राजनीति का चाणक्य कौन जनता या कोई रणनीतिकार
1984 से अब तक गौमुख से— गंगा सागर तक गंगा में बहा कितना पानी? बिखरा बहुजन ?देश को अहंकार-मुक्त नये मोर्चे की तलाश? एक विश्लेषण !!
धर्मेंद्र सिंह की कलम से (प्रदेश प्रभारी, उत्तर प्रदेश)
सन् 1984 अक्टूबर का महिना था। दिल्ली के आसमान में छाया था धुआं और देश के हृदय में था खून। इंदिरा गांधी की हत्या ने पूरे राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया था। उसी माहौल में चुनाव हुए और कांग्रेस चार सौ चौदह सीटों के साथ लोकतंत्र के सिंहासन पर बिराजमान हुई। देश वासियों ने राजीव गांधी के रूप में देश का भविष्य देखा। विपक्ष का अस्तित्व लगभग समाप्त हो चुआ था। भारतीय जनता पार्टी सिमट कर दो सीट पर आ गई थी। जेपी आंदोलन से निकले समाजवादी धड़े बिखर चुके थे। लोहिया की विरासत संभालने का दावा करने वाले नेताओं के पास न संगठन था, न दिशा। जनसंघ का राष्ट्रीय सपना धुंधला पड़ चुका था। वामपंथी पार्टियां बंगाल-केरल तक सीमित थीं। तमिलनाडु में एमजी रामचंद्रन और करुणानिधि के बीच द्रविड़ राजनीति ने ऐसी जड़ें जमा ली थीं कि राष्ट्रीय दलों का वहां दम घुटता था। कुल मिलाकर केंद्र में कांग्रेस के सामने कोई चुनौती नहीं थी। प्रांतों में भी ज्यादातर जगह कांग्रेस का ही परचम था। सिर्फ पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु का लाल किला अडिग था।
कांग्रेस के कितने ही दिग्गज आए और गए, पर बंगाल की मिट्टी ने वामपंथ को ढहने नहीं दिया। दक्षिण में डीएमके और एआईडीएमके के बीच सत्ता बदलती रही, पर विचारधारा नहीं बदली। द्रविड़ अस्मिता, तमिल भाषा और ब्राह्मण-विरोध की राजनीति ही वहां की नियति बन गई। बाकी राष्ट्रीय पार्टियां या तो डीएमके के साथ खड़ी होतीं या एआईडीएमके के साथ, अपना स्वतंत्र अस्तित्व कभी नहीं बना पाईं।
लेकिन इतिहास का नियम है कि शिखर के बाद ढलान आती है। राजीव गांधी की सरकार पांच साल भी ठीक से नहीं चल पाई कि बोफोर्स तोप सौदे की गूंज संसद से सड़क तक पहुंच गई। कांग्रेस के भीतर से ही आवाजें उठने लगीं। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बगावत का बिगुल फूंका। अरुण नेहरू, आरिफ मोहम्मद खान, वीसी शुक्ला जैसे नेता साथ आए। जनता के बीच नारा गूंजा कि "राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है।" यह नारा किसी चाणक्य की देन नहीं था, यह जनता के गुस्से की उपज था। उसी गुस्से ने उन्नीस सौ नवासी में कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंका। कांग्रेस के बूथों पर जो फौज खड़ी थी, वह देखते-देखते बिखर गई। लोकतंत्र ने फिर साबित किया कि जनता जिसे चाहे शिखर पर बिठा दे और जिसे चाहे शून्य पर ला दे। वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने, पर उनके साथ जेपी और लोहिया की प्रयोगशाला से निकले राजनीतिक वैज्ञानिक भी थे। उन्हीं वैज्ञानिकों ने देश की सबसे बड़ी सामाजिक इंजीनियरिंग को अंजाम दिया। मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू हुईं और रातोंरात देश की राजनीति पिछड़ा बनाम अगड़ा में बंट गई। एक तरफ मंडल था, दूसरी तरफ कमंडल। लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकाली। देश की नसों में राममंदिर का मुद्दा दौड़ने लगा। मंडल ने जिन जातियों को आवाज दी, कमंडल ने उनमें से एक बड़े हिस्से को हिंदुत्व की छतरी के नीचे ला दिया। यहीं से भारत की राजनीति का नया अध्याय शुरू हुआ।
उसी दौर में उत्तर प्रदेश की धरती पर एक नया सूर्य उगा। लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में मंच सजा था। मैं उस समय छात्र था। अपनी आंखों से वह दृश्य देखा था। मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी का उदय हो रहा था। मंच पर अगल-बगल ऊर्जा से भरे हुए चेहरे थे। समाज में गहरी पकड़ रखने वाले नेता थे। उस समय समाजवाद का अर्थ पीडीए नहीं था। समाजवाद का अर्थ था सबको साथ लेकर चलना। गांव का किसान, शहर का नौजवान, अल्पसंख्यक का भरोसा, पिछड़ों की उम्मीद — सब उस मंच पर एक साथ दिखते थे। उसी लखनऊ से कुछ समय बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा का पर्चा भरा। पहली बार हमने कमल के निशान पर बटन दबाया था। कौन था वह चाणक्य जिसने चौक की तंग गलियों से लेकर पुराने लखनऊ के इमामबाड़े तक अटल जी की छवि पहुंचा दी थी? कौन था जिसने लोगों के दिलों में यह बात बिठा दी कि अटल जी सिर्फ भाजपा के नहीं, पूरे लखनऊ के हैं? कोई एक व्यक्ति नहीं था। वह चाणक्य था अटल जी का व्यक्तित्व, उनकी कविता, उनकी सर्वग्राही भाषा और कांग्रेस-समाजवादी दोनों खेमों से जनता का मोहभंग। लखनऊ ने समाजवादी घेराबंदी तोड़ी और अटल जी को गले लगा लिया। उसी के बाद मध्यप्रदेश और गुजरात भाजपा की प्रयोगशाला बने। अटल-आडवाणी की जोड़ी ने राष्ट्रीय राजनीति में वह स्थान बनाया जो जनसंघ के समय सोचा भी नहीं जा सकता था।
नब्बे का दशक आते-आते क्षेत्रीय क्षत्रपों का युग शुरू हो गया। दिल्ली कमजोर हुई और राज्य मजबूत। बिहार में लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय की राजनीति को नई धार दी। हरियाणा में चौधरी देवीलाल किसान के मसीहा बने। कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर ने जड़ जमाई। उड़ीसा में बीजू पटनायक की विरासत पर बीजू जनता दल खड़ा हुआ। आंध्र में तेलुगु देशम पार्टी ने कांग्रेस को उखाड़ फेंका। यानी लोकतंत्र में राजतंत्र की परंपरा मजबूत होने लगी। हर राज्य का अपना राजा, अपना किला, अपना झंडा। केंद्र में गठबंधन की सरकारें बनने लगीं। कोई भी दल अकेले बहुमत के पास नहीं पहुंच पा रहा था। उसी दौर में कांग्रेस ने भी अपने भीतर वामपंथी विचारधारा को जगह दे दी। जेएनयू की प्रयोगशाला से निकले विचार धीरे-धीरे कांग्रेस की नीति बनने लगे। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस अपनी मूल जमीन से कटती चली गई।
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में भाजपा को भी झटका लगा। 2004 और 2009 में कांग्रेस गठबंधन के साथ वापस आई। पर मनमोहन सिंह की सरकार के दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों ने फिर से माहौल बदल दिया। अन्ना आंदोलन हुआ। उसी से अरविंद केजरीवाल निकले। उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस और भाजपा दोनों के किले ढहा दिए। देश को लगा कि शायद कोई तीसरा विकल्प बन रहा है। पर दिल्ली से बाहर निकलते ही वह विकल्प बिखर गया। क्योंकि विकल्प सिर्फ नारों से नहीं बनता, संगठन और जमीन से बनता है।
दो हजार चौदह में नरेंद्र दामोदर दास मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया। तीस साल बाद किसी एक पार्टी को जनता ने अपने दम पर सत्ता सौंपी। सन् चौरासी में जो भगवा दो सीट पर था, वह 2019 में तीन सौ तीन(303) पर पहुंच गया। अंग से बंग तक, कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कलिंग से कच्छ तक भाजपा का विस्तार हो गया। यह कैसे हुआ? किसी एक चाणक्य से नहीं। यह हुआ विपक्ष के अहंकार के टकराव से। कांग्रेस में पुत्र-मोह हावी रहा। जनता में लोकप्रिय नेताओं के पर काटे गए। नए लोगों को अवसर नहीं दिया गया। क्षेत्रीय दलों में परिवार-मोह हावी रहा। मुलायम सिंह के बाद अखिलेश, लालू के बाद तेजस्वी, करुणानिधि के बाद स्टालिन, बालासाहेब के बाद उद्धव, शरद पवार के बाद अजित-सुप्रिया की लड़ाई। जनता ने देखा कि जो समाजवाद और सामाजिक न्याय की बात करते थे, वे अपनी ही कुर्सी अपने बेटे-बेटी के लिए सुरक्षित कर रहे हैं।
इसी बीच वह टोपी वाला किस्सा भी देश ने देखा। एक मौलाना ने मंच पर नरेंद्र मोदी को टोपी पहनानी चाही और उन्होंने इनकार कर दिया। यह घटना होनी थी या ईश्वरीय संकेत था, बहस हो सकती है। पर जनता ने उसका अर्थ निकाला कि अब तुष्टिकरण नहीं चलेगा। बहुत टोपी पहनाई जा चुकी, अब बस। आज हालत यह है कि जो नेता भारत में सिर्फ एक समुदाय की टोपी पहनेगा, जनता उसे मुअज्जिन बना देगी। क्योंकि टोपी के सहारे सत्ता अब नहीं चलेगी। आजादी के साठ दशक बीत गए हैं। भारत को अब कुछ बड़ा चाहिए। सिर्फ जाति और मजहब के नाम पर वोट नहीं मिलेगा।
उत्तर भारत में इसी चौरासी के दशक में एक और प्रयोग शुरू हुआ। बामसेफ के माध्यम से कांशीराम ने दलित समाज को आंदोलित किया। उन्होंने रामास्वामी पेरियार, ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज जैसे महापुरुषों को उत्तर भारत के बहुजन समाज से परिचित कराया। नारे लगे, आंदोलन हुए। "तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार"
जैसे नारों ने समाज में विद्वेष भी फैलाया। मनुस्मृति जलाई गई। देवी-देवताओं पर टिप्पणी हुई। फिर भी सोशल इंजीनियरिंग के सहारे बसपा उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई। पर टिक नहीं सकी। क्यों? क्योंकि नफरत की बुनियाद पर भरोसे की इमारत ज्यादा दिन नहीं टिकती।
आज दो हजार छब्बीस में खड़े होकर जब हम पीछे देखते हैं तो गंगा से बहुत पानी बह चुका है। पर सवाल वही है कि 2027 में उत्तर प्रदेश की सत्ता किसे मिलेगी। बहुजन समाज की राजनीति आज खुद अपने ही जाल में फंसी है। मंडल के बाद मंडलियां बन गईं। हर जाति का अपना दल है। कुर्मी समाज के नेता सोनेलाल पटेल का अपना दल अब दो धड़ों में बंट चुका है। अनुप्रिया पटेल भाजपा के साथ हैं, पल्लवी पटेल सपा के साथ। कुर्मी वोट बंट गया। राजभर समाज के ओमप्रकाश राजभर कभी बसपा, कभी भाजपा, कभी सपा के साथ जाते हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने पूर्वांचल को स्विंग जोन बना दिया। निषाद समाज के संजय निषाद ने केवट-मल्लाह को आरक्षण की नाव पर बिठाकर सियासत की वैतरणी पार करने की कोशिश की। पासी समाज दलित राजनीति में अपनी अलग राह तलाश रहा है। महान दल जैसी पार्टियां अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। मौर्य, मुराव, लोनिया, चौहान — जो कभी एक साथ सबसे पिछड़े की लड़ाई लड़ते थे, आज सबके अपने मंच हैं। नतीजा यह कि जो बहुजन वोट कभी सपा-बसपा की ताकत था, वह आज फुटकर में बिक रहा है। भाजपा ने इसी बिखराव से गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित का अपना समीकरण बना लिया।
अब आते हैं अखिलेश यादव के पीडीए पर। पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक — कागज पर यह पचासी प्रतिशत का गठजोड़ है। पर जमीन पर इसने एक झटके में बीस प्रतिशत वोट की आहुति दे दी। कैसे? पहला, पीडीए का संदेश आम ओबीसी तक यह गया कि यह सिर्फ यादव-मुस्लिम गठजोड़ है। कुर्मी, मौर्य, राजभर, लोनिया ने खुद को इससे बाहर पाया। दूसरा, टिकट बंटवारे में यादव और मुस्लिम चेहरों को तरजीह मिली तो बाकी जातियों के छोटे दल नाराज हो गए। तीसरा, पीडीए में अगड़े के लिए कोई जगह नहीं दिखी, तो एक पूरा वर्ग पहले ही विमुख हो गया। अर्थात जिस पीडीए को अखिलेश ने 2027 का ब्रह्मास्त्र बनाया, वही बूथ पर आत्मघाती साबित हो रहा है। समाजवादी पार्टी ने खुद अपने लिए खाई खोद ली है। सत्ताईस में सत्ता कैसे मिलेगी, यह सवाल अब सबसे बड़ा है?
अब जरा राष्ट्रीय फलक पर नजर डालें। राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा निकाल रहे हैं। पर कांग्रेस का संगठन जमीन पर कहां है? जिन राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी, वहां भी गुटबाजी ने उसे खा लिया। पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश — हर जगह कांग्रेस अपनों से हारी। ममता बनर्जी बंगाल में दीदी थीं। चौंतीस साल के वाम किले को ढहाने के बाद ममता दीदी खुद एक किला बन गईं। पर अब उस किले की दीवारें ढह चुकी हैं। संदेशखाली से लेकर शिक्षक भर्ती घोटाले तक, भ्रष्टाचार और हिंसा ने बंगाल का मन तोड़ दिया। अभिषेक बनर्जी को उत्तराधिकारी बनाने की जिद ने पार्टी को परिवार तक सीमित कर दिया। *नतीजा सामने है — बंगाल ने विदाई कर दी, दो सौ पंद्रह से अस्सी पर लाकर रौंद दिया दीदी को।* जो कभी परिवर्तन का प्रतीक थी, उसे जनता ने यथास्थिति का चेहरा मानकर नकार दिया। दीदी का जादू खत्म, बंगाल में नया सवेरा होने को है। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली-पंजाब जीता, पर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा में गुजरात-गोवा तक जाकर संगठन बिखेर दिया। शराब नीति के आरोपों ने छवि को नुकसान पहुंचाया। एमके स्टालिन तमिलनाडु में मजबूत हैं, पर हिंदी पट्टी में डीएमके का कोई जनाधार नहीं। उधर तमिलनाडु की धरती पर अब एक नया सूरज उग रहा है। सिनेमा के पर्दे से उतरकर विजय ने तमिलग वैट्री कड़गम बनाई है। द्रविड़ राजनीति के पुराने फॉर्मूले से अलग, वह युवा, भ्रष्टाचार-मुक्त शासन और तमिल अस्मिता के साथ विकास की बात कर रहा है। करुणानिधि और जयललिता के बाद की पीढ़ी अब नया विकल्प तलाश रही है। डीएमके-एआईडीएमके की जुगलबंदी से ऊबे तमिलनाडु में टीवीके का बीज अंकुरित हो चुका है। शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य माने जाते थे, पर उम्र और परिवार की लड़ाई ने एनसीपी को दो फाड़ कर दिया। पावर अब पवार के पास नहीं दिखती। उद्धव ठाकरे के पास बालासाहेब की विरासत थी, पर एकनाथ शिंदे की बगावत ने सेना को तोड़ दिया। नाम और निशान तक छिन गया।
तो सवाल यह है कि इन सबके रहते भाजपा को चुनौती कौन देगा? क्या राहुल, अखिलेश, अभिषेक, केजरीवाल, स्टालिन, शरद और उद्धव का कोई मोर्चा बन सकता है? बन सकता है, पर शर्त एक है — अहंकार से मुक्ति। जब तक हर नेता खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानेगा, मोर्चा नहीं बनेगा। जब तक कांग्रेस बड़े भाई की भूमिका छोड़ेगी नहीं, क्षेत्रीय दल उस पर भरोसा नहीं करेंगे। जब तक अखिलेश यादव पीडीए को यादव-मुस्लिम से बाहर नहीं निकालेंगे, बाकी ओबीसी उनके साथ नहीं आएगा। ममता बनर्जी तो बंगाल में हारकर राष्ट्रीय राजनीति से लगभग बाहर हो चुकी हैं। विदाई के बाद अब त्याग का सवाल ही नहीं बचा। जब तक केजरीवाल मैं ही ईमानदार का बोर्ड उतारेंगे नहीं, गठबंधन में टिक नहीं पाएंगे। जब तक स्टालिन हिंदी पट्टी को गले नहीं लगाएंगे, दिल्ली दूर रहेगी और घर में विजय चुनौती बन चुका है। जब तक शरद पवार और उद्धव ठाकरे परिवार से बाहर देखेंगे नहीं, महाराष्ट्र भी हाथ से निकल जाएगा।
इतिहास गवाह है कि अहंकार के टकराव ने ही जनता दल को छिन्न-भिन्न किया था। वीपी सिंह, चंद्रशेखर, देवीलाल, मुलायम, लालू, नीतीश, शरद यादव — सब अपने-अपने अहंकार में टकराए और कांग्रेस को फिर से संजीवनी मिल गई। आज वही गलती विपक्ष दोहरा रहा है। बंगाल का नतीजा सबके सामने है। 2015 से अस्सी पर आना कोई सामान्य हार नहीं, जनता का सामूहिक धिक्कार है। यह संदेश है कि परिवारवाद, भ्रष्टाचार और हिंसा की राजनीति अब नहीं चलेगी। अगर 2027 में भाजपा को चुनौती देनी है तो एक ऐसा मोर्चा चाहिए जो नेता-प्रधान न हो, नीति-प्रधान हो। जिसका एजेंडा हो — राष्ट्रवाद पर समझौता नहीं, सामाजिक न्याय पर ढिलाई नहीं, और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय पर पूरी निष्ठा। जिसके पास इन तीन में से दो भी होंगे, वह लड़ाई में रहेगा। जिसके पास सिर्फ एक होगा, वह हाशिए पर रहेगा। बंगाल ने बता दिया कि जनता अब इंतजार नहीं करती, सीधे रौंद देती है।
जनता अब बहुत समझदार हो गई है। वह एग्जिट पोल में बताती कुछ और है, बटन दबाती कुछ और है। इसीलिए प्रदीप गुप्ता जैसे लोग बार-बार फेल हो रहे हैं। जनता को टोपी नहीं चाहिए, विकास चाहिए। जनता को भाषण नहीं चाहिए, रोजगार चाहिए। जनता को जाति का झुनझुना नहीं चाहिए, सम्मान चाहिए। जो यह देगा, जनता उसे चुनेगी। चाहे वह भाजपा हो, या अहंकार-मुक्त कोई नया मोर्चा।
अंत में वही बात — कोई नेता, कोई पार्टी स्थाई नहीं। स्थाई है तो सिर्फ जनता की नीयत। 1977 में जनता ने इमरजेंसी लगाने वाली इंदिरा को हटा दिया। 1980 में फिर वापस लाई। 1989 में राजीव को हटाया। 2014 में कांग्रेस को समेट दिया। 2026 में बंगाल ने दीदी को रौंद दिया। कल को अगर भाजपा में अहंकार आ गया, तो जनता उसे भी शिखर से शून्य करने में देर नहीं लगाएगी। क्योंकि लोकतंत्र में असली चाणक्य जनता है। वही चंद्रगुप्त बनाती है, वही चाणक्य बदल देती है।
गंगा में बहुत पानी बह चुका है। चौरासी से छब्बीस तक का सफर बता रहा है कि वक्त किसी का सगा नहीं। न कांग्रेस का, न जनता दल का, न सपा-बसपा का, न भाजपा का, न तृणमूल का। वक्त का सगा है तो सिर्फ वह जो वक्त की नब्ज पहचाने। जो जनता की नीयत पढ़े। जो राष्ट्र, समाज और सबके सुख को साथ लेकर चले। बाकी सब मोह-माया है। सत्ता आती-जाती रहेगी। देश चलता रहेगा। पर देश तभी आगे बढ़ेगा जब नेता अहंकार छोड़ेंगे और जनता को सचमुच चाणक्य मानेंगे।
लेखक के ये स्वतंत्र विचार हैं।





