दिलीप राय के मैदान में उतरने से मुकाबला रोचक हुआ
ओडिशा राज्यसभा चुनाव;दिलीप राय के मैदान में उतरने से मुकाबला रोचक हुआ
सतीश शर्मा (उप संपादक)
होटल व्यवसायी और पूर्व केंद्रीय कोयला मंत्री दिलीप राय ने मंगलवार (3 मार्च, 2026) को राज्यसभा चुनाव के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरने की घोषणा की है। राज्य भाजपा अध्यक्ष मनमोहन सामल ने उनके समर्थन की घोषणा की, जिससे चार रिक्त हो रही सीटों में से एक पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
2 अप्रैल को राज्य में खाली हो रही चार सीटों के लिए 16 मार्च को मतदान होना है। ओडिशा में भाजपा के पास दो सीटें जीतने लायक संख्या है, जबकि बीजू जनता दल (बीजद) एक सीट सहजता से जीत सकती है। चौथी सीट के लिए किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है।बीजद अध्यक्ष नवीन पटनायक ने प्रसिद्ध यूरोलॉजिस्ट डॉ. दत्तेश्वर होता को चौथी सीट के लिए “साझा उम्मीदवार” घोषित किया है, जिसे कांग्रेस का भी समर्थन प्राप्त है। ऐसे में दिलीप राय के मैदान में उतरने से मतदान होना निश्चित हो गया है। भाजपा अध्यक्ष मनमोहन सामल ने कहा, “यदि हमें उनकी जीत का विश्वास नहीं होता तो हम उनका समर्थन नहीं करते।” राज्य विधानसभा के संख्या बल का समीकरण दो सीटें जीतने के बाद भाजपा के पास 22 अतिरिक्त वोट बचेंगे, जबकि दिलीप राय को जीत के लिए 8 और वोटों की जरूरत होगी। बीजद एक सीट जीतने के बाद 18 अतिरिक्त वोटों के साथ रहेगी। कांग्रेस के 14 विधायकों के समर्थन से डॉ. होता को कुल 32 वोट मिल सकते हैं। यदि क्रॉस वोटिंग नहीं होती है तो बीजद समर्थित उम्मीदवार की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। मेफेयर होटल ग्रुप के मालिक दिलीप राय ने कहा, “मैं 5 मार्च को नामांकन दाखिल करूंगा और सभी दलों से समर्थन मांगूंगा।” उन्होंने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन माझी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल से मुलाकात की है। श्री सामल ने भी सिद्धांततः श्री राय की उम्मीदवारी को समर्थन देने की पुष्टि की।
दिलीप राय का राजनीतिक सफर
दिलीप राय ने 1985 में राउरकेला स्वशाषित परिषद के चेयरमैन के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। उसी वर्ष वे राउरकेला से विधायक चुने गए । 1990 में दोबारा विधायक बने और बीजू पटनायक के नेतृत्व वाली जनता दल सरकार में उद्योग मंत्री रहे। 1995 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार प्रभात महापात्र ने अप्रत्याशित रूप से परास्त कर दिया। पर उसके बाद बीजू पटनायक ने उन्हें 1996 में राज्यसभा के लिए नामित किया और वे लगातार दो कार्यकाल (1996-2002 और 2002-2008) राज्य सभा सांसद रहे।
वे अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार में कोयला मंत्री थे।
दिलीप राय बीजद के संस्थापक सदस्य थे।परंतु कुछ मतभेद उभरने के बाद नवीन पटनायक ने 2002 में उन्हें दल से निष्कासित कर दिया था। तब उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा चुनाव लड़ा था और चौंकाने वाली जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में बीजद और भाजपा के कई विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर उनका समर्थन किया था।
कुछ समय कांग्रेस में रहने के बाद उन्होंने 2009 में वे भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। 2014 में भाजपा टिकट पर वे राउरकेला से तीसरी बार विधायक निर्वाचित हुए। परंतु 2024 में उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि श्री राय उस समय जीत दर्ज कर सकते थे, तो वर्तमान परिस्थितियों में भी वे मुकाबले को रोचक बना सकते हैं। हालांकि, बीजद की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर दिख रही है और कांग्रेस के लिए अपने विधायकों को एकजुट रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।अतः दिलीप राय के चुनाव लड़ने की घोषणा ने चुनाव में रोमांच का पुट घोल दिया है। क्या वे दोबारा फिर नवीन पटनायक के लिए शर्मिंदगी का कारण बनेंगे यह 16 मार्च को पता चलेगा।





