एक अधिकारी के कंधो पर खान की जिम्मेदारी कैसे रूकेगा अवैध खनन
झारखंड़ में पश्चिम सिंहभुम जिला अंतर्गत आनेवाले चाईबासा क्षेत्र अंतर्गत खनन कार्य की देखरेख के लिए केवल एक खान निरीक्षक ही है।जिसके जिम्में कोल्हान में बालू व अन्य खनिज सम्पदाओं की तस्करी रोकने की जिम्मेदारी है।
पक्षिमी सिंहभूम जिला के चाईबासा में एक खान निरीक्षक के कंधो पर पूरे कोल्हान प्रमंडल के बालू व अन्य खनिज सम्पदाओं की तस्करी कैसे रोकी जाये! पूरे झारखण्ड के बालू घाट झारखंड स्टेट मिनिरल्स डेवलपमेंट कार्पोरेशन (जेएसएमडीसी) के अधीन है। जेएसएमडीसी की ही जिम्मेदारी है कि वह बालू घाटों का ठेका जारी कर उसे चलायेगी। इससे प्राप्त राजस्व राज्य सरकार को जायेगा। जेएसएमडीसी का पूरे झारखण्ड में एक मात्र कार्यालय रांची में है, इसके अलावे किसी भी जिले में कोई कार्यालय नहीं है. रांची स्थित कार्यालय में भी लगभग आधा दर्जन ही अधिकारी-कर्मचारी हैं।
बालू का अवैध खनन रोकने के लिये खनन विभाग के अलावे प्रशासनिक स्तर पर जिले के उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक, जिला वन अधिकारी के नेतृत्व में टास्क फोर्स का गठन किया गया है, इसमें उप जिला मजिस्ट्रेट, अनुविभागीए पुलिस अधिकारी (एसडीपीओ), अंचलाधिकारी, थाना प्रभारी, खनन विभाग के निरीक्षक आदि हैं। पूरे झारखण्ड का बालू घाट बंद है, लेकिन बालू से जुड़ी सरकारी विकास योजनाओं से लेकर निजी व अन्य निर्माण कार्य जैसे, सड़क, भवन, पुल आदि निरंतर जारी है,जिसके लिए बालू की आपूर्ती आवश्यकता अनुरूप हो रही है, यह कैसे संभव हो रहा है।
चाईबासा जिले के खनन विभाग में खान निरीक्षक के पांच पद सृजित हैं. इसमें से एकमात्र खान निरीक्षक के रुप में सुनील कुमार नियुक्त हैं. सुनील कुमार के जिम्मे सिर्फ चाईबासा जिला के अलावे जमशेदपुर से लेकर बहरागोड़ा तक का अतिरिक्त दायित्व तमाम प्रकार के अवैध खनन गतिविधियों को रोकने हेतु दिया गया है.श।
चाईबासा खनन विभाग 4400 करोड़ रुपये का राजस्व देने वाला जिला है, ऐसी स्थिति में खनन विभाग अपना सारा ध्यान जिले की बड़ी खनन कंपनियों पर देती है. इन पर अधिक ध्यान देने का कारण यह है कि अगर थोड़ी भी निगरानी में चूक हुई तो ये कंपनियां बड़ा खेल कर सकती हैं. इससे सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंच सकता है. एक अकेला खान निरीक्षक वाली चाईबासा जिले के खनन विभाग की स्थिति यह है कि अगर उसे बहरागोड़ा, बड़ाजामदा, नोवामुण्डी, मनोहरपुर आदि क्षेत्रों में बालू या अन्य खनिज संपदा की तस्करी की सूचना मिले तो घटना स्थल पर पहुंचने से पहले बालू या अन्य खनिज सुरक्षित स्थान पर डम्प हो जायेगा।जिसके बाद सिर्फ लकीर पीटने के अलावे और कुछ हासिल नहीं होगा।
बालू घाट का ठेका से पूर्व निकासी कराने के लिये पर्यावरण विभाग व प्रदूषण नियंत्रण विभाग से सहमती लेना होता है। दोनों विभाग एक तो सहमती नहीं देते है और ना हीं बालू की अवैध तस्करी को रोकने की दिशा में हीं वह कोई पहल अथवा सकारात्मक कदम उठाते है।ऐसे में सारा खेल पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाकर, प्रदूषण को फैलाते हुये अवैध रुप से चल रहा है, दुसरी ओर सरकारी राजस्व को भारी नुकसान पहुंच रहा है और माफिया मालामाल हो रहा है. सारंडा को भी नो माइनिंग जोन घोषित कर दिया है, जिस कारण यहां सेल व टाटा स्टील की खदानों को छोड़ लौह अयस्क की तमाम निजी खदानें व खनन गतिविधियां वर्षों से बंद है. इससे भारी बेरोजगारी व पलायन की स्थिति उत्पन्न हो रही है। सरकार का प्रबंधन व प्रशासनिक आधारभूत संरचना पूरी तरह से असफल बताया जा रहा है।





