प्रशासनिक अहंकार और विस्मृति के भेंट चढ़ा शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी का बलिदान

प्रशासनिक अहंकार और विस्मृति के भेंट चढ़ा शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी का बलिदान

नितिन सिन्हा (संपादक-खबरसार) 

रायगढ़ में स्वतंत्रता दिवस पर शहीदों के अपमान का 'काला अध्याय': प्रशासनिक अहंकार और विस्मृति के भेंट चढ़ा शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी का बलिदान..

रायगढ़@दैनिक खबर सार :- आज जब पूरा देश अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस बेहद हर्षोल्लास, देशभक्ति और गगनभेदी नारों के साथ मना रहा था, तब छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से एक ऐसा सनसनीखेज और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र के चेहरे से 'देशभक्ति' का मुखौटा उतार कर फेंक दिया है। शहर के जिस प्रतिष्ठित खेल मैदान का नाम देश के गौरव और अदम्य साहस के पर्याय 'शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी' के नाम पर रखा गया है, उसी स्टेडियम के द्वार पर स्थापित उनकी प्रतिमा स्वतंत्रता दिवस के दिन उपेक्षा की धूल फांकती रही। नगर निगम के नेता प्रतिपक्ष सलीम निहारिका ने इस घटना को मात्र एक प्रशासनिक भूल नहीं, बल्कि शहीदों की शहादत का क्रूर अपमान और सत्ता के गलियारों में व्याप्त प्रशासनिक अहंकार की पराकाष्ठा करार दिया है।

शहीदों के नाम पर भव्य आयोजन, पर प्रतिमा के प्रति घोर उदासीनता..

नेता प्रतिपक्ष सलीम निहारिया ने इस प्रकरण पर कड़ा रुख अपनाते हुए प्रशासन के दोहरे मापदंडों और वैचारिक खोखलेपन की पोल खोलकर रख दी है। उन्होंने बताया कि आज सुबह उन्होंने स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, शहर के काकले चौक स्थित महापुरुषों और स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा पर पूरी श्रद्धा के साथ माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। लेकिन, इसके बाद जब उनका काफिला उस स्टेडियम की ओर बढ़ा, जिसे आधिकारिक तौर पर 'शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी स्टेडियम' के नाम से जाना जाता है और जो रायगढ़ के प्रत्येक नागरिक के लिए गौरव का प्रतीक है, तो वहां का दृश्य विचलित करने वाला था।

स्टेडियम के मुख्य द्वार पर अमर शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी की भव्य प्रतिमा स्थापित है, लेकिन स्वतंत्रता दिवस के इस पावन राष्ट्रीय पर्व पर उस महान बलिदानी की प्रतिमा पर न तो प्रशासन का कोई नुमाइंदा पहुंचा और न ही शासन की कुर्सी पर विराजमान किसी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि ने वहां दो फूल अर्पित करना मुनासिब समझा। नेता प्रतिपक्ष ने गरजते हुए सवाल किया, "जिस स्टेडियम की पहचान, जिसका नाम और जिसकी धड़कनें शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी के नाम पर टिकी हैं, उसी के द्वार पर बैठी उनकी प्रतिमा के प्रति इतनी घोर उदासीनता? आखिर यह किस स्तर की प्रशासनिक अकर्मण्यता है? यह प्रतिमा महज पत्थर का टुकड़ा नहीं, बल्कि उस वीर बलिदानी का प्रतीक है जिसने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। क्या हम इतने कृतघ्न हो गए हैं कि स्वतंत्रता के दिन ही शहीदों को भूल जाएं?"

प्रोटोकॉल की ओट में छिपा प्रशासनिक अहंकार और कायरता का नंगा नाच..

मामले की गंभीरता तब और बढ़ गई जब प्रशासनिक तंत्र ने अपनी विफलता को छिपाने के लिए 'प्रोटोकॉल' की आड़ लेनी शुरू कर दी। सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आज सुबह जिले के आला अधिकारियों और वीआईपी मेहमानों का काफिला उसी स्टेडियम के पास से होकर गुजरा था। नेता प्रतिपक्ष सलीम निहारिका ने तीखे शब्दों में कहा कि यदि प्रशासन के पास प्रोटोकॉल के नाम पर अतिथियों के स्वागत और भाषणबाजी के लिए तो पूरा समय होता है, तो फिर देश के लिए अपना प्राण त्यागने वाले शहीद की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के लिए चंद सेकंड का समय क्यों नहीं था?

यह तर्क कि मंत्री महोदय का काफिला स्टेडियम के मुख्य कार्यक्रम के बाद वहां आने वाला था, प्रशासन की संवेदनहीनता और उनकी कार्यप्रणाली में व्याप्त 'वीआईपी संस्कृति' का जीता-जागता सबूत है। सलीम निहारिका ने दहाड़ते हुए कहा, "प्रशासन को मिनट-दर-मिनट का प्रोटोकॉल पता होता है। क्या अधिकारियों के जहन में यह नहीं आया कि हम उसी शहीद के नाम पर बने स्टेडियम में घुस रहे हैं, जिसके बाहर उनकी प्रतिमा उपेक्षित पड़ी है? या फिर सरकार के दरबार में माथा टेकने वाले इन अधिकारियों को सिर्फ मंत्री और सत्ताधारियों के स्वागत की चिंता है? शहीदों के प्रति जिम्मेदारी इनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं है। यह प्रोटोकॉल नहीं, बल्कि कायरता का नंगा नाच है।"

राष्ट्रवाद के दावों की जमीनी हकीकत: एक सुलगता हुआ प्रश्न..

शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। आज जब पूरा देश उनके नाम पर खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन करता है, तो क्या उस स्टेडियम के परिसर में उनकी प्रतिमा का सम्मान करना प्रशासन का प्रथम नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य नहीं है? नेता प्रतिपक्ष ने अत्यंत आक्रामक अंदाज में पूछा है कि क्या अब हमारी प्रशासनिक व्यवस्था 'शहीद-विहीन' राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रही है? यदि जिले के सर्वोच्च शहीद का सम्मान स्वतंत्रता दिवस जैसे पर्व पर नहीं हो सकता, तो फिर इन आयोजनों का क्या औचित्य है?

उन्होंने दो टूक कहा कि यह घटना महज एक चूक नहीं है, बल्कि उस खोखली व्यवस्था का प्रमाण है जो दिखावे के लिए तिरंगा तो फहराती है, लेकिन शहीदों के त्याग को पूरी तरह विस्मृत कर चुकी है। यह उन तमाम लोगों के लिए एक तमाचे की तरह है जो शहीदों की शहादत को सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने का माध्यम मानते हैं। आज हम जिस आजादी की सांस ले रहे हैं, वह किसी की खैरात नहीं है। इस अपमान ने रायगढ़ की प्रशासनिक कार्यप्रणाली के उस काले पक्ष को उजागर किया है, जिसे अब तक पर्दों के पीछे छिपाकर रखा गया था।

जवाबदेही तय हो, अन्यथा आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार रहे विपक्ष..

सलीम निहारिया ने इस घटना को एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनाते हुए प्रशासन को सीधी चेतावनी दी है कि इस अपमान को रायगढ़ की जनता कभी माफ नहीं करेगी। उन्होंने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है और यह स्पष्ट किया है कि इस अपमान के लिए जो भी अधिकारी या सत्ताधारी व्यक्ति जिम्मेदार हैं, उन पर तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा, "यह महज एक फूल का सवाल नहीं, रायगढ़ की मिट्टी के स्वाभिमान का सवाल है। प्रशासन और शासन के वो तमाम जिम्मेदार अधिकारी, जिन्होंने इस अपमान की पटकथा लिखी, उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी।"

उन्होंने आगे कहा कि यदि प्रशासन ने इस मामले में लीपापोती करने की कोशिश की, तो विपक्ष इसे सड़क से लेकर सदन तक एक बड़ी जन-लड़ाई का मुद्दा बनाएगा। स्वतंत्रता दिवस के दिन शहीदों का अपमान करना इस सरकार के 'स्वच्छ और पारदर्शी' प्रशासन के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।

पत्रकारिता के सरोकार: एक सुलगता हुआ मुद्दा..

पत्रकारिता के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह खबर रायगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में भूचाल लाने के लिए पर्याप्त है। अब तक जिन मुद्दों को वीआईपी कल्चर और प्रशासनिक चमक-दमक के पीछे दबा दिया जाता था, उन्हें सलीम निहारिका ने बेबाकी से सबके सामने लाकर यह साबित कर दिया है कि स्थानीय स्तर पर विपक्ष और जनता की आवाज अभी भी जिंदा है। एक तरफ जहां स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ शहीदों के अपमान का यह काला सच प्रशासन के उन दावों की धज्जियां उड़ा रहा है जिसमें सब कुछ 'ठीक-ठाक' होने का दावा किया जाता है।

अब देखना यह होगा कि इस तीखे प्रहार और खुलासे के बाद जिला प्रशासन और शासन के बड़े अधिकारी इस पर क्या सफाई देते हैं या फिर अपनी गलती मानकर लीपापोती करने की कोशिश करते हैं। लेकिन इतना तय है कि सलीम निहारिका के इस आक्रामक तेवर ने रायगढ़ की सियासत में एक बार फिर से तापमान बढ़ा दिया है। क्या रायगढ़ प्रशासन के पास शहीदों के सम्मान के लिए वक्त नहीं है? या फिर शहीदों का अपमान अब इस व्यवस्था की 'नई नीति' बन चुकी है? जनता अब जवाब चाहती है और प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। रायगढ़ की सियासत का पारा सातवें आसमान पर है और यह सुलगता हुआ सवाल हर नागरिक की जुबान पर है कि आखिर शहीदों का अपमान कब रुकेगा?