जब रावण ने ही श्रीराम को दिया लंका विजय का आशीर्वाद

जब रावण ने ही श्रीराम को दिया लंका विजय का आशीर्वाद

रामकथा का एक रोचक प्रसंग: रावण ने जब शत्रुता से ऊपर उठकर निभाया पुरोहित का धर्म

विशेष लेख | सारांश दैनिक

क्या आप जानते हैं कि रामकथा की एक प्रचलित लोकपरंपरा के अनुसार, जिस रावण से युद्ध करने के लिए भगवान श्रीराम लंका की ओर बढ़ रहे थे, उसी रावण ने श्रीराम के लिए भगवान शिव की पूजा संपन्न कराई थी? इतना ही नहीं, कथा के अनुसार, उसने श्रीराम को विजय का आशीर्वाद भी दिया था।

यह प्रसंग जितना रोचक है, उतना ही गहरा संदेश भी देता है। यह हमें रावण के व्यक्तित्व के उस पक्ष से परिचित कराता है, जो उसकी विद्वत्ता, धार्मिक ज्ञान और पुरोहित के रूप में कर्तव्यपालन से जुड़ा है।

लेकिन इस कथा को समझने के लिए हमें रामायण की मूल कथा और उससे जुड़ी लोकमान्यताओं के बीच अंतर भी समझना होगा।

1. लंका विजय की तैयारी और भगवान शिव की आराधना

रामकथा के अनुसार, रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया था। भगवान श्रीराम का उद्देश्य माता सीता को रावण के बंधन से मुक्त कराना और अधर्म का अंत करना था।  श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव, हनुमान, लक्ष्मण और वानर सेना की सहायता से लंका तक पहुंचने की तैयारी की। समुद्र पर सेतु निर्माण और लंका की ओर प्रस्थान की घटनाएं रामकथा के सबसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में गिनी जाती हैं।

इसी यात्रा से जुड़ी एक लोकपरंपरा में वर्णन मिलता है कि लंका पर चढ़ाई करने से पहले भगवान श्रीराम ने भगवान शिव की आराधना करने और विजय का आशीर्वाद प्राप्त करने का संकल्प लिया। पूजा संपन्न कराने के लिए एक योग्य पुरोहित की आवश्यकता थी। ऐसी मान्यता के अनुसार, उस समय रावण जैसा विद्वान व्यक्ति वैदिक अनुष्ठानों और शास्त्रीय विधियों का ज्ञाता माना जाता था। रावण केवल लंका का राजा ही नहीं था। रामकथा की अनेक परंपराओं में उसे वेदों का ज्ञाता, प्रकांड विद्वान और भगवान शिव का अनन्य भक्त भी बताया गया है। यहीं से इस अनोखे प्रसंग की शुरुआत होती है। लोकप्रचलित कथा के अनुसार, जब श्रीराम के सामने भगवान शिव की पूजा संपन्न कराने के लिए योग्य पुरोहित का प्रश्न आया, तब रावण की विद्वत्ता का उल्लेख हुआ। रावण स्वयं भगवान शिव का उपासक था और धार्मिक अनुष्ठानों की विधियों का जानकार माना जाता था। कथा के एक प्रचलित रूप में श्रीराम की ओर से उसे पूजा संपन्न कराने के लिए आमंत्रित किया गया।

आश्चर्य की बात यह थी कि श्रीराम और रावण के बीच संघर्ष होना निश्चित था। एक ओर श्रीराम अपनी पत्नी सीता को मुक्त कराने के लिए लंका पर विजय प्राप्त करना चाहते थे, तो दूसरी ओर रावण वही राजा था जिसने सीता को अपने अधिकार में रखा था। फिर भी इस लोककथा में रावण पुरोहित के रूप में अपने धार्मिक कर्तव्य का निर्वाह करता दिखाई देता है। यह प्रसंग रावण के चरित्र के एक विरोधाभासी पक्ष को सामने लाता है। एक ओर उसके कर्मों की निंदा की जाती है, तो दूसरी ओर उसकी विद्वत्ता और धार्मिक ज्ञान का उल्लेख मिलता है। इस कथा का उद्देश्य रावण के गलत कार्यों को उचित ठहराना नहीं, बल्कि यह बताना है कि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व में विद्वत्ता और नैतिक पतन जैसे परस्पर विरोधी पक्ष भी मौजूद हो सकते हैं।

इस लोककथा के कुछ प्रचलित रूपों में पूजा के समय एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। हिंदू धार्मिक परंपराओं के अनेक वैदिक अनुष्ठानों में पति-पत्नी की संयुक्त सहभागिता का विशेष महत्व माना गया है। कथा के अनुसार, जब पूजा के लिए श्रीराम के साथ माता सीता की उपस्थिति का प्रश्न उठा, तब रावण ने इस धार्मिक आवश्यकता की ओर ध्यान दिलाया। उस समय माता सीता लंका में थीं। कथा के एक रूप में रावण उन्हें पूजा में शामिल होने के लिए लेकर आता है, ताकि अनुष्ठान विधिपूर्वक पूरा हो सके। यह प्रसंग कथा को एक और रोचक मोड़ देता है। जिस सीता को रावण ने लंका में रखा हुआ था, उसी सीता की धार्मिक अनुष्ठान में उपस्थिति को आवश्यक बताया जाता है। 

लोकपरंपरा के अनुसार, पूजा संपन्न होने के बाद श्रीराम ने पुरोहित के रूप में उपस्थित रावण के प्रति सम्मान प्रकट किया। इसके बाद रावण ने उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया। इस प्रसंग में रावण की भूमिका विशेष ध्यान आकर्षित करती है। वह जानता था कि श्रीराम का उद्देश्य लंका पर विजय प्राप्त करना है। फिर भी पुरोहित के रूप में अनुष्ठान संपन्न कराने की कथा उसे अपने धार्मिक दायित्व का पालन करते हुए दिखाती है। कहानी का यही पहलू इसे लोकप्रिय बनाता है। जिस व्यक्ति को श्रीराम के विरुद्ध युद्ध करना था, उसी के द्वारा श्रीराम को विजय का आशीर्वाद देना पहली दृष्टि में विरोधाभासी लगता है। लेकिन कथा का संदेश यह है कि धार्मिक कर्तव्य, विद्वत्ता और व्यक्तिगत शत्रुता के प्रश्नों को अलग-अलग दृष्टि से भी देखा जा सकता है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि यह प्रसंग रामकथा की एक लोकप्रचलित परंपरा है। इसे वाल्मीकि रामायण की निर्विवाद मूल घटना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

रावण को केवल एक राक्षस राजा के रूप में समझने से उसके चरित्र की पूरी जटिलता सामने नहीं आती।

रामकथा की विभिन्न परंपराओं में वह महान विद्वान, शक्तिशाली शासक और शिवभक्त भी है। लेकिन उसका अहंकार, सीता का हरण और उन्हें वापस लौटाने से इनकार करना उसके पतन के प्रमुख कारणों के रूप में सामने आते हैं। यही रामकथा का एक महत्वपूर्ण संदेश है—ज्ञान और शक्ति अपने आप में किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाते। उनका उपयोग किस उद्देश्य से किया जाता है, यह अधिक महत्वपूर्ण है। रावण के पास ज्ञान था, सामर्थ्य था और एक समृद्ध राज्य था। लेकिन यदि हम रामकथा की नैतिक दृष्टि से देखें, तो उसकी सबसे बड़ी विफलता यह थी कि उसने अपनी इच्छाओं और अहंकार को उचित-अनुचित के विवेक से ऊपर रख दिया। इसीलिए रावण की विद्वत्ता का उल्लेख उसके कर्मों की आलोचना को समाप्त नहीं करता।

श्रीराम और रावण के इस लोकप्रचलित प्रसंग से कई विचार सामने आते हैं।

पहला संदेश—ज्ञान के साथ विवेक भी आवश्यक है। केवल विद्वान होना पर्याप्त नहीं है। ज्ञान का सही उपयोग तभी होता है, जब उसके साथ नैतिकता और आत्मसंयम हो।

दूसरा संदेश—कर्तव्य और व्यक्तिगत विरोध के बीच अंतर हो सकता है। कथा में रावण का पुरोहित बनना इसी विचार को सामने लाता है। हालांकि इसे ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि लोकपरंपरा से प्राप्त नैतिक प्रसंग के रूप में समझना चाहिए।

तीसरा संदेश—अहंकार का अंत विनाश में हो सकता है। रामकथा में रावण की पराजय का मूल कारण केवल श्रीराम की सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि रावण का गलत निर्णयों पर अड़े रहना भी है।

चौथा संदेश—किसी व्यक्ति के एक गुण से उसके सभी कर्म उचित नहीं हो जाते। रावण की विद्वत्ता और शिवभक्ति का सम्मान करने वाली परंपराएं भी सीता के हरण और उनके प्रति किए गए अन्याय को उचित नहीं ठहरातीं।

रामकथा केवल दो राजाओं के बीच हुए युद्ध की कहानी नहीं है। यह धर्म, कर्तव्य, मर्यादा, न्याय, अहंकार और मानवीय निर्णयों की कथा भी है। श्रीराम का चरित्र मर्यादा और धर्म के आदर्श से जुड़ा है, जबकि रावण का चरित्र यह दिखाता है कि अपार ज्ञान और शक्ति होने के बावजूद गलत निर्णय व्यक्ति को पतन की ओर ले जा सकते हैं। रावण द्वारा श्रीराम की पूजा कराने और विजय का आशीर्वाद देने का लोकप्रचलित प्रसंग इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में रोचक बन जाता है।यह कथा हमें केवल चमत्कार या आश्चर्य की दृष्टि से नहीं देखनी चाहिए। इसका वास्तविक महत्व उन प्रश्नों में है, जो यह हमारे सामने रखती है—क्या ज्ञान के साथ विनम्रता आवश्यक नहीं? क्या धार्मिक आचरण के साथ नैतिक आचरण भी जरूरी नहीं? और क्या शक्ति का सही उपयोग ही किसी व्यक्ति के चरित्र की असली पहचान नहीं है?

रामकथा की लोकपरंपराओं में रावण का यह रूप हमें उसके व्यक्तित्व के एक अलग पक्ष से परिचित कराता है। वह श्रीराम का विरोधी था, लेकिन अनेक परंपराओं में उसे विद्वान और शिवभक्त भी माना गया है। हालांकि, रामेश्वरम में रावण द्वारा श्रीराम के लिए पूजा संपन्न कराने और उन्हें विजय का आशीर्वाद देने की कथा को मूल रामायण के सभी संस्करणों में वर्णित प्रसंग नहीं समझना चाहिए।

रामकथा का स्थायी संदेश इससे कहीं व्यापक है—विद्वत्ता तभी सार्थक है, जब उसके साथ विवेक हो; शक्ति तभी कल्याणकारी है, जब उसके साथ मर्यादा हो; और भक्ति तभी जीवन को दिशा देती है, जब आचरण में भी धर्म का पालन हो।