जनता के रक्षक या सड़कों के भक्षक जनहित के नामपर सियासी नौटंकी
लोकतंत्र में विपक्ष का काम सत्तापक्ष को घेरना है, लेकिन हमारे देश के परम प्रतापी आंदोलनकारियों ने इसका एक बेहद अनूठा और 'सफल' फॉर्मूला खोज निकाला है—जनता का गला घोंटो, तभी सरकार सुनेगी! कितनी अद्भुत विडंबना है कि लड़ाई जनता के हक की बताई जाती है, और सबसे पहले बलि भी उसी आम जनता की चढ़ाई जाती है। सड़क जाम करना, चौराहे रोकना, और जबरन बाजार बंद करवाना आजकल के तथाकथित जन-हितैषियों का सबसे प्रिय शगल बन चुका है। हाल ही में ओडिशा में इंडिया गठबंधन के 12 घंटे के बंद के दौरान जिस तरह सड़कों पर टायर जलाकर चक्का जाम किया गया, या दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट मार्च के नाम पर मेट्रो स्टेशनों को बंद कर आम मुसाफिरों की रफ्तार रोकी गई, वह इस बात का गवाह है कि जनता को परेशान करना ही अब राजनीतिक दलों का मुख्य हथियार बन गया है।
इन आंदोलनकारियों का चश्मा भी कमाल का है। इन्हें लगता है कि सड़क पर एम्बुलेंस में जिंदगी और मौत से जूझता मरीज, परीक्षा के लिए भागता छात्र, या रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाला दिहाड़ी मजदूर ही 'असली सरकार' हैं, इसलिए इन्हें सजा देना सबसे जरूरी है। कैट (CAIT) की एक होलिया रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में ऐसे ही धरने-प्रदर्शनों और ट्रैफिक जाम के कारण कारोबार को 4000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान झेलना पड़ा है। वीआईपी गाड़ियां तो हूटर बजाती हुई बगल के रास्ते से मजे में निकल जाती हैं, और हमारे नेताजी धूप में पसीना बहाती बेबस जनता को देखकर मन ही मन मुस्कुराते हैं कि चलो, आज का 'पब्लिसिटी स्टंट' कामयाब रहा। जनता त्राहि-त्राहि कर रही है, यानी आंदोलन पूरी तरह 'सफल' है!
इस पूरे सियासी सर्कस का सबसे मजेदार और सुखद परिणाम मिलता है हमारे लाखों कर्मठ सरकारी कर्मचारियों को सामूहिक आकस्मिक अवकाश मिल जाता हैं या किसी बड़े विरोध मार्च के चलते रास्ते बंद होने से दफ्तरों में सन्नाटा पसर जाता है, तो बिना किसी मेडिकल के बैठे-बिठाए एक शानदार 'अघोषित छुट्टी' मिल जाती है। दफ्तर बंद, काम ठप, लेकिन वेतन पूरा! वाह रे आंदोलन! जनता सड़कों पर धूप और प्रदूषण में धक्के खाती है, और सरकारी बाबू घर पर पकौड़े तलकर इस महान क्रांति का आनंद लेते हैं।
हाँ, इसके अगले दिन अदालतों और दफ्तरों में फाइलों का पहाड़ थोड़ा और ऊंचा हो जाता है। जो इंसाफ कल मिलना था, वह अब अगले साल की किसी तारीख पर शिफ्ट हो जाता है। पर इससे आंदोलनकारियों को क्या फर्क पड़ता है? उनका मकसद तो पूरा हो गया—अखबारों में तस्वीरें छप गईं, टीवी पर बहस हो गई। आम नागरिक को यह समझना होगा कि ये धरने-प्रदर्शन आपकी भलाई के लिए नहीं, बल्कि आपको मोहरा बनाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए किए जाते हैं। जब तक जनता इन 'सड़क छाप' क्रांतियों पर ताली बजाना बंद नहीं करेगी, तब तक जनहित के नाम पर यह क्रूर मजाक यूँ ही चलता रहेगा।





