मोबाइल स्क्रीन में कैद होता बचपन
तकनीक बच्चों की जरूरत है, लेकिन बचपन की जगह नहीं
एक समय था जब शाम ढलते ही मोहल्लों की गलियां बच्चों की आवाजों से भर जाती थीं। कोई क्रिकेट खेलता था, कोई साइकिल दौड़ाता था, तो कोई दोस्तों के साथ छुपन-छुपाई। आज उसी उम्र का बच्चा कई बार घर के एक कोने में मोबाइल की स्क्रीन के सामने बैठा दिखाई देता है। यह केवल जीवनशैली में आया बदलाव नहीं, बल्कि बचपन के स्वरूप में हो रहा एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है।
घर का एक आम दृश्य इस बदलाव को समझने के लिए काफी है। बच्चा खाना नहीं खा रहा है तो उसके सामने मोबाइल पर वीडियो चला दिया जाता है। वह रो रहा है तो फोन पकड़ा दिया जाता है। माता-पिता व्यस्त हैं तो मोबाइल उसके मनोरंजन का साधन बन जाता है। यहीं से सुविधा धीरे-धीरे आदत और आदत निर्भरता में बदलने लगती है। जिस उपकरण का इस्तेमाल कुछ समय के लिए बच्चे को व्यस्त रखने के लिए किया गया था, वही उसके खाली समय का सबसे बड़ा आकर्षण बन जाता है।
इसी का असर बच्चों की दिनचर्या में दिखाई देता है। पार्क में खेलने के बजाय गेम खेलना, कहानी की किताब के बजाय छोटे-छोटे वीडियो देखना और दोस्तों से आमने-सामने बातचीत करने के बजाय स्क्रीन पर संवाद करना केवल मनोरंजन की पसंद बदलना नहीं है। बचपन की सामाजिकता, शारीरिक सक्रियता और कल्पनाशीलता का बड़ा हिस्सा अनुभवों से बनता है; जब ये अनुभव स्क्रीन तक सीमित होने लगते हैं, तो बचपन का दायरा भी सिमटने लगता है।
यहां समस्या मोबाइल फोन नहीं, उसके इस्तेमाल का असंतुलन है। ऑनलाइन पढ़ाई, शैक्षिक सामग्री और जानकारी तक पहुंच के लिए मोबाइल उपयोगी है। लेकिन जब पढ़ाई के लिए खोली गई स्क्रीन उसी समय मनोरंजन की अंतहीन दुनिया भी खोल दे, तो बच्चे के लिए उद्देश्य और आकर्षण के बीच फर्क करना कठिन हो सकता है। इसलिए सवाल यह नहीं कि बच्चों के हाथ में मोबाइल होना चाहिए या नहीं; सवाल यह है कि मोबाइल उनके जीवन में कितना और किस उद्देश्य से होना चाहिए।
इस स्थिति के लिए केवल बच्चों को जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं होगा। जिस घर में बच्चा खाना खाते समय मोबाइल देखता है, वहां अक्सर बड़े भी उसी समय अपने फोन में व्यस्त होते हैं। बच्चा देखकर सीखता है। इसलिए बच्चों के स्क्रीन-समय की चर्चा परिवार की डिजिटल आदतों की चर्चा के बिना अधूरी है। माता-पिता यदि हर खाली क्षण मोबाइल से भरेंगे, तो बच्चे से मोबाइल छोड़कर किताब या मैदान चुनने की अपेक्षा कमजोर पड़ जाएगी।
इसलिए समाधान प्रतिबंध से ज्यादा अनुशासन और विकल्प में है। घर में भोजन और पारिवारिक बातचीत के समय मोबाइल से दूरी, बच्चों के लिए नियमित खेल का समय, पुस्तक-पठन की आदत और सप्ताहांत में आउटडोर गतिविधियां छोटे लेकिन प्रभावी कदम हो सकते हैं। स्कूल भी केवल डिजिटल शिक्षा पर निर्भर रहने के बजाय खेल, कला, साहित्य और सामूहिक गतिविधियों को पर्याप्त महत्व दें। बच्चे को स्क्रीन से हटाने के लिए केवल 'नहीं' कहना पर्याप्त नहीं; उसके सामने 'इसके बजाय क्या' का विकल्प भी होना चाहिए।
दरअसल, बचपन को मोबाइल से बचाने का अर्थ बच्चों को आधुनिक तकनीक से दूर करना नहीं है। इसका अर्थ है उन्हें यह सिखाना कि तकनीक उनके जीवन का साधन है, जीवन का विकल्प नहीं। डिजिटल दुनिया जरूरी है, लेकिन वास्तविक दुनिया भी उतनी ही जरूरी है—जहां बच्चा दौड़ता है, गिरता है, फिर उठता है, दोस्त बनाता है, हारता-जीतता है और अपनी कल्पना से कुछ नया रचता है।
बचपन को स्क्रीन से मुक्त करना लक्ष्य नहीं होना चाहिए; बचपन को स्क्रीन के अधीन होने से बचाना लक्ष्य होना चाहिए। मोबाइल बच्चों के हाथ में रहे, लेकिन उनके समय, ध्यान और कल्पना की बागडोर मोबाइल के हाथ में न जाए।





