व्यवस्था का विरोधाभास: जब नियमों का पालन करना भी सज़ा बन जाए

व्यवस्था का विरोधाभास: जब नियमों का पालन करना भी सज़ा बन जाए

भारतीय शिक्षा व्यवस्था इस समय एक ऐसे अजीबोगरीब और विडंबनापूर्ण दौर से गुजर रही है, जहां इसके दो सिरों पर खड़े जिम्मेदार लोग विपरीत कारणों से संकट में हैं। एक तरफ देश के शिक्षामंत्री रहे धर्मेंद्र प्रधान पर प्रतियोगी परीक्षाओं में सिस्टम की नाकामी और बड़े पैमाने पर धांधली व नकल (चीटिंग) न रोक पाने के राजनीतिक दबाव और विफलताओं के आरोप लगे,और शिक्षा मंत्री के पद से त्याग पत्र देना पडा़, तो दूसरी तरफ अकादमिक जगत के एक प्रतिष्ठित शिक्षक—आईआईटी मुंबई के प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला—को इसलिए अपने पद से त्याग पत्र देना पड़ा क्योंकि उन्होंने परीक्षा के दौरान एक छात्र को नकल करने से रोका था। यह दोहरी तस्वीर भारतीय शिक्षा प्रणाली के भीतर पसरे गहरे संकट, राजनीतिक नूराकुश्ती और नैतिक पतन को बेनकाब करती है।

केंद्रीय स्तर पर जब परीक्षाओं की पवित्रता भंग होती है, पेपर लीक होते हैं और नकल माफिया हावी होते हैं, तब सिस्टम की धुरी संभालने वालों पर नैतिक और प्रशासनिक गाज गिरती है। यह इस बात का प्रमाण है कि व्यापक स्तर पर अव्यवस्था को रोकने में सरकारें विफल रही हैं। दूसरी ओर, परिसरों के भीतर स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब नियमों का पालन कराने वाले शिक्षकों को ही बलि का बकरा बना दिया जाता है। आईआईटी मुंबई की घटना यह दर्शाती है कि कैसे अकादमिक ईमानदारी और कदाचार के खिलाफ उठाया गया एक सख्त कदम भी एक बड़े मानवीय और सामाजिक विवाद का रूप ले सकता है। इन दोनों घटनाओं का तुलनात्मक विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि हमारी पूरी प्रणाली किस कदर दबाव में है।

यह विरोधाभास समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि सिस्टम नकलचोरों को संरक्षण देगा और परीक्षा की शुचिता बनाए रखने वाले शिक्षकों को इस तरह हतोत्साहित किया जाएगा, तो शिक्षण संस्थानों से अनुशासन हमेशा के लिए गायब हो जाएगा। शिक्षा की धुरी 'योग्यता और ईमानदारी' पर टिकी है, न कि राजनीतिक दबाव या भय के माहौल पर। जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था इतनी पारदर्शी और मजबूत बने जहां न तो मंत्रियों को कुप्रबंधन के लिए बैरंग लौटना पड़े और न ही किसी शिक्षक को अपने कत्तव्यों का पालन करने के एवज में प्रताड़ना या विरोध का सामना करना पड़े।