नई शिक्षा नीति में नेपाल से सीख लेने की जरूरत

सौ टके का सवाल क्या पडोसी देश नेपाल से भारत सरकार को कुछ सीखने की जरूरत है?

नई शिक्षा नीति में नेपाल से सीख लेने की जरूरत

धर्मेंद्र सिंह (प्रदेश प्रभारी, उत्तर प्रदेश) की क़लम से (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है,तकरीबन तीन दसक से पत्रकारिता करते आ रहे है और वर्तमान में सारांश न्यूज़ नेटवर्क (समाचार एजेंसी में उत्तर प्रदेश के प्रभारी के पदपर कार्यरत है!! 

सौ टके का सवाल ?
क्या पडोसी देश नेपाल से भारत सरकार को कुछ सीखने की जरूरत है?

सवाल यह है की पडोसी देश  के नये प्रधानमंत्री बालेन शाह के हालिया फैसले भारत के लोगों की   जो पीड़ा है उसका जो  दर्द है  उसे भी बालेन  शाह  जैसे नेता के जैसे फैसलों से मरहम लगेगा ?  क्या भारत सरकार को बालेन के फैसलों का अध्ययन कर उन्हें यहां लागू करना चाहिए? क्या विदेशी नाम वाले स्कूलों पर ताला लगना चाहिए? क्या प्रधानमंत्री के पोते और ग्राम प्रधान के नाती को एक ही बेंच पर बैठना चाहिए? क्या पूरे देश में एक ही किताब चलनी चाहिए? क्या चौकीदार और जिलाधिकारी के बच्चे एक ही प्रार्थना में खड़े हों? क्या हर नौकरशाह के लिए अपने बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ाना अनिवार्य कर दिया जाए? ये सवाल जितने सरल लगते हैं, जवाब उतने ही पेचीदा हैं। नारा लगाना आसान है, नीयत बदलना मुश्किल।चलो समझते हैं।

भारत में शिक्षा आज सबसे बड़ा स्टेटस सिंबल है। एक तरफ एयरकंडीशन बस से इंटरनेशनल स्कूल जाने वाले बच्चे हैं जिनके बैग में टैबलेट और टिफिन में सैंडविच होता है। दूसरी तरफ सरकारी प्राइमरी स्कूल का वह बच्चा है जो मास्टरजी के चुनाव ड्यूटी पर चले जाने के कारण बरामदे में बैठकर मिड-डे मील का इंतज़ार करता है। असर की रिपोर्ट चीख-चीख कर कहती है कि गांव के कक्षा पांच के आधे से ज्यादा बच्चे कक्षा दो की किताब नहीं पढ़ पाते। वहीं शहर के प्राइवेट स्कूल का बच्चा पांचवी में फ्रेंच और कोडिंग सीख रहा है। ऐसे में ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा उस मां को चुभता है जो कलेक्टर के दफ्तर के बाहर अपने बच्चे का एडमिशन कराने के लिए लाइन में खड़ी है, जबकि कलेक्टर का बच्चा उसी वक्त स्विमिंग पूल वाले स्कूल में एंट्री ले रहा है।

बालेन ने नाम पर वार किया था। भारत में भी ‘इंटरनेशनल’, ‘ग्लोबल’, ‘अमेरिकन’ नाम की बाढ़ है। इनमें से अधिकतर स्कूलों का सिलेबस सीबीएसई का है, शिक्षक बीएड वाले हैं, लेकिन फीस हार्वर्ड वाली है। यह सीधा-सीधा भ्रामक विज्ञापन का मामला है। पर इसका हल स्कूल बंद करना नहीं हो सकता। अगर ताला लगा दिया तो ढाई करोड़ से ज्यादा बच्चे एक दिन में सड़क पर आ जाएंगे। हल यह है कि नाम की पारदर्शिता तय हो। जो स्कूल ‘इंटरनेशनल’ लिखे, उसके यहां कम से कम बीस प्रतिशत शिक्षक विदेशी डिग्री वाले हों या पंद्रह प्रतिशत बच्चे विदेशी पासपोर्ट वाले हों। जो ‘ऑक्सफोर्ड’ लिखे, वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एनओसी लाए। वरना छह महीने में नाम बदलो। साथ ही हर स्कूल के गेट पर क्यूआर कोड हो। अभिभावक स्कैन करे और तुरंत जान जाए कि बोर्ड कौन सा है, मान्यता कब तक है, फीस का ब्रेकअप क्या है और शिक्षक-छात्र अनुपात कितना है। झूठ पकड़ा गया तो मान्यता रद्द और जुर्माना। इससे लूट रुकेगी, शिक्षा नहीं।

दूसरा बड़ा मुद्दा ‘नेता का बच्चा कहां पढ़े’ का है। भावना बिल्कुल सही है कि जब तक नीति बनाने वाले का बच्चा टूटी बेंच पर नहीं बैठेगा, तब तक बेंच नहीं बनेगी। पर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के बच्चों को हर सरकारी स्कूल में सुरक्षा कारणों से भेजना व्यावहारिक नहीं है। तो बीच का रास्ता क्या हो? बीच का रास्ता ‘स्किन इन द गेम’ का है। हर जिले में पांच ‘संविधान स्कूल’ बनाए जाएं। ये केंद्रीय विद्यालय स्तर के होंगे — पूरी सुविधा, अंग्रेजी और मातृभाषा दोनों, स्मार्ट क्लास, लाइब्रेरी, खेल मैदान। इनमें पचास प्रतिशत सीट आसपास के बीपीएल परिवारों के बच्चों के लिए लॉटरी से, तीस प्रतिशत सीट सामान्य मध्यम वर्ग के लिए और बीस प्रतिशत सीट अनिवार्य रूप से जिले के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, मुख्य विकास अधिकारी, विधायक, सांसद और जिला जज के बच्चों के लिए आरक्षित हो। अगर साहब का बेटा उसी आरओ का पानी पिएगा तो आरओ महीने भर खराब नहीं पड़ा रहेगा। साथ ही हर आईएएस और आईपीएस की ट्रेनिंग में शपथ जोड़ी जाए कि सेवा के पहले दस साल में कम से कम तीन साल तक मेरे पाल्य सरकारी, केंद्रीय या नवोदय विद्यालय में पढ़ेंगे। अपवाद की स्थिति सार्वजनिक पोर्टल पर कारण सहित दर्ज हो। छत्तीसगढ़ में जब मुख्यमंत्री ने ऐसी अपील की तो अठारह आईएएस अफसरों ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में डाला और छह महीने में उन स्कूलों की सूरत बदल गई। क्योंकि जहां ‘साहब का बच्चा’ होता है, वहां मास्टर समय पर आता है।

अब बात एक किताब, एक सिलेबस की। नई शिक्षा नीति एक करिकुलम फ्रेमवर्क की बात करती है, एक किताब की नहीं। वजह वाजिब है। भारत एक कक्षा नहीं, पूरा महाद्वीप है। तमिल बच्चे को तिरुवल्लुवर पढ़ना है, असम के बच्चे को शंकरदेव, महाराष्ट्र के बच्चे को तुकाराम। इसलिए ‘सत्तर-तीस’ का फॉर्मूला सबसे बेहतर है। सत्तर प्रतिशत हिस्सा पूरे देश में एक हो — गणित, विज्ञान, अंग्रेजी, कंप्यूटर, वित्तीय साक्षरता, संविधान, पर्यावरण। यह हिस्सा एनसीईआरटी तय करे और किताब भी वही हो। इससे नीट, जेईई, सीयूईटी, यूपीएससी जैसी परीक्षाओं में समान अवसर मिलेगा। बाकी तीस प्रतिशत हिस्सा राज्य जोड़े — स्थानीय इतिहास, भूगोल, भाषा, लोक संस्कृति, राज्य के महापुरुष। इस तरह पहचान भी बचेगी और एकता भी। डिजिटल युग में यह बेहद आसान है। दीक्षा पोर्टल पर पहली से बारहवीं तक की एनसीईआरटी किताबें मुफ्त उपलब्ध हैं। सरकार अगर हर बच्चे को टैबलेट और इंटरनेट दे दे तो ‘किताब माफिया’ और पेपर लीक दोनों पर लगाम लग जाएगी।

चौकीदार और जिलाधिकारी के बच्चे को एक बेंच पर लाने का सपना कानून से नहीं, लालच से पूरा होगा। आज डीएम अपना बच्चा प्राइवेट में क्यों भेजता है? क्योंकि सरकारी स्कूल में बाउंड्री नहीं, टॉयलेट साफ नहीं, अंग्रेजी बोलने वाला शिक्षक नहीं। काठमांडू में बालेन ने पहले सामुदायिक स्कूलों को बेहतर किया। स्मार्ट क्लास लगवाई, बायोमेट्रिक हाजिरी शुरू की, अभिभावक के मोबाइल पर एसएमएस जाने लगा कि बच्चा पहुंचा या नहीं। नतीजा यह हुआ कि दो साल में ग्यारह हजार बच्चे प्राइवेट स्कूल छोड़कर सरकारी में लौट आए। भारत को भी यही करना है। हर ब्लॉक में एक मॉडल स्कूल बनाओ और उस स्कूल की रैंकिंग जिलाधिकारी के सालाना गोपनीय रिपोर्ट से जोड़ दो। जिस दिन डीएम का प्रमोशन स्कूल के रिजल्ट पर टिकेगा, उस दिन मास्टर साहब बीएलओ ड्यूटी कहकर गायब नहीं होंगे।

नेपाल से हम पांच बड़ी बातें बिना नकल के सीख सकते हैं। पहली, मेयर को ताकत दो। भारत में चौहत्तरवां संविधान संशोधन कागजों में है। मेयर के पास न बिल्डिंग प्लान पास करने की पावर है, न बजट। नेपाल के  मेयर के पास है, इसलिए शहर बदल रहा है। दूसरी, तोड़ने से पहले बसाने की सोचो। बालेन मेयर रहते हुए फुटपाथ  से दुकानें हटवाईं तो वेंडिंग जोन भी दिए। भारत में हम हटाते हैं, बसाते नहीं। तीसरी, राजनीति में प्रोफेशनल्स के साथ अनुभवी को जगह दो। बालेन रैपर हैं, स्ट्रक्चरल इंजीनियर हैं, तैंतीस साल के हैं और जनता से सीधे फेसबुक लाइव से जुडते  हैं। चौथी, नाम नहीं नीयत पकड़ो। नेपाल मे स्कूल बंद नहीं किए, सिर्फ झूठे बोर्ड उतरवाए और सुधार का मौका दिया। पांचवी, जनता दरबार को डिजिटल बनाओ। बालेन हर हफ्ते लाइव आकर लोगों के सवाल सुनते  हैं। भारत में डीएम से लेकर पीएम तक को ‘डिजिटल जनता दरबार’ अनिवार्य करना चाहिए, जहां अड़तालीस घंटे में जवाब देना लीगल बाध्यता हो।
लेकिन अंधानुकरण खतरनाक होगा। नेपाल तीन करोड़ का देश है, भारत एक सौ तैंतालीस करोड़ का। काठमांडू बीस लाख का शहर है, दिल्ली-एनसीआर साढ़े तीन करोड़ का। जो काम वहां दस बुलडोजर से हो गया, वह यहां दस हजार से भी नहीं होगा, जब तक पुनर्वास की योजना साथ न हो। फिर शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। केंद्र सरकार ‘एक किताब’ का फरमान जारी नहीं कर सकती। तमिलनाडु ने नीट पर जो स्टैंड लिया, वह उदाहरण सामने है। इसके अलावा सुरक्षा का मसला है। प्रधानमंत्री के परिवार को हर सरकारी स्कूल में एसपीजी सुरक्षा देना संभव नहीं। इसलिए चुनिंदा केंद्रीय विद्यालयों को रोल मॉडल बनाकर वहीं से शुरुआत करनी होगी।

तो रास्ता क्या है? रास्ता ‘बुलडोजर’ नहीं, ‘ब्लूप्रिंट’ है। रास्ता ‘ताला’ नहीं, ‘ट्रांसपेरेंसी’ है। रास्ता ‘फरमान’ नहीं, ‘फेडरल सहमति’ है। हमें चार हजार ब्लॉक में चार हजार ‘संविधान स्कूल’ बनाने होंगे। इन स्कूलों की ग्रेडिंग यूडाइस प्लस डेटा से हो और जिले के डीएम-डीईओ की एसीआर का पच्चीस प्रतिशत वेटेज इन्हीं ग्रेड से तय हो। हमें ‘नेम वेरिफिकेशन अथॉरिटी’ बनानी होगी जो ‘इंटरनेशनल’ और ‘ऑक्सफोर्ड’ जैसे नामों की जांच करे। हमें ‘फीस कैलकुलेटर कानून’ लाना होगा जिससे अभिभावक जान सके कि फीस का गणित क्या है। हमें ‘शिक्षक गरिमा मिशन’ चलाना होगा जिसमें बीएड के बाद एक साल की पेड इंटर्नशिप अनिवार्य हो और आईआईटी-एम्स के प्रोफेसर महीने में एक लेक्चर सरकारी स्कूल में दें। हमें ‘राजनेता-अफसर शपथ पोर्टल’ बनाना होगा जहां हर जनप्रतिनिधि और ग्रुप-ए अफसर बताए कि उसका बच्चा कहां पढ़ता है। झूठ बोला तो आचार संहिता का उल्लंघन माना जाए।

अंत में बात वही है कि बालेन ने हमें आईना दिखाया है। उन्होने साबित किया कि कुर्सी की असली ताकत नियत से आती है, नोटिस से नहीं। भारत को उनसे साहस उधार लेना है, कानून नहीं। क्योंकि हमारी चुनौती बड़ी है, विविधता ज्यादा है और संविधान की मर्यादा भी। ‘समान शिक्षा’ का मतलब एक जैसी यूनिफॉर्म नहीं, एक जैसे अवसर है। ‘प्रधानमंत्री के पोते और प्रधान के नाती’ एक स्कूल में तभी पढ़ेंगे जब स्कूल ऐसा होगा कि प्रधानमंत्री का पोता वहां गर्व से जाए। उसके लिए नारे नहीं, निगरानी चाहिए। वादे नहीं, वाउचर चाहिए। भाषण नहीं, लैब चाहिए।

नेपाल ने चिंगारी दिखाई है, आग हमें अपने चूल्हे में जलानी है। और वह आग ‘बयान’ से नहीं, ‘बेंच’ से जलेगी। जिस दिन चौकीदार और कलेक्टर का बच्चा एक ही बेंच पर बैठकर ‘जन गण मन’ गाएगा, उस दिन समझ लेना कि नारा स्वप्न बन गया और स्वप्न भारत। क्योंकि आखिर में देश नेताओं के भाषण से नहीं, बच्चों की कॉपी से बदलता है। 

तकदीर बदलनी है, 
तस्वीर बदलनी है ,
अब बातों से नहीं ,
वादों से नहीं,
 चिंतन कर,
 संकल्प लेनी है !!