धर्मेंद्र प्रधान का सियासी सफर और अगली भूमिका पर नजर

धर्मेंद्र प्रधान का सियासी सफर और अगली भूमिका पर नजर

सतीश शर्मा (उप संपादक) 

केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद धर्मेंद्र प्रधान की अगली राजनीतिक भूमिका को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हैं। भाजपा इसे उनकी राजनीतिक पराजय नहीं, बल्कि जवाबदेही और उच्च नैतिक मानदंड का उदाहरण बता रही है। वहीं, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा उनके प्रति जताए गए खुले समर्थन को उनके संगठनात्मक महत्व का संकेत माना जा रहा है।

पेपर लीक आंदोलन से इस्तीफे तक
धर्मेंद्र प्रधान के राजनीतिक जीवन का एक दिलचस्प संयोग यह है कि छात्र जीवन में वे प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करते हुए पुलिस लाठीचार्ज में घायल हुए थे, जबकि आज उन्हें परीक्षा प्रश्नपत्र लीक विवाद की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद छोड़ना पड़ा।

वर्ष 1997 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जे.बी. पटनायक के शासनकाल में प्रश्नपत्र लीक के विरोध में एबीवीपी के बैनर तले राज्य सचिवालय के सामने हुए प्रदर्शन का नेतृत्व धर्मेंद्र प्रधान ने किया था। उस दौरान पुलिस लाठीचार्ज में वे घायल हुए थे। उस आंदोलन के दबाव में तत्कालीन सरकार को भी कार्रवाई करनी पड़ी थी।

"मैं स्ट्रीट फाइटर हूं"

इस्तीफे के बाद भी धर्मेंद्र प्रधान के तेवर बदले नहीं हैं। 27 जुलाई को संसद भवन में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने उनसे मुलाकात कर कहा, "इट हैपन्स।" इस पर प्रधान ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "नथिंग हैपन्ड। आई एम ए स्ट्रीट फाइटर, नॉट एन एसी रूम एक्टिविस्ट।"
उनका यह बयान स्पष्ट संकेत देता है कि वे खुद को राजनीतिक संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार मानते हैं और भविष्य की जिम्मेदारियों के लिए भी आत्मविश्वास से भरे हैं।

पार्टी का पूरा समर्थन

इस्तीफे के बाद गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन सहित पार्टी के शीर्ष नेताओं ने सार्वजनिक रूप से धर्मेंद्र प्रधान के कार्यों और शिक्षा क्षेत्र में उनके योगदान की सराहना की। संसद पहुंचने पर एनडीए सांसदों द्वारा उनका गर्मजोशी से स्वागत भी इस बात का संकेत माना गया कि पार्टी में उनका राजनीतिक कद बरकरार है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि प्रधान का इस्तीफा किसी कमजोरी का नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही और नैतिक मूल्यों का परिचायक है।

छात्र राजनीति से राष्ट्रीय नेतृत्व तक

26 जून 1969 को वरिष्ठ भाजपा नेता स्वर्गीय डॉ. देबेन्द्र प्रधान के घर जन्मे धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े और तालचेर कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्ष बने। उत्कल विश्वविद्यालय छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव वे मामूली अंतर से हार गए, लेकिन इससे उनका राजनीतिक सफर नहीं रुका।
1994 में वे एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव बने। बाद में भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और फिर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक सहित कई राज्यों में संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
चुनावी और संसदीय सफर
वर्ष 2000 में उन्होंने पाललहड़ा विधानसभा सीट से पहली बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। 2004 में देवगढ़ से लोकसभा सांसद चुने गए। इसके बाद वे बिहार और मध्य प्रदेश से दो बार राज्यसभा सदस्य रहे। वर्ष 2024 में दो दशक बाद उन्होंने ओडिशा से लोकसभा चुनाव लड़ा और संबलपुर से सांसद निर्वाचित हुए।

कुशल संगठनकर्ता और रणनीतिकार

धर्मेंद्र प्रधान को भाजपा का कुशल संगठनकर्ता और चुनावी रणनीतिकार माना जाता है। बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में संगठनात्मक जिम्मेदारियों का सफल निर्वहन करने के साथ-साथ ओडिशा में भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
भाजपा के वरिष्ठ नेता समीर महंती के अनुसार, धर्मेंद्र प्रधान ने पार्टी के सामाजिक आधार को व्यापक बनाने और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में अहम योगदान दिया है।
वरिष्ठ पत्रकार रूबेन बनर्जी का मानना है कि 2014 में केंद्रीय मंत्री बनने के बाद प्रधान लगभग हर सप्ताहांत ओडिशा पहुंचकर संगठन को मजबूत करने में जुटे रहते थे। कार्यकर्ताओं के बीच इसे मजाक में "वीकेंड पॉलिटिक्स" भी कहा जाता था।

ओडिशा की राजनीति पर असर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मंत्री पद छोड़ने के बावजूद ओडिशा भाजपा में धर्मेंद्र प्रधान का प्रभाव कम होने वाला नहीं है। वर्ष 2014 से भाजपा के विस्तार और 2024 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की ऐतिहासिक सफलता में उनकी भूमिका निर्णायक रही है।
वे कभी ओडिशा के मुख्यमंत्री पद और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के संभावित दावेदार भी माने गए थे। हालांकि, दोनों जिम्मेदारियां उन्हें नहीं मिलीं।

आगे क्या?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निकट भविष्य में केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनकी वापसी भले तत्काल न हो, लेकिन संगठन में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल सकती है। अगले एक वर्ष में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में भाजपा धर्मेंद्र प्रधान के संगठनात्मक अनुभव और चुनावी रणनीति का व्यापक उपयोग कर सकती है।
उनके समर्थकों का मानना है कि मंत्री पद छोड़ने से उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता और जनविश्वास में कमी नहीं आएगी, बल्कि "त्याग" और "जवाबदेही" की छवि उन्हें भविष्य में और मजबूत बनाएगी।