18 अक्टूबर: विरप्पन के काले साम्राज्य का खात्मा
18 अक्टूबर 2004 को विशेष कार्य बल (STF) द्वारा अंजाम दिया गया 'ऑपरेशन कूकून' भारतीय पुलिसिंग के इतिहास में रणनीतिक सटीकता, अभूतपूर्व खुफिया पैठ और धैर्य की सबसे बड़ी मिसाल है। तीन दशकों तक तमिलनाडु और कर्नाटक के 6,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक फैले दुर्गम जंगलों में हाथियों के अवैध शिकार, चंदन की तस्करी और दर्जनों पुलिसकर्मियों की हत्याओं का खूनी साम्राज्य चलाने वाले कुख्यात वीरप्पन का अंत महज एक एनकाउंटर नहीं था। यह दो राज्यों की पुलिस के उस साझा और आधुनिक खुफिया तंत्र (Cellular Intelligence) की जीत थी, जिसने अपराधी के ही गोरिल्ला युद्ध तंत्र को ध्वस्त कर दिया।
दशकों तक वीरप्पन की ताकत उसका स्थानीय मुखबिर तंत्र और जंगलों की भौगोलिक विकटता थी। राज्य सरकारें लंबे समय तक इस भूलभुलैया को भेदने में नाकाम रहीं, जिससे कानून के इकबाल पर गंभीर सवाल खड़े हुए। लेकिन के. विजय कुमार और एन. के. सेंथामराई कन्नन के नेतृत्व में एसटीएफ ने अपनी रणनीति बदली। 'नीड-टू-नो' मॉड्यूल के तहत सूचनाओं के प्रवाह को इतना कड़ा और सीमित रखा गया कि ऑपरेशन के अंतिम क्षणों तक इसकी भनक शीर्ष स्तर पर भी किसी को नहीं थी। लगभग 10 महीनों तक एसटीएफ के जवानों ने भेष बदलकर फेरीवाले और बस कंडक्टर के रूप में तस्कर के प्रभाव वाले गांवों में 'डीप कवर इनफिल्ट्रेशन' किया। यह आधुनिक पुलिस व्यवस्था का एक ऐसा अध्याय है जहां बंदूकों से पहले दिमाग का इस्तेमाल किया गया।
ऑपरेशन कूकून की तकनीकी सफलता इस बात में थी कि उसने अपराधी की शारीरिक कमजोरी—वीरप्पन की आंखों की गंभीर बीमारी और मोतियाबिंद—को अपनी सबसे बड़ी ताकत (The Medical Bait) बना लिया। तस्कर के अटूट खुफिया जाल में डबल एजेंटों के जरिए सेंध लगाई गई। 18 अक्टूबर की रात पापारापट्टी गांव के पास पड़ी (Padi) में जो कुछ हुआ, वह सैन्य सटीकता का उत्कृष्ट उदाहरण था। 'सेल्वा हॉस्पिटल' नाम की एक छद्म एम्बुलेंस, स्टियरिंग पर बैठा एसटीएफ का इनफिल्ट्रेडेट ड्राइवर, रास्ते को ब्लॉक करता 'स्वीट बॉक्स' ट्रक, और रेत की बोरियों से लैस 'मोबाइल बंकर'—इन सबने मिलकर वीरप्पन के लिए एक ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया जिससे निकलना नामुमकिन था। स्कूल की छतों पर तैनात रूफटॉप कमांडो और महज 20 से 45 मिनट के भीतर चली 338 राउंड की अनुशासित फायरिंग ने न्यूनतम जनहानि (Minimum Collateral Damage) के साथ तीन दशक पुराने आतंक को हमेशा के लिए शांत कर दिया।
वीरप्पन का खात्मा यह सबक देता है कि जब राज्य की एजेंसियां राजनीतिक इच्छाशक्ति, आधुनिक तकनीक और अचूक खुफिया समन्वय के साथ काम करती हैं, तो किसी भी हिंसक साम्राज्य का अंत सुनिश्चित है। हालांकि, यह एनकाउंटर एक आत्मनिरीक्षण की मांग भी करता है। वीरप्पन जैसे अपराधियों को शहरों में बैठे सफेदपोशों और अंतरराष्ट्रीय तस्करों का जो तंत्र पालता है, उसे भी पूरी तरह नेस्तनाबूत करना जरूरी है। ऑपरेशन कूकून की सफलता पर गर्व करते हुए भारतीय सुरक्षा तंत्र को यह संकल्प लेना होगा कि भविष्य में किसी भी अपराधी को देश की संप्रभुता और कानून व्यवस्था के समानांतर 'जंगलराज' स्थापित करने का दुस्साहस न मिले।





