नक्सल प्रभावित क्षेत्र में शांति स्थापना के लिए प्रयासरत जवान ने खून देकर बचाई नक्सली की जान
मुद्दे की बात
नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)
सिर्फ नक्सलवादी हिंसा से लड़ ही नहीं रहे,बल्कि क्षेत्र में जीवन और पर्यावरण दोनो को बचाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं हमारे जवान,,
बीते कल प्रदेश के भीषण नक्सल हिंसा प्रभावित बस्तर संभाग के दो जिलों से बेहद प्रेरक तस्वीरें सामने आई,जो यह बताने के लिहाज से काफी है,कि किस तरह हमारे सुरक्षा कर्मी क्षेत्र में सालों से सक्रिय बर्बर और हिंसक माओवाद से लड़ने के अलावा यहां के आम नागरिकों सहित माओवाद हिंसा से जुड़े लड़ाकों की जान बचाने के साथ साथ पर्यावरण संरक्षण के प्रति स्थानीय लोगों को जागरूक करने का सत्कार्य(जिम्मेदारी) निभा रहे हैं।
भले ही प्रतिफल में उन्हे दूसरी तरफ से चलाई गई गोलियों और बारूदों का डट कर सामना करना पड़ रहा है,जिसमे उनके अपने साथी या तो शहीद हो रहे हैं या गंभीर रूप से घायल हो रहे है। बावजूद इसके आप जवानों ने शांति स्थापित करने के अपने प्रयासों के प्रति कभी निराशा या भेदभाव पूर्ण व्यवहार का प्रदर्शन नहीं किया है।
पहली तस्वीर में कांकेर जिले के बड़गांव थाना क्षेत्र के मेंढरा जगन में हुई मुठभेड़ स्थल से सामने आ रही है यहां सर्च आपरेशन में निकली बीएसएफ और जिला बल के टीम पर घात लगाए नक्सलियों ने जोरदार हमला किया। हमले का जवाब देते हुए बीएसएफ के दो जवान गंभीर रूप से आहत भी हो गए,जबकि जवाबी कार्यवाही में बड़ा नुकसान उठाते हुए मैदान छोड़कर भागे नक्सली लड़ाकों की एक महिला साथी जो खुद गोली लगने के कारण से बुरी तरह आहत हुई थी,उसे छोड़ गए। मुठभेड़ के बाद जवानों के एरिया सर्च के दौरान घायल अवस्था में तड़पती महिला नक्सली नजर आई। जिसे फौरन इलाज की आवश्यकता थी। मौके की नजाकत को समझते हुए बहादुर जवानों ने बिना समय गंवाए,घायल महिला लड़ाके को इस दुर्गम और पहुंचविहीन क्षेत्र से अपने कंधों में लादकर सड़क तक लाया। यहां जवानों के इलाज के लिए लाई गई एंबुलेंस में उसका प्राथमिक उपचार किया गया। उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए महिला को एंबुलेंस के माध्यम से जिला अस्पताल कांकेर लाया गया। यहां जवानों ने अपने साथियों के घायल करने वाली महिला नक्सली को बिना भेदभाव अपना खून भी दिया। ताकि उसकी जान बचाई जा सके।
दूसरी तरफ बीजापुर जिले के सुदूर नक्सल हिंसा ग्रस्त केरलापाल गांव में सीआरपीएफ की पहल से पर्यावरण के लिए जीवन शैली अभियान कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। बल के जवानों के प्रयासों से सैकड़ों के संख्या में यहां आए ग्रामीणों,बच्चों और महिलाओं को पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझाया।
कभी गोलियों और बारूदों से थर्राने वाली इस इलाके में पहली बार " "हम सबको साथ आना है पर्यावरण को बचाना है" के नारे गूंजते दिखे।।
दोनो तस्वीरें बस्तर में तेजी से बदलते हालात और सुरक्षा जवानों के प्रति ग्रामीणों में खत्म होते कृत्रिम दुर्भाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है।।
हालाकि यहां जारी खूनी लड़ाई के बीच पहले भी इस तरह की तस्वीरें सामने आ चुकी है,जहां मुठभेड़ के बाद अपने ही खून के प्यासे घायल नक्सल लड़ाकों की जान बिना भेदभाव हमारे जवानों ने बचाया है। सर्चिंग अभियान के दौरान क्षेत्र में गंभीर रूप से बीमार मिले ग्रामीणों और नक्सल परिजनों को कई किमी तक अपने कंधे में ढोकर अस्पताल भी पहुंचाया है,यहां तक कि समय पड़ने पर जवानों ने उन्हें अपना खून भी दिया है। हालाकि चर्चा कल सामने आई इन दो तस्वीरों की ज्यादा है। आज से करीब 3 साल पहले ध्यान देने योग्य एक घटना आपको याद होगी,किस तरह नारायणपुर जिले के सोनपुर कैंप के पास सर्च अभियान में निकली आईटीबीपी टीम के लीडर इंस्पेक्टर प्रमोद तिवारी और जिला बल के जवानों ने बीच जंगल में ही सुरक्षा घेरा बना कर प्रसव पीड़ा से कराह रही आदिवासी महिला को वहीं चिकित्सा सहायता देकर उसका सुरक्षित प्रसव कराया था।





