आंदोलनकारियों की भी निकलेगी भर्ती!

व्यंग

आंदोलनकारियों की भी निकलेगी भर्ती!

व्यंग्य | सारांश दैनिक

जिस रफ्तार से देश में मांगें उठ रही हैं, धरने सज रहे हैं और विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि भविष्य में आंदोलन करना भी एक बाकायदा पेशा बन जाएगा। तब सरकार को शायद एक नया विभाग खोलना पड़ेगा—‘राष्ट्रीय आंदोलन एवं धरना प्रबंधन विभाग!’

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां हर नागरिक को अपनी बात कहने, अपनी मांग रखने और सरकार की नीतियों का विरोध करने का अधिकार है। यह लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन जब हर समस्या का समाधान बातचीत, संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया के बजाय सड़क जाम, धरना, प्रदर्शन और नारेबाजी में तलाशा जाने लगे, तब व्यंग्य अपने आप जन्म लेने लगता है। आज का दृश्य भी बड़ा दिलचस्प है। कहीं नौकरी के लिए आंदोलन, कहीं नौकरी मिलने के बाद आंदोलन, कहीं नौकरी नहीं मिलने पर आंदोलन, तो कहीं किसी निर्णय के विरोध में आंदोलन। कभी छात्र सड़क पर हैं, कभी कर्मचारी धरने पर, कभी संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं, तो कभी विभिन्न वर्ग और विपक्षी पार्टियां अपनी मांगों के साथ मैदान में उतर रहे हैं। ऐसा लगता है कि देश में समस्याओं की कोई कमी नहीं और आंदोलन करने वालों के हौसले में भी कोई कमी नहीं!। 

अब कल्पना कीजिए, अगर यही सिलसिला इसी रफ्तार से चलता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब विशेष कर विपक्षी राजनीतिक पार्टियों, आंदोलन करने वाले विभिन्न संगठनों के विज्ञापन में एक नया पद दिखाई देगा— जो इस प्रकार होगा

पद का नाम: प्रशिक्षित आंदोलनकारी। योग्यता में लिखा होगा—कम से कम तीन सफल धरनों का अनुभव, नारे लगाने में दक्षता, माइक के सामने प्रभावशाली भाषण देने की क्षमता और भीड़ जुटाने का प्रमाणपत्र अनिवार्य। अनुभवी उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जाएगी। लंबे समय तक धरने पर बैठने वालों को विशेष वरीयता मिलेगी। चयन प्रक्रिया भी कम रोचक नहीं होगी। पहले चरण में नारे लगाने की परीक्षा, दूसरे चरण में भाषण प्रतियोगिता और तीसरे चरण में अनिश्चितकालीन धरने की सहनशक्ति का परीक्षण होगा। जो उम्मीदवार बिना थके लगातार मांगें रख सकेगा, उसे अगले चरण में भेजा जाएगा।

साक्षात्कार में पूछा जाएगा—‘यदि आपकी मांग मान ली जाए, तो आप क्या करेंगे?’ उम्मीदवार मुस्कुराकर जवाब देगा—‘सर, फिर हम अगली मांग को लेकर आंदोलन करेंगे!’ चयन समिति उसकी दूरदर्शिता से इतनी प्रभावित होगी कि उसे तत्काल नियुक्ति पत्र थमा दिया जाएगा।

लेकिन व्यंग्य का असली सवाल इससे कहीं बड़ा है। क्या हम ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जहां समस्या का समाधान खोजने से अधिक महत्व समस्या को लेकर प्रदर्शन करने को मिलने लगा है? आखिर आंदोलन होते क्यों हैं? क्योंकि कहीं न कहीं लोगों को लगता है कि उनकी आवाज नहीं सुनी जा रही। उन्हें लगता है कि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, उनके साथ न्याय नहीं हो रहा या व्यवस्था उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही है, या फिर सरकार गिराने के उद्देश्य से। 

इसलिए हर आंदोलन को गलत कहना भी उतना ही गलत होगा, जितना हर आंदोलन को सही मान लेना। इतिहास गवाह है कि अनेक जनआंदोलनों ने समाज और शासन को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन आंदोलन की सफलता केवल भीड़ के आकार, नारों की ऊंचाई या सड़क पर बिताए गए दिनों से नहीं मापी जा सकती। उसकी असली कसौटी यह है कि उससे समस्या का कितना समाधान निकला।

दूसरी ओर, सरकारों और प्रशासन के लिए भी आंदोलन एक संदेश है। यदि छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को बार-बार सड़क पर उतरना पड़े, तो केवल प्रदर्शनकारियों से सवाल पूछना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी पूछना होगा कि शिकायतों को सुनने और समय पर समाधान करने वाली व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

और जनता भी कभी-कभी अपने आप से पूछे कि क्या हर असहमति का अंतिम पड़ाव सड़क ही होना चाहिए? क्या बातचीत, जनसुनवाई, ज्ञापन, कानूनी रास्ते और अन्य लोकतांत्रिक माध्यमों को पर्याप्त अवसर दिया जा रहा है?

क्योंकि आंदोलन करना अधिकार है, लेकिन दूसरों के अधिकारों को बाधित करना उसका अनिवार्य हिस्सा नहीं होना चाहिए। विरोध की आवाज बुलंद हो, मगर आम आदमी की जिंदगी ठप न हो। मांगें मजबूत हों, मगर तर्क और संवाद के लिए दरवाजे बंद न हों।

अब लौटते हैं उस काल्पनिक भर्ती विज्ञापन पर।

भविष्य में अगर सचमुच आंदोलनकारियों की भर्ती निकली, तो शायद सरकार को पदों का वर्गीकरण भी करना पड़ेगा—स्थायी आंदोलनकारी, संविदा आंदोलनकारी, प्रशिक्षु आंदोलनकारी और मानदेय आधारित आंदोलनकारी!

इसके बाद आंदोलनकारी संघ बनेगा, फिर संघ अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठेगा। मांग होगी कि आंदोलनकारियों को भी महंगाई भत्ता, यात्रा भत्ता और धरना भत्ता दिया जाए। यदि मांगें नहीं मानी गईं, तो वे अपनी ही भर्ती प्रक्रिया के खिलाफ आंदोलन शुरू कर देंगे।

और सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या होगी—आखिर इन आंदोलनकारियों से बातचीत करने के लिए किसे भेजा जाए? कोई अधिकारी जाएगा, तो उसके खिलाफ नारे लगेंगे। कोई मंत्री जाएगा, तो उससे नई मांगों की सूची थमा दी जाएगी। और यदि कोई समाधान लेकर पहुंच गया, तो आंदोलन समाप्त होने की घोषणा से पहले अगली बैठक की तारीख मांग ली जाएगी!

हालांकि यह सब केवल एक व्यंग्यात्मक कल्पना है, लेकिन इसके भीतर छिपा सवाल वास्तविक है।

लोकतंत्र में आवाज उठना जरूरी है, मगर हर आवाज का उद्देश्य समाधान होना चाहिए। आंदोलन व्यवस्था को जगाने का माध्यम बने, स्वयं व्यवस्था का विकल्प नहीं।

सरकारें जनता की समस्याएं सुनें, प्रशासन समय पर कार्रवाई करे और नागरिक अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी ध्यान रखें। जब संवाद प्रभावी होगा और शिकायतों का निष्पक्ष समाधान होगा, तब अनावश्यक टकराव की गुंजाइश भी कम होगी।

वरना व्यंग्यकारों को तो विषय मिलता ही रहेगा। कलम चलती रहेगी, नारे गूंजते रहेंगे और कल्पना में भर्ती विज्ञापन भी छपता रहेगा।

कौन जाने, आने वाले समय में रोजगार कार्यालय के बाहर एक नया बोर्ड लगा हो—

‘यहां बेरोजगारों के लिए नौकरी और आंदोलनकारियों के लिए अगला आंदोलन खोजने में सहायता उपलब्ध है!’

फिलहाल इतना ही समझिए—देश को आंदोलनकारियों की भर्ती से ज्यादा जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जहां जायज मांगों को सुनने के लिए आंदोलन का इंतजार न करना पड़े।— संपादकीय टिप्पणी | सारांश दैनिक

अगर हर मांग के लिए आंदोलन और हर आंदोलन के बाद नई मांग ही लोकतंत्र की पहचान बन जाए, तो हमें यह भी सोचना होगा कि समाधान की राजनीति पीछे क्यों छूट रही है। देश को आवाज उठाने वाले नागरिक भी चाहिए और उन आवाजों को गंभीरता से सुनने वाली व्यवस्था भी।