करने की जिम्मेदारी पुलिस की है, उसी कानून की बुनियादी धाराओं और प्रक्रियाओं के बारे में पुलिस यह कैसे कह सकती है कि जानकारी थाने में उपलब्ध नहीं है?
2. क्या पुलिस थानों में कानून की किताबें नहीं हैं? ब्लैकमेलिंग, जबरन वसूली (Extortion) और झूठे मुकदमे फंसाने से जुड़ी धाराएं देश के बुनियादी आपराधिक कानून का हिस्सा हैं। अगर थाने को ही यह नहीं पता कि इन मामलों में क्या कार्रवाई होती है, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे?
3. नागरिकों को वकीलों के पास भेजना कहां तक सही? आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य आम नागरिक को बिना किसी अतिरिक्त खर्च या कानूनी दांव-पेंच के सीधे सरकारी तंत्र से जानकारी दिलाना है। पुलिस द्वारा नागरिक को 'कानूनी सलाहकार के पास जाने' की सलाह देना आरटीआई कानून की आत्मा के खिलाफ है।
आरटीआई कानून के तहत यदि मांगी गई जानकारी उस विभाग से सीधे संबंधित नहीं भी थी, तो भी अधिनियम की धारा 6(3) के तहत लोक सूचना अधिकारी का यह दायित्व था कि वे इस आवेदन को संबंधित उचित प्राधिकारी या कानूनी विंग को स्थानांतरित (Transfer) करते, न कि सीधे पल्ला झाड़ लेते।
यह घटना यह दर्शाती है कि जमीनी स्तर पर प्रशासनिक अधिकारी आज भी आरटीआई को एक जिम्मेदारी के रूप में देखने के बजाय एक 'कागजी बोझ' मानते हैं। जब तक पुलिस और प्रशासन का आम जनता के प्रति यह रवैया नहीं बदलेगा, तब तक पारदर्शिता और सुशासन (Good Governance) का दावा महज एक नारा बनकर रह जाएगा। उच्च अधिकारियों को इस मामले का संज्ञान लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि थानों में आने वाली आरटीआई का जवाब कानूनी रूप से तार्किक और मददगार हो, न कि टालमटोल वाला।





