जालियावाला बाग के शहिदों को नमन

जालियावाला बाग के शहिदों को नमन

नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार) 

13अप्रैल वर्ष 1919 को पंजाब के अमृतसर शहर के पास स्थित "जलियावाला बाग़" स्थल पर बैशाखी पर्व के दिन अंग्रेजी शासन के काले क़ानून "रोलेट एक्ट" के खिलाफ गांधी वादी तरीके से विरोध को लेकर बड़ी संख्या(लगभग 5 हज़ार लोग)में आस पास के ग्रामों से स्थानीय ग्रामीण जिनमें ज्यादातर सिख-हिन्दू थे,विचार विमर्श के लिए उपस्थित हुए थे.

इस सम्बन्ध में हंसराज नामक व्यक्ति ने तत्कालीन अग्रेजी साशन के जनरल डायर को सुचना दी कि बड़ी संख्या में बाग में जमा ग्रामीण शासन के विरुद्ध बड़ा षडयंत्र रचने जलियावाला बाग में जमा हो रहे है.बिना उपयुक्त जांच के जनरल डायर ने 90 सशस्त्र सैनिकों  को अपने साथ लेकर तीन तरफ से ऊँची दीवारों से घिरे बाग़ के मुख्य द्वार पर घेर लिया।  यही उसने सैनिकों को खड़ा कर निहत्थे-निर्दोष लोगों पर अचानक अन्धाधुन्ध 1560 राउंड गोलियां चलवा दी थी.एकाएक चली गोलियों और उससे मची भगदड़ की वजह से गैर सरकारी आकड़ों के अनुसार 1200 लोग शहीद तथा 2000 लोग घायल हो गए थे.घटना स्थल पर शहीद हुए लोगों की संख्या के सबंध में *काग्रेस की जांच कमिटी* ने भी लगभग ऐसे ही आंकड़े प्रस्तुत किये थे.जिनके अनुसार 125 लोग तो जान बचाने के उद्देश्य से शहीदी कुएं में कूद कर मारे गए थे। वहीं ब्रिटिश सरकार के  रिकार्डों में सिर्फ 484 मृत व्यक्तियों का ही विवरण मिलता है.सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार मृत लोगों में 337 पुरुष और शेष महिला और नाबालिक बच्चे जिसमे एक महज 7 सप्ताह का बच्चा भी शामिल था.बेवजह की गई उक्त हत्या काण्ड से पुरे भारत में अंग्रेजी साशन के विरुद्ध आवाजें उठने लगी.उक्त हत्या काण्ड से क्षुब्द *गुरु रविन्द्र नाथ जी ने अग्रेजों से उन्हें संम्मान में मिली "नाइट हुड" की उपाधि लौटा दी थी*.वहीँ कांग्रेस ने भी हत्याकांड के दोषी जनरल डायर के विरुद्ध व्यापक प्रदर्शन कर अंग्रेजी साशन से उसे दण्डित किये जाने की मांग रखी थी.इसके उलट अंग्रेजी सरकार ने जनरल डायर को दण्डित किये जाने के बजाए उसे ब्रिटेन वापस बुला कर उसका सम्मान किया था.इधर घटना के विरोध में पुरे देश में अंग्रेजों के विरुद्ध हिंसात्मक प्रदर्शन होने लगे.सरकार के पक्षपात पूर्ण रवैये से नाराज कांग्रेसियो ने गांधी जी के नेतृत्व में 1920 को असहयोग आंदोलन की शुरुवात कर दी.वस्तुतः अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध पूरा देश एक साथ उठ खड़ा हुआ था.उक्त हत्या कांड ने शहीदे आजम भगत सिंह को भी बेहद प्रभावित किया था वे उक्त घटना के बाद से ही कान्तिकारी के रूप में खुल कर सत्ता के विरुद्ध खड़े हुए थे.इधर घटना स्थल पर उपस्थित शहीद ऊधम सिंह ने भी जनरल डायर की हत्या का दृढ़ संकल्प लेकर आख़िरकार वर्ष 1940 में यूरोप डायर जाकर उसकी हत्या की और जलियावाला बाग का बदला लिया था.आज भी जलियावाला बाग़ में बड़े नरसंहार के भयावह प्रमाण में यहां देखने को मिलते है.बीते वर्षों बिटेन की महारानी एलिजियाबेथ एवम प्रधान मंत्री डेविड कामरान ने जलीयांवाला बाग़ पहुंचकर ना केवल शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी, बल्कि तत्कालीन अमानवीय भूल पर खेद भी प्रकट किया था. 

आइये इन पंक्तियों के साथ हम आज के दिन जलियावाला बाग़ हत्या काण्ड में मारे गए निहत्थे-निर्दोष शहीदों को याद कर उन्हें सादर श्रद्धांजलि अर्पित करें।।।

*इन इतर कयासों को छोड़ो,मैं खूंरेजी का किस्सा हूँ*

*हूँ ख़्वार मगर पाकीज़ा हूँ,मैं जलियाँ वाला हिस्सा हूँ*

*नस-नस में लावा बहने की, ये रुधिर फुलंगों की बातें* 

*क्षत-विक्षत बिखरे रक्त सने, अपनों के अंगों की बातें*

*फूलों के कुचले जाने की, गुंचों के मसले जाने की*

*कुचलों को और कुचलने की, गिरतों को और गिराने की*

*अपने हिस्से की साँसों की, अपनी निज़ता की बातों की* 

*बारूदों की ज़द में मचले, बेख़ौफ़ उठे अरमानों की*

*अंतिम निर्णय का शंखनाद,मैं विद्रोहों का किस्सा हूँ*
 
*मैं मतवालों की मस्ती हूँ मैं, जलियाँ वाला हिस्सा हूँ*

*ग़ुस्ताख़ी मत करना कोई, चौकंद यहाँ पर रहना तुम*

*ख़ामोशी से ख़ामोशी को, कुछ कह लेना कुछ सुनना तुम*
 
*धीरे-धीरे हौले-हौले, जेहाद की आवाज़ें सुनना*

*ज़िद में मचलीं आज़ादी की, उन्माद की आवाज़ें सुनना।*

*महसूस करो तो कर लेना, स्व-राज की खूनी तनातनी*

*अरमान उठे तो भर लेना, मुट्ठी में मिट्टी लहू सनी।*

*कण कण फिर बोल उठेगा मैं, किस आहुति का किस्सा हूँ*

*हूँ ख़्वार मगर पाकीज़ा हूँ, मैं जलियाँ वाला हिस्सा हूँ*