शायद सत्ता स्वभाव से ही सुखभोगी और संवेदना हीन होती है

शायद सत्ता स्वभाव से ही सुखभोगी और संवेदना हीन होती है

नितिन सिन्हा (संपादक - खबरसार)

अन्यथा सत्ताधीशों की सुरबाला(श्रीमती वाड्रा)पुष्प की अभिलाषा को समझती और शहादत भरे दिन के बीच इस तरह के क्षणिक वैभव शाली प्रदर्शन को सीधे तौर पर नकार सकती थीं।। इसकी जगह  सादगी पूर्ण तरीके से अभिवादन लेकर वो सम्मेलन का हिस्सा बन सकती थी।।जैसा कि आपके महान पूर्वज और जननेता,लोकप्रिय प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहर लाल नेहरू किया करते थे।

दु:खद,परंतु आपने ऐसा कुछ नही किया,अब रायपुर राष्ट्रीय अधिवेशन से सत्ताधारी पार्टी के नेताओं ने क्या पाया और क्या सीखा ये तो आने वाला समय ही बताएगा। पर प्रदेश की जनता और मुझ जैसे संवेदनशील व्यक्ति के मन में यह प्रश्न जरूर छोड़  गया कि, क्या सच में  *सत्ता स्वभाव से ही सुखभोगी और संवेदनहीन होती है??*

बहरहाल जिन फूलों को शहीदों की अंतिम विदाई के पथ पर(सम्मान)में सजना था,वो हर बार की तरह इस बार भी मन मार कर सूरबाला(सत्ताधीशों)की कालीन बन कर रह गया।।

सुविख्यात पत्रकार प्रभात सिंह की वाल से ली गई चंद लाइने इस कार्यक्रम पर सटीक बैठती है, जो इस प्रकार है - 

जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी...

चाह नहीं, मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध
प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि डाला जाऊँ,
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ,

मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृ-भूमि पर शीश- चढ़ाने,
जिस पथ पर जाएं वीर अनेक