काले धन का कंक्रीट जाल और आम आदमी की बेबसी

काले धन का कंक्रीट जाल और आम आदमी की बेबसी

संपादकीय: काले धन का कंक्रीट जाल और आम आदमी की बेबसी

भारतीय समाज में जमीन और मकान हमेशा से सुरक्षा और सुकून के प्रतीक रहे हैं। आम आदमी अपनी जिंदगीभर की कमाई, खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का एक-एक पाई जोड़कर सिर छिपाने के लिए एक अदद आशियाना या खेती के लिए थोड़ी सी जमीन खरीदने का सपना देखता है। लेकिन, पिछले कुछ दशकों में इस पवित्र सपने को भ्रष्टाचार के दीमकों ने इस तरह खोखला कर दिया है कि आज बुनियादी जरूरतें भी आम इंसान की पहुंच से दूर होती जा रही हैं।

भ्रष्टाचार से अर्जित अवैध धन (काला धन) जब बेहिसाब तरीके से रियल एस्टेट बाजार में झोंका जाता है, तो अर्थव्यवस्था की स्वाभाविक गति चरमरा जाती है। भ्रष्ट अधिकारियों, दलालों और सत्ता के गलियारों में बैठे जालसाजों की नीयत केवल अपनी संपत्ति बढ़ाना नहीं, बल्कि उस अवैध धन को जमीन-जायदाद में खपाकर पूरी तरह 'सफेद' करना होती है। इस प्रवृत्ति ने शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में जमीनों के दामों में कृत्रिम और बेतहाशा उछाल ला दिया है।

अजीब विडंबना है कि जो जमीन कभी मेहनतकश किसानों और आम परिवारों की क्रय शक्ति के दायरे में हुआ करती थी, वह आज केवल काले धन के निवेश का जरिया बन चुकी है। यही नहीं, कहानी यहीं नहीं रुकती; इन महंगी जमीनों पर अवैध और अकूत संपत्ति के मालिकों द्वारा आलीशान मकान और बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी जाती हैं। इन भवनों को भारी-भरकम किराए पर उठाकर वे काले धन से और अधिक काला धन पैदा करने की एक अंतहीन फैक्ट्री चला रहे हैं।

इस अंधाधुंध कमर्शियल और रियल एस्टेट दोहन का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव निर्माण सामग्री—जैसे ईंट, सीमेंट, कंक्रीट और सरिया—के दामों पर भी पड़ा है। मांग और आपूर्ति के कृत्रिम असंतुलन ने पूरी निर्माण श्रृंखला को महंगा कर दिया है। यदि जमीनें केवल वास्तविक जरूरत, यानी रहने और खेती करने के लिए खरीदी जातीं, तो आज कीमतें आसमान न छू रही होतीं और मध्यम वर्ग का युवा अपने ही देश में किराए के मकान या होम लोन के बोझ तले घुटने के लिए मजबूर न होता।

यह स्थिति न केवल आर्थिक असमानता को बढ़ा रही है, बल्कि समाज में नैतिक पतन का भी प्रतीक है। जरूरत इस बात की है कि प्रवर्तन निदेशालय और सतर्कता विभाग जैसी जांच एजेंसियां केवल दिखावटी छापे मारने तक सीमित न रहें, बल्कि इस काले साम्राज्य की जड़ों तक पहुंचें। जब तक बेनामी संपत्तियों और भ्रष्टाचार की काली कमाई को रियल एस्टेट से पूरी तरह उखाड़ फेंका नहीं जाता, तब तक आम आदमी का अपनी जमीन पर आशियाना बनाने का सपना एक अधूरा और महंगा ख्वाब ही बना रहेगा।