अमको सिमको ओडिशा के आदिवासी प्रतिरोध का भूला बिसरा अध्याय
सतीश शर्मा: (उप संपादक)
औपनिवेशिक भारत का इतिहास ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध और संघर्ष की अनगिनत कहानियों से भरा पड़ा है। कुछ घटनाओं को व्यापक मान्यता मिली है और वे भारत की स्वतंत्रता की गाथा का अभिन्न अंग बन गई हैं, वहीं कई ऐसी घटनाएं जो पिछड़े, दुर्गम इलाकों के आदिवासी समुदाय द्वारा किए गए आंदोलनों को समुचित स्थान नहीं मिला है! वे इतिहास के पन्नों में दबे रह गई हैं।
ऐसी ही एक भूली हुई कहानी है ओड़िशा के आदिवासी बहुल सुंदरगढ़ जिले की अमको सिमको घटना, जो 25 अप्रैल, 1939 को ओडिशा के जनजाति बहुल क्षेत्र में घटी थी। जलियांवाला बाग गोलीकांड के बीस साल बाद 25 अप्रैल, 1939 को ब्रिटिश पुलिस द्वारा किये गए नरसंहार में 49 से अधिक निरीह आदिवासी मारे गये थे। सैकड़ों घायल हुए। इतनी महत्वपूर्ण घटना होने के बावजूद, अमको सिमको आज भी मुख्यधारा के इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं पा सकी है।
ओड़ीशा-झारखंड सीमा पर बीरमित्रपुर के निकट रायबोगा थाना अंतर्गत सिमको गांव (राउरकेला नगर से 50 किमी दूर) में एक आदिवासी जनसभा का आयोजन किया गया था। निर्मल मुंडा इसकी अगुवाई कर रहे थे। तीन हजार से अधिक आदिवासी जन सभा में उपस्थित थे। ब्रिटिश पुलिस ने इस जनसभा पर गोलियां चलाई जिसमें बड़ी संख्या में लोग मारे गए। ब्रिटिश पुलिस वास्तव में आंदोलन के प्रणेता निर्मल मुंडा को गिरफ्तार करने के उद्देश्य से आई थी। पर एकत्रित जनसमूह से गिरफ्तारी में सहयोग नहीं मिलने से क्षुब्ध पुलिस ने इस वहशियाना काम को अंजाम दिया।
आदिवासियों द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए शुरू किये गए इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षित महत्त्व नहीं मिला जितनी की वे हकदार थे। तत्कालीन गांगपुर राज्य ( वर्त्तमान सुंदरगढ़ जिले का हिस्सा) में प्रारंभ हुए इस आंदोलन के पीछे आदिवासियों की भूमि और सामाजिक अधिकारों पर राज्य का बढ़ता दबाव मुख्य कारण था। इस क्षेत्र में पहले जिस भूमि पर कर नहीं लिया जाता था उस पर कर लगाने के गांगपुर राज्य के निर्णय से आदिवासी किसानों में आक्रोश फैला था।
भूमि अधिकार की लड़ाई
1930 के दशक के उत्तरार्ध में ओडिशा की जनजातीय समुदायों को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत भारी शोषण और दमन का सामना करना पड़ रहा था। औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा अत्यधिक भूमि कर और लगान लगाए गए, जिससे ये समुदाय आर्थिक रूप से टूटने लगे और व्यापक असंतोष फैल गया।रायबोगा के निकट बड़टोली गांव में जन्मे निर्मल मुंडा (27 जनवरी, 1894 - देहावसान 2 जनवरी 1973)
पहले सेना में भर्त्ती हुए। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध में फ्रांस में युद्ध में भाग लिया। विश्व युद्ध से लौटकर वे डाहीजिरा स्कूल और राजगांगपुर स्कूल में शिक्षक के रूप में कार्यरत रहे। इसी दौरान वे स्वाधीनता आंदोलन की ओर आकर्षित हुए। गांगपुर राजदरबार के आदिवासी विरोधी निर्णयों ने उन्हें जीवन का उद्देश्य दे दिया। गांगपुर राज्य द्वारा भूमि बंदोबस्त में कर दोगुना किये जाने से आक्रोशित निर्मल मुंडा आदिवासियों को संगठित कर आंदोलन के लिए तैयार करने में जुट गए।
1865 में पूरे क्षेत्र का राजस्व 5,200 रूपये था। वर्ष 1900 में यह बढ़कर 47,700 रुपये और 1911 में हुए पहले भूमि बंदोबस्त में राजस्व 64,257 रुपये कर दिया गया। पहले गांगपुर राज्य में गोड्डा जमीन पर कर नहीं लगता था। परंतु 1937 में इसका भुगतान बाध्यकारी कर दिया गया। 1923-24 में यंहा भूमि राजस्व उगाही 1,10,257 रुपये, 1932 में 1, 49, 861 रुपये कर दिया गया।
अपने अधिकारों के प्रति जागरूक निर्मल मुंडा राजदरबार के ऐसे निर्णयों से क्षुब्ध हो उठे थे और उन्होंने आदिवासियों को संगठित कर इसके विरुद्ध आवाज उठाने का फैसला किया। 1935 में निर्मल मुंडा ने आदिवासियों को संगठित करना शुरू किया। उन्होंने गोड्डा भूमि पर कर में कमी करने के साथ छोटा नागपुर क्षेत्र में प्रचलित खूंटकटी कानून को यंहा भी लागू करने की मांग की। उन्होंने सात मांगों को लेकर संग्राम शुरू किया। ये सात मांगें थी- 1) मुखर्जी बंदोबस्त रदद् करना 2) खूंटकटी अधिकार 3) बेठी प्रथा उन्मूलन, 4) जल, जंगल, जमीन पर अधिकार, 5) राजस्व से मुक्ति,6) बेकारी समस्या का समाधान 7) शिक्षा का प्रसार। यह आंदोलन रायबोगा, पुरुणापानी, बिसरा ,बीरमित्रपुर, हाथीबाड़ी अंचल में फैल गया। निर्मल मुंडा ने जनवरी 1937, फरवरी 1938 और अक्तूबर 1938 में वायसराय को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई।
इन सबसे राजदरबार दबाव महसूस करने लगा। इस आंदोलन को कुचलने के लिए गांगपुर राज्य ने निर्मल मुंडा को गिरफ्तार करने का निर्णय किया। इसके बाद आदिवासियों पर दमनचक्र आरंभ हुआ। इसके प्रतिवाद में आवाज उठाने के लिये निर्मल मुंडा ने 25 अप्रैल 1939 को सिमको गांव में जनसभा बुलाई। इस जनसभा में खुंटकटी का अधिकार के लिए छोटानागपवुर टेनेंसी एक्ट के तहत मिले अधिकारों को बहाल करने, जंगल जमीन पर रैयतों का अधिकार देने समेत अन्य मांगों पर चर्चा होनी थी। यह भी कहा जाता है कि उस दिन गांगपुर की रानी जानकी रत्ना फैसला सुनाने वाली थीं इसलिए फैसला सुनने के लिए लोग अमको सिमको में जमा हुए थे। गांगपुर की रानी जानकी रत्ना के पोलिटीकल एजेंट ले. ई.डब्ल्यू.एम. मर्गर एवं कैप्टन विस्को भी यहां पहुंचे थे। पुलिस ने जनसभा को तीन ओर से घेर लिया और फैसला सुनाने के बजाय पुलिस ने निर्मल मुंडा की तलाश शुरू कर दी। पुलिस ने लोगों से निर्मल मुंडा के बारे मे पूछताछ शुरू की तो अनेक लोगों ने स्वंय को निर्मल मुंडा बताया। कहा जाता है कि पुलिस अधिकारी जब निर्मल मुंडा के खपरैल घर में घुस रहे थे तो एक अधिकारी की टोपी गिर गई। अधिकारी को लगा कि किसीने उनपर हमला कर दिया है बस इससे क्रोधित होकर अफसरों ने गोलीबारी के आदेश दे दिए। इस गोलीबारी में 49 लोग शहीद हुए एवं 80 से अधिक लोग घायल हुए।
गोलीबारी के बाद पुलिस ने सभी शवों को बीरमित्रपुर के ब्राह्माणमारा खदान में फेंक दिया गया था। निर्मल मुंडा के साथ अनेक आदिवासियों को गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया गया। उन्हें पहले जशपुर जेल और फिर सुंदरगढ़ जेल में रखा गया। देश आजाद होने के बाद 15 अगस्त, 1947 के बाद इन्हें रिहाई मिली।
घटना के पचास वर्ष बाद तक भी स्थानीय लोगों के अलावा अन्य लोग इस त्रासदी पूर्ण घटना से अनभिज्ञ थे। कुछ आदिवासी कार्यकर्ता, स्वर्गीय विधायक धनंजय महांति, स्वर्गीय प्रोफेसर डी एन सिंह, स्वर्गीय किशुन साहू, और महावीर अग्रवाल जैसे लोगों ने इस घटना की स्मृति को जीवित बनाये रखा। अब पिछले कुछ वर्षों से सरकारी स्तर पर इस गोलीकांड की याद में समारोह का आयोजन किया जाने लगा है। यंहा एक स्मारक बनाया गया है। परंतु इसे स्वाधीनता संग्राम के हिस्से के रूप में मान्यता नहीं मिली है।
लेकिन आजादी के 25वें वर्ष के समारोह में 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने निर्मल मुंडा को स्वाधीनता सेनानी ताम्रपत्र प्रदान कर सम्मानित किया था। 1957 में निर्मल मुंडा बिसरा से विधायक चुने गये थे। आदिवासी संगठन इस आंदोलन को स्वाधीनता आंदोलन का हिस्सा माने जाने की मांग कर रहे हैं पर सरकार ने अब तक वह मान्यता नहीं दी है।
अमको सिमको स्मारक कमेटी के गठन के बाद से पिछले तीन दशक से यहां विधिवत कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इन आयोजनों में बड़ी संख्या में आदिवासियों के भाग लेने से सरकार की नींद खुली। हालांकि, हाल के वर्षों में इस घटना को सम्मान देने के प्रयास किए गए हैं। वर्ष 2018 में अमको सिमको क्षेत्र को एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया और वहां
यंहा एक सफेद संगमरमर का 36 फीट ऊंचा स्मृति स्तंभ बनाया गया है। एक शिलालेख पर सभी शहीदों के नाम उल्लिखित हैं। ताकि उनके बलिदान को हमेशा याद रखा जा सके। स्मारक स्तंभ के साथ सुंदर प्रवेश द्वार और सड़क बनाई जा चुकी है।
पर आदिवासी इससे संतुष्ट नहीं हैं। वे चाहते है कि निर्मल मुंडा की अगुवाई में हुए आंदोलन को स्वाधीनता संग्राम के हिस्सा माना जाये। सभी शहीदों को स्वाधीनता सेनानी का दर्जा मिले। अगर सरकार निर्मल मुंडा को स्वाधीनता संग्रामी के रूप में ताम्रपत्र दे सकती है तो अन्य लोगों को यह मान्यता देने में बेरुखी क्यों?
अमको सिमको घटना ओडिशा के आदिवासी समुदायों के अदम्य साहस का प्रतीक है। यह याद दिलाती है कि ओडिशा के आदिवासी समुदायों ने शोषण और अन्याय के खिलाफ किस साहस और दृढ़ता के साथ संघर्ष किया। उनकी मांगें केवल आर्थिक नहीं थीं, बल्कि वे आत्मसम्मान, स्वायत्तता और न्याय की व्यापक आकांक्षा से जुड़ी थीं। फिर भी, इस तरह की घटनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में कई चुनौतियां बनी हुई हैं। सीमित दस्तावेजीकरण, शिक्षा तक कम पहुंच और ऐतिहासिक पक्षपात के कारण आदिवासी संघर्षों को अक्सर इतिहास में उचित स्थान नहीं मिल पाता है। इसलिए आवश्यक है कि शिक्षा और शोध के माध्यम से इन भूले-बिसरे आंदोलनों को सामने लाया जाए और व्यापक पहचान दी जाए। अमको सिमको नरसंहार को इतिहास में सम्मान पूर्ण स्थान मिले यही उन शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।





