हाॅकी चैम्पियन सुनेलिता टोप्पो से सारांश दैनिक की खास बातचीत

माता-पिता का सपना पूरा हुआ, अब ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतना लक्ष्य’ - सुनेलिता टोप्पो

हाॅकी चैम्पियन सुनेलिता टोप्पो से सारांश दैनिक की खास बातचीत

सतीश शर्मा: उप संपादक

जापान के आइची-नागोया में संपन्न 20वें एशियाई खेलों में भारत ने 21 स्वर्ण पदकों सहित कुल 85 पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। इस ऐतिहासिक उपलब्धि में भारतीय महिला हॉकी टीम का स्वर्ण पदक विशेष महत्व रखता है। 44 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद एशियाई खेलों में स्वर्णिम सफलता हासिल कर भारतीय महिला हॉकी टीम ने इतिहास रच दिया।
इस गौरवशाली उपलब्धि में ओडिशा की 19 वर्षीय प्रतिभाशाली मिडफील्डर सुनेलिता टोप्पो की भूमिका भी उल्लेखनीय रही। सुंदरगढ़ जिले के राजगांगपुर प्रखंड के छोटे से गांव कुकुड़ा की रहने वाली सुनेलिता ने अपनी मेहनत, लगन और खेल के प्रति समर्पण से न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे ओडिशा को गौरवान्वित किया है।
एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के साथ ही भारतीय महिला हॉकी टीम ने वर्ष 2028 में होने वाले लॉस एंजिलिस ओलंपिक के लिए सीधे क्वालीफाई कर लिया। 
ऐतिहासिक सफलता के बाद जब सुनेलिता अपने गांव लौटीं, तब संवाददाता सतीश शर्मा ने उनसे स्वर्ण पदक जीतने की खुशी, टीम की तैयारियों, परिवार और प्रशिक्षकों के योगदान तथा ओलंपिक को लेकर उनकी उम्मीदों पर विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश।

प्रश्न: एशियाई खेलों के सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबलों से पहले टीम में कैसा माहौल था? 

सुनेलिता : दोनों महत्वपूर्ण मुकाबलों से पहले हुई टीम बैठकों में हमने मैच की रणनीति पर चर्चा करने के साथ-साथ अपनी भावनाएं भी साझा कीं। प्रत्येक खिलाड़ी ने बताया कि इस टूर्नामेंट में पदक जीतना उसके लिए कितना महत्वपूर्ण है।
किसी खिलाड़ी ने बताया कि उसकी मां ने उसे पदक जीतते हुए देखने का सपना संजोया है। किसी ने परिवार के किसी अस्वस्थ सदस्य का जिक्र करते हुए कहा कि वह पदक जीतकर उन्हें खुशी देना चाहती है। एक खिलाड़ी ने बताया कि बचपन में उसकी मां ने उसके हाथों में हॉकी स्टिक थमाते हुए कहा था कि एक दिन वह जरूर पदक जीतेगी।
इन भावनात्मक बातों को सुनकर हम सभी भावुक हो गई थीं। उस समय हमें एहसास हुआ कि हम केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने परिवारों के सपनों और पूरे देश की उम्मीदों के लिए भी खेल रही हैं। इस एहसास ने टीम में एक नई ऊर्जा, दृढ़ संकल्प और एकजुटता पैदा की। हम सभी मैदान पर जीत के इरादे से उतरी थीं।

प्रश्न: मुख्य कोच मारिजने ने टीम की तैयारी और इस सफलता में किस तरह योगदान दिया?

सुनेलिता: कोच मारिजने ने प्रत्येक खिलाड़ी की ताकत और कमजोरियों का बारीकी से विश्लेषण किया। उन्होंने हमारी व्यक्तिगत क्षमताओं के अनुरूप तैयारी कराई और उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया, जिनमें सुधार की जरूरत थी। उनकी रणनीति, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन से हमें अपनी क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिली। 

प्रश्न: फाइनल मुकाबले में कप्तान सलीमा टेटे की चोट और गोलकीपर सविता द्वारा पेनाल्टी स्ट्रोक रोकने की घटना ने टीम को किस तरह प्रभावित किया?

सुनेलिता : फाइनल मुकाबले के दौरान कप्तान सलीमा टेटे के हाथ में चोट लग गई थी। हालांकि, कुछ समय बाद वह फिर मैदान पर लौट आईं। चोट के बावजूद उनका मैदान पर वापस आना और टीम के लिए संघर्ष जारी रखना हम सभी के लिए बड़ी प्रेरणा थी। कप्तान के इस जज्बे ने हमारा संकल्प और मजबूत कर दिया। हम सभी के मन में यही भावना थी कि हमें हर हाल में अपनी कप्तान के लिए जीतना है और देश को गौरवान्वित करना है।
इसी तरह, हमारी गोलकीपर सविता ने एक महत्वपूर्ण पेनाल्टी स्ट्रोक रोककर टीम को बड़ी राहत दी। उनके इस शानदार प्रदर्शन से हमारा आत्मविश्वास बढ़ा और खिलाड़ियों का उत्साह दोगुना हो गया। हमें विश्वास हो गया कि कठिन परिस्थितियों में भी हम मुकाबले पर अपनी पकड़ बनाए रख सकती हैं।

प्रश्न: विश्व कप में अच्छे प्रदर्शन के बाद एशियाई खेलों को लेकर टीम का लक्ष्य क्या था? क्या स्वर्ण पदक जीतने का विश्वास पहले से था?

सुनेलिता : विश्व कप में अच्छे प्रदर्शन के बाद ही हमने तय कर लिया था कि एशियाई खेलों से बिना पदक जीते वापस नहीं लौटना है। हमारी पूरी टीम इस लक्ष्य को लेकर गंभीर थी। हम चाहते थे कि विश्व कप में मिले अनुभव का लाभ उठाते हुए एशियाई खेलों में और बेहतर प्रदर्शन करें। टीम की प्रत्येक खिलाड़ी ने इस लक्ष्य को अपना व्यक्तिगत लक्ष्य माना और इसके लिए पूरी मेहनत की।

प्रश्न: आज आप जंहा पहुंचीं है उसका श्रेय किसे देंगी?

सुनेलिता : किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे अनेक लोगों का समर्थन और सहयोग होता है। परिवार का भरोसा और मार्गदर्शकों का प्रोत्साहन हमें मुश्किल समय में आगे बढ़ने की ताकत देता है। इनमें माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
मेरे माता-पिता ने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया और हॉकी खेलने के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया। उनका विश्वास और समर्थन मेरे लिए बहुत मायने रखता है।
मेरे गांव के कोच डोमनिक टोप्पो ने मुझे हॉकी का पहला पाठ पढ़ाया। उन्हीं से मैंने इस खेल की शुरुआती बारीकियां सीखीं। इसके बाद सुंदरगढ़ स्थित साई हॉस्टल में प्रवेश लेने के बाद कोच पी.के. षाड़ंगी से प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और सहयोग मिला। इन सभी लोगों के योगदान के बिना मेरे लिए यहां तक पहुंचना आसान नहीं होता।

प्रश्न: स्वर्ण पदक जीतने के बाद उस ऐतिहासिक पल को आपलोगों ने किस तरह जिया?

सुनेलिता : मैच समाप्त होने के बाद हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतना अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन इसके साथ ही वर्ष 2028 के लॉस एंजिलिस ओलिंपिक के लिए सीधे क्वालीफाई करने की खुशी ने हमारे उत्साह को दोगुना कर दिया। हम सभी खिलाड़ी कमरे में पहुंचकर जमकर नाचीं। वह हमारे जीवन के सबसे यादगार पलों में से एक था।

प्रश्न: अगले ओलिंपिक खेलों के लिए सीधे क्वालीफाई करना आपके लिए क्या मायने रखता है?

सुनेलिता : ओलिंपिक में खेलना दुनिया के हर खिलाड़ी का सपना होता है। वर्ष 2024 के पेरिस ओलिंपिक के लिए भारतीय महिला हॉकी टीम क्वालीफाई नहीं कर सकी थी। इसका मलाल हमारी सीनियर खिलाड़ियों को था। इसलिए अगले ओलिंपिक के लिए सीधे क्वालीफाई करना हम सभी के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।
हमारा एक बड़ा सपना पूरा हुआ है। अब हमारी कोशिश होगी कि हम ओलंपिक में भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करें। केवल ओलंपिक में भाग लेना ही हमारा लक्ष्य नहीं है, बल्कि वहां अच्छा प्रदर्शन करके देश के लिए पदक जीतना भी हमारी प्राथमिकता है।