एनआईटी राउरकेला में शहरी चरम मौसम और सतत शहरी नियोजन पर राष्ट्रीय सम्मेलन
सतीश शर्मा (उप संपादक)
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) राउरकेला के पृथ्वी एवं वायुमंडलीय विज्ञान विभाग द्वारा "शहरी चरम मौसमीय घटनाएं : शहरीकरण एवं भूमि उपयोग-भूमि आवरण परिवर्तन की भूमिका" विषय पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ है। अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF), एटमॉस्फियर एंड क्लाइमेट रिसर्च–मॉडलिंग एंड वेदर (ACRMW) तथा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज रिसर्च (CCCR) के सहयोग से आयोजित इस सम्मेलन में देशभर के वैज्ञानिक, शिक्षाविद, शोधकर्ता, नीति-निर्माता, शहरी योजनाकार और छात्र भाग ले रहे हैं।
सम्मेलन के संरक्षक एवं एनआईटी राउरकेला के निदेशक प्रो. के. उमामहेश्वर राव ने अध्यक्षता में शुरू हुए सम्मेलन में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), पुणे के निदेशक
डॉ. ए. सूर्यचंद्र राव,,मुख्य अतिथि के रूप में थे। उनके साथ प्रो. अशोक करुमुरी (हैदराबाद विश्वविद्यालय) विशिष्ट अतिथि थे। उद्घाटन सत्र में रजिस्ट्रार प्रो. रोहन धीमान, विभागाध्यक्ष प्रो. नरेश कृष्णा विस्सा, सम्मेलन अध्यक्ष एवं संयोजक प्रो. नागराजू चिलुकोटी तथा सचिव एवं सह-संयोजक प्रो. कृष्ण किशोर सूरी भी मौजूद रहे।
मुख्य अतिथि डॉ. ए. सूर्यचंद्र राव ने भारत में तेजी से बढ़ती शहरी आबादी के कारण शहरी बाढ़, हीट वेव और वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने भारत सरकार की 'मिशन मौसम' पहल का जिक्र करते हुए उन्नत मौसम पूर्वानुमान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), हाइपरलोकल जलवायु मॉडलिंग और वैज्ञानिक शहरी नियोजन को जलवायु-सुरक्षित शहरों के निर्माण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
विशिष्ट अतिथि प्रो. अशोक करुमुरी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग परिवर्तन और चरम मौसमीय घटनाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं। उन्होंने सतत शहरी विकास के लिए वायुमंडलीय विज्ञान, इंजीनियरिंग, शहरी नियोजन, अर्थशास्त्र और सार्वजनिक नीति के समन्वित शोध की आवश्यकता पर बल दिया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. के. उमामहेश्वर राव ने कहा कि चरम मौसमीय घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति को देखते हुए समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान पर केंद्रित शोध की आवश्यकता है। उन्होंने वैज्ञानिकों से सतत शहरीकरण, जल सुरक्षा, प्रभावी भूमि उपयोग और जलवायु अनुकूलन के लिए व्यावहारिक समाधान विकसित करने का आह्वान किया।
इससे पहले प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए प्रो. नागराजू चिलुकोटी ने कहा कि तीव्र शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव के कारण शहरी हीट वेव, फ्लैश फ्लड और क्षेत्रीय जलवायु पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक समाधान के बीच की दूरी को कम करते हुए जलवायु-अनुकूल एवं टिकाऊ शहरों के लिए रणनीति तैयार करना है।
विभागाध्यक्ष प्रो. नरेश कृष्णा विस्सा ने बताया कि पृथ्वी एवं वायुमंडलीय विज्ञान विभाग राष्ट्रीय मिशनों और अंतर्विषयक शोध में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। स्थापना के बाद से विभाग 600 से अधिक अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्र प्रकाशित कर चुका है।
तीन दिवसीय सम्मेलन में शहरी जलवायु, भूमि उपयोग एवं भूमि आवरण परिवर्तन, संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान, शहरी लचीलापन तथा सतत शहरी नियोजन जैसे विषयों पर मुख्य व्याख्यान, तकनीकी सत्र और विचार-विमर्श आयोजित किए जाएंगे। सम्मेलन का उद्देश्य उभरती जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के बीच सहयोग को मजबूत करना है।





