मिथिलांचल में मधुश्रावणी
रामप्रवेश चौधरी (संपादक)
मधुश्रावणी पर्व मुख्य रूप से बिहार के मिथिला क्षेत्र में प्रचलित है, यह व्रत सावन महीने के कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन से ही शुरू होता है इसके साथ ही सभी शादीशुदा महिलाएं इसकी तैयारी में जुट जाती हैं इस महीने में चारों तरफ मधुश्रावणी के गीत गूंजने लगते हैं।
यह पर्व नवविवाहित महिलाएं ही करती हैं, इस पर्व के दौरान नवविवाहिता प्रतिदिन सुबह माता गौरी एवं भगवान शंकर की पूजा करती हैं और 15 दिनों तक बिना नमक का ही भोजन करती हैं।
मधुश्रावणी पूजन करनेवाली नवविवाहिता सोलह श्रृंगार कर सखियों के साथ गीत गाते हुए बाग बगीचे से फूल और पत्तियां तोड़कर पहले आसपास में किसी मंदिर पहुंचती है और वहां उन्हें टोकरी में सजाती हैं फिर उसे लेकर अपने-अपने घर आती हैं।
नवविवाहिता प्रतिदिन सज-धजकर फूल पत्तियों से शिव पार्वती की पूजा करती हैं और अपने सुहाग की रक्षा की कामना करती हैं।
15वें दिन पर्व के समापन पर नवविवाहिता के ससुराल से ढेर सारे कपड़े, गहने और भोज की सामग्री आती है फिर समापन समारोह मनाया जाता है।
मधुश्रावणी की कथा के दौरान महिला ही पुरोहित का काम करती हैं और वही मधुश्रावणी व्रत की कथा सुनाती हैं तत्पश्चात नवविवाहिता को उनके पति द्वारा एक निशान शरीर पर दिया जाता है जिसे मिथिलांचल में टेमी कहा जाता है। इसके साथ ही मधुश्रावणी पर्व का समापन हो जाता है।





