बिना छत के लाॅ कालेज से निकला सुप्रीम कोर्ट का न्यायधीश

बिना छत के लाॅ कालेज से निकला सुप्रीम कोर्ट का न्यायधीश

जिस लॉ कॉलेज की अपनी छत नहीं थी, वहीं से निकला सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश रायगढ़ के ‘परस भैया’ की कहानी—जहाँ संसाधन छोटे थे, लेकिन सपना देश की सबसे बड़ी अदालत से भी बड़ा “पंख कट भी जाएँ अगर यारों, आदमी हौसलों से उड़ता है…”

रायगढ़ के पुराने दिनों को याद कीजिए। न इंटरनेट था, न ऑनलाइन क्लास। न बड़े संस्थानों का सहारा, न आधुनिक सुविधाएँ। लॉ की पढ़ाई के लिए जिस कॉलेज का अपना भवन तक नहीं था, उसकी कक्षाएँ रात में म्युनिसिपल स्कूल के खाली कमरों में लगती थीं। लेकिन उसी साधारण से माहौल में एक ऐसा सपना आकार ले रहा था, जिसकी ऊँचाई उस समय शायद खुद सपने देखने वाले के अलावा किसी को दिखाई नहीं दे रही थी। नाम था—प्रशांत कुमार मिश्रा। रायगढ़ वाले प्यार से उन्हें ‘परस भैया’ कहते थे। और आज वही परस भैया भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं। यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने की कहानी नहीं है। यह कहानी है—संसाधनों से बड़ी प्रतिभा की, परिस्थितियों से बड़े संकल्प की और छोटे शहर से बड़े सपने देखने की।

कहानी शुरू होती है एक छोटे से कमरे से…

प्रशांत भैया मेरे पिता से बायोलॉजी पढ़ने आया करते थे। वे उनके प्रिय छात्रों में से एक थे। मैं उनसे करीब तीन साल छोटा था। पढ़ाई के साथ-साथ क्रिकेट भी हमारी दोस्ती का हिस्सा था। हम एक ही टीम में खेलते थे। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि क्रिकेट के मैदान पर साथ खेलने वाला यह युवक एक दिन देश की सर्वोच्च अदालत की बेंच पर बैठेगा। वह दौर आज से बिल्कुल अलग था। रायगढ़ उस समय छत्तीसगढ़ का पिछड़ा इलाका माना जाता था। उच्च शिक्षा के संसाधन सीमित थे और बड़े सपने देखने के लिए प्रेरणा के स्रोत भी कम थे। ऊपर से जिस लॉ कॉलेज में वे पढ़ रहे थे, उसकी हालत ऐसी कि अपना भवन तक नहीं था। लेकिन शायद इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है— कई बार बड़ी मंज़िलों की शुरुआत बेहद छोटी जगहों से होती है। डॉक्टर बनने निकले थे, कानून की दुनिया में आ गए प्रशांत भैया की शुरुआती रुचि चिकित्सा की ओर थी। वे बायोलॉजी के विद्यार्थी थे। लेकिन फिर उन्होंने कानून को अपना रास्ता चुना। रायगढ़ के उसी साधारण लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई शुरू हुई। जहाँ दूसरे लोग परिस्थितियों को देखते थे, वहाँ उन्होंने संभावना देखी। जहाँ दूसरे लोग सीमाएँ देखते थे, वहाँ उन्होंने रास्ता तलाशा। और सबसे बड़ी चुनौती थी—अंग्रेज़ी। उच्च न्यायपालिका तक पहुँचने के लिए अंग्रेज़ी पर मजबूत पकड़ जरूरी थी। लेकिन रायगढ़ में ऐसा वातावरण कहाँ था? तो उन्होंने इंतज़ार नहीं किया कि कोई उन्हें अंग्रेज़ी सिखाने आए। उन्होंने खुद अपना क्लासरूम बना लिया। मैं और राजेश डेनियल उनके साथ जुड़े। हमने अपना एक छोटा-सा English Speaking Group बनाया।

नियम साफ था—आपस में अंग्रेज़ी में ही बात करेंगे।गलतियाँ होंगी—होने दीजिए। शब्द नहीं आएँगे—ढूँढ़ेंगे। वाक्य गलत होंगे—फिर बोलेंगे।

लेकिन रुकेंगे नहीं। और यही लगातार अभ्यास आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक बन गया। 1987—वकील बने, लेकिन सपना यहीं नहीं रुका 1987 में कानून की पढ़ाई पूरी हुई। रायगढ़ में वकालत शुरू की। आसपास सैकड़ों काले कोट थे। लेकिन प्रशांत मिश्रा उस भीड़ में खो जाने वालों में से नहीं थे। उनके भीतर बेचैनी थी।कुछ बड़ा करने की। कुछ अलग करने की। और फिर आया 1989। उन्होंने रायगढ़ छोड़कर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट, जबलपुर जाने का फैसला किया।यह कोई मामूली निर्णय नहीं था। एक छोटे शहर के लॉ कॉलेज से निकला युवा जबलपुर जैसे बड़े न्यायिक केंद्र में जा रहा था, जहाँ देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़े नामी वकील मौजूद थे। लेकिन उन्होंने अपनी पहचान कॉलेज के नाम से नहीं, अपनी काबिलियत से बनाने का फैसला किया। 11 साल की तपस्या जबलपुर में उन्होंने लगभग 11 साल वकालत की। कोई शॉर्टकट नहीं। कोई चमत्कार नहीं। बस लगातार मेहनत। कानून की बारीकियों पर पकड़। अदालत में प्रभावी तर्क। अभिव्यक्ति को लगातार निखारना। और हर दिन खुद को कल से बेहतर बनाने की कोशिश। फिर वर्ष 2000 आया। मध्य प्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ नया राज्य बना। नया हाई कोर्ट बना। और यहीं प्रशांत मिश्रा ने अपनी जिंदगी का एक और बड़ा जोखिम लिया। जबलपुर में जम चुकी प्रैक्टिस छोड़कर बिलासपुर आ गए। कई साथियों ने रोका। कहा गया—इतनी अच्छी प्रैक्टिस छोड़कर नए हाई कोर्ट में जाकर क्या मिलेगा? लेकिन शायद उन्हें वही दिखाई दे रहा था जो बाकी लोग नहीं देख पा रहे थे। उन्होंने फैसला कर लिया था। अब नई जमीन पर नई कहानी लिखनी है। और फिर किस्मत नहीं, काबिलियत बोलने लगी बिलासपुर में उनकी प्रतिभा ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रही। दमदार अंग्रेज़ी। कानून की गहरी समझ। शानदार प्रस्तुति। और सबसे ऊपर—अथक परिश्रम। धीरे-धीरे वे नए हाई कोर्ट के प्रमुख चेहरों में शामिल होने लगे। फिर जिम्मेदारियाँ बढ़ती गईं।

2004—अतिरिक्त महाधिवक्ता। 2007—महाधिवक्ता। और फिर— 2009—छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के न्यायाधीश।उम्र? सिर्फ 44 वर्ष। जिस व्यक्ति ने कभी ऐसे लॉ कॉलेज में पढ़ाई की थी, जिसका अपना भवन तक नहीं था, अब वही व्यक्ति न्याय की कुर्सी पर बैठ चुका था।

लेकिन कहानी अभी बाकी थी… कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश। फिर वर्ष 2021—आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश। और फिर वह दिन आया, जब रायगढ़ के उस पुराने लॉ कॉलेज की कल्पना से भी बहुत आगे की मंज़िल सामने थी। सर्वोच्च न्यायालय।वर्ष 2023। प्रशांत कुमार मिश्रा ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। रायगढ़ का वह युवा, जिसने कभी म्युनिसिपल स्कूल के खाली कमरों में बैठकर कानून पढ़ा था— आज देश की सर्वोच्च अदालत की बेंच पर बैठा था। यह सिर्फ पदोन्नति नहीं थी।यह एक संदेश था। छोटे शहरों के युवाओं के नाम एक संदेश- आपके पास साधन कम हो सकते हैं, लेकिन आपकी क्षमता कम नहीं होनी चाहिए। आपका कॉलेज छोटा हो सकता है, आपका सपना नहीं।

आपकी शुरुआत साधारण हो सकती है, आपकी मंज़िल असाधारण हो सकती है। एक ‘परस भैया’ से मिली पूरी पीढ़ी को सीख आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है— वह जर्जर लॉ कॉलेज शायद जर्जर था, लेकिन वहाँ पढ़ने वाले कुछ सपने बिल्कुल भी जर्जर नहीं थे। वह शहर छोटा था, लेकिन एक युवक की सोच बहुत बड़ी थी। संसाधन सीमित थे,

लेकिन मेहनत असीमित थी। और शायद यही वजह है कि रायगढ़ से शुरू हुई वह यात्रा देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था तक पहुँची।

मिर्ज़ा ग़ालिब ने कहा था— “देखें क्या गुज़रती है क़तरे पे गुहर होते तक…” एक बूंद का मोती बनने तक का सफर आसान नहीं होता। हर लहर में खतरा होता है।

हर मोड़ पर परीक्षा होती है। लेकिन जो बूंद हार नहीं मानती— वही एक दिन मोती बनती है। आज जन्मदिन पर अपने उसी परस भैया को दिल से सलाम। आपने हमें सिर्फ यह नहीं सिखाया कि सफलता कैसे हासिल की जाती है। आपने यह सिखाया कि— **“शुरुआत आपके हाथ में नहीं होती, लेकिन आगे कितना जाना है—यह फैसला आपका होता है।”** रायगढ़ से सर्वोच्च न्यायालय तक की यह यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ एक उपलब्धि नहीं—एक खुली हुई किताब है। जिसका पहला अध्याय एक जर्जर लॉ कॉलेज में लिखा गया था… और जिसका नाम आज भारत के सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में दर्ज है। जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ, परस भैया।

आपकी कहानी रायगढ़ की मिट्टी से निकली उस उम्मीद की कहानी है, जो देश की सबसे ऊँची न्यायिक चौखट तक पहुँची। और शायद इस पूरी कहानी को एक ही पंक्ति में कहा जा सकता है— “मंज़िल उन्हीं को मिलती है, जिनके इरादों में रास्तों से ज्यादा ताकत होती है।”»