जल में फार्मास्यूटिकल प्रदुषण की रोकथाम के लिए जैव आधारित प्रक्रिया विकसित

जल में फार्मास्यूटिकल प्रदुषण की रोकथाम के लिए जैव आधारित प्रक्रिया विकसित

प्रेस विज्ञप्ति: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान,राउरकेला,

एनआईटी राउरकेला ने पानी में फार्मास्यूटिकल  के प्रदूषक तत्वों की रोकथाम के लिए पर्यावरण अनुकूल जैव-आधारित प्रक्रिया विकासित किया है। 
• हाल में विकसित दो चरणों की इस प्रक्रिया में अपशिष्ट जल में फार्मास्यूटिकल के प्रदूषक तत्वों की रोकथाम के लिए बायोचार एडजार्प्शन और बायोडिग्रेडेशन को आपस में जोड़ा गया है
• इस नवाचार का लक्ष्य फार्मास्यूटिकल के प्रदूषक तत्वों की बढ़ती समस्या की रोकथाम के लिए स्थायी समाधान पेश कर मनुष्य और जल जीवन दोनों की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है
राउरकेला, 13 मार्च 2025: राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला के शोधकर्ताओं ने जैव प्रौद्योगिकी और चिकित्सा इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. अंगना सरकार के मार्गदर्शन में काम करते हुए अपशिष्ट जल में फार्मास्यूटिकल के प्रदूषक तत्वों की रोकथाम की प्रक्रिया विकसित की है। दो चरणों की इस प्रक्रिया में एडजार्प्शन और बायोडिग्रेडेशन को जोड़ा गया है, ताकि एंटीबायोटिक्स, गैर-स्टेरायडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (एनएसआईडी) जैसे फार्मास्युटिकल कम्पाउंड और सिंथेटिक रंगों के प्रदूषक तत्वों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं का समाधान हो। 
यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ वॉटर प्रोसेस इंजीनियरिंग में प्रकाशित किया गया था। प्रोफेसर अंगना सरकार ने अपनी शोध टीम डॉ. कस्तूरी पोद्दार, डॉ. देबप्रिया सरकार (शोध स्नातक) और श्री प्रीतम बाजीराव पाटिल (शोध विद्वान) के साथ संयुक्त रूप से यह शोध पत्र लिखा है।
फार्मास्यूटिकली एक्टिव कम्पाउंड (पीएचएसी) ऐसे प्रदूषक तत्व हैं जिनको लेकर चिंता बढ़ रही है, क्योंकि इनका जैव संचयन और जैव वृद्धि खाद्य श्रृंखला के माध्यम से होता है। ये ट्रेस मात्रा में भी मनुष्यों और जलीय जीवों के लिए खतरनाक हैं। अंतःस्राव में बाधा डालने वाले ये रसायन हार्माेन व्यवस्था को भी प्रभावित करते हैं, जिससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं। ये प्रदूषक तत्व घर की नालियों, अस्पताल के कचरां, फार्मास्यूटिकल उद्योगों और पशुपालन के अपशिष्ट तत्वों के माध्यम से जलाशयों में पहंुच जाते हैं। उदाहरण के तौर पर एक शोध में पाया गया कि तेलंगाना की मुसी नदी में एंटीबायोटिक सिप्रोफ्लोक्सासिन की 5 मिलीग्राम प्रति लीटर (मिग्रा/ली.) से अधिक मात्रा थी क्योंकि उसके निकट फार्मास्यूटिकल उद्योग है। 
अक्सर सॉल्वैंट्स, एपीआई, एडिटिव्स, बाय-प्रोडक्ट्स और इंटरमीडिएट्स सहित फार्मास्युटिकल उत्पादन में उपयोग किए जाने वाले सभी रसायन पूरी तरह से फिल्टर नहीं हो पाते।
मछली, सीप और पक्षियों जैसे जीवन के नीचले स्तरों पर भी प्रतिकूल प्रभाव देखे गए हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में मछली की मृत्यु दर और बाज और गिद्धों की आबादी में गिरावट जैसे मामले सामने आए हैं। इन प्रदूषक तत्वों का मनुष्यों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा है। खास कर किडनी और लीवर की समस्या, उच्च रक्तचाप और विकास संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। अपशिष्ट जल में एंटीबायोटिक्स की मौजूदगी तो विशेष चिंताजनक है। इसकी वजह बड़ी मात्रा में इनका अपरिवर्तित उत्सर्जन होना है, जिसके चलते एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया बढ़ रहे हैं। अपशिष्ट जल उपचार की वर्तमान विधियां इन प्रदूषकों की रोकथाम में नाकाम दिखती हैं। इसलिए ये प्रदूषक तत्व नदियों, झीलों और भूजल में अपनी पैठ बना चुके हैं।
एनआईटी राउरकेला अनुसंधान दल ने इन चुनौतियों के समाधान के लिए एक एकीकृत उपचार प्रक्रिया विकसित की है। दो चरणों की यह प्रक्रिया फार्मास्यूटिकल के प्रदूषक तत्वों से निपटने में प्रभावी रही है। पहले चरण में भुने हुए कोको पीट और चावल के भूसे से प्राप्त बायोचार एडजॉर्बेंट का उपयोग कर एंटीबायोटिक्स को पकड़ा जाता है। इस चरण में जैविक उपचार चरण से पहले एंटीबायोटिक प्रदूषण काफी कम हो जाता है। दूसरे चरण में क्लेबसिएला और स्यूडोमोनास स्ट्रेन सहित एक विशेष बैक्टीरिया समूह का उपयोग करते हुए डिक्लोफेनाक, पैरासिटामोल जैसी दवाओं के कम्पाउंड और सिंथेटिक रंगों के अवशिष्ट खंडित किए जाते हैं।
सिंथेटिक अपशिष्ट जल जिसमें एनएसएआईडी, एंटीबायोटिक्स और फार्मास्यूटिकल के रंग सभी मिले होते हैं, वहां इस प्रक्रिया में प्रदूषक तत्वों के निष्कासन की उत्कृष्ट क्षमता दिखी। इसमें फार्मास्यूटिकल के रंगों और दर्द निवारक दवाओं की बायोडिग्रेडेशन क्षमता 95 प्रतिशत से अधिक थी। बायोचार एडजॉर्प्शन की प्रक्रिया भी बहुत प्रभावी साबित हुई। यह पानी से 99.5 प्रतिशत से अधिक एंटीबायोटिक्स हटाने में सक्षम पाई गई।
एनआईटी राउरकेला में जैव प्रौद्योगिकी और चिकित्सा इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. अंगना सरकार ने इस अनुसंधान का महत्व बताते हुए कहा, ‘‘हमारी नवीन एकीकृत प्रक्रिया एंटीबायोटिक्स, एनएसआईडी और रंगों सहित विभिन्न फार्मास्युटिकल प्रदूषक तत्वों के निष्कासन में सफल रही है। यह प्रक्रिया पूरी तरह से सुरक्षित है क्योंकि इसमें जैविक पद्धतियों का उपयोग किया गया है और किसी विषैले इंटरमीडियरी का उपयोग नहीं किया गया है। इस प्रक्रिया से बायोडिग्रेडिंग बैक्टीरिया सुरक्षित रहते हैं, विषैले बायप्रोडक्ट कम होते हैं और फार्मास्यूटिकल के प्रदूषक तत्वों के पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन को बढ़ावा मिलता है। वर्तमान में इस ट्रीटमेंट पर लगभग 2.6 रुपये प्रति लीटर का खर्च है जो और कम होगा। इसके लिए प्रक्रिया का अनुकूलन करना होगा और इसे ट्रीटमेंट की वर्तमान व्यवस्था में तृतीय चरण के रूप में एकीकृत करना होगा।“
इस बारे में शोधकर्ताओं के सुझाव के अनुसार यह प्रक्रिया गैर विषैली, सतत उपयोगी और लागत प्रभावी है। निकट भविष्य में ही फार्मास्यूटिकल उद्योगों के सहयोग से इसके व्यापक उपयोग की संभावना दिखती है। 
इस मॉडल का फार्मास्युटिकल कम्पाउंड के साथ कार्य प्रदर्शन समान संरचना वाले अन्य अणुओं पर भी लागू किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, अपशिष्ट जल के मानक उपचार के माध्यम से यह ट्रीटमेंट करने से बैक्टीरिया और ठोस अवशेषों के निष्कासन के लिए अतिरिक्त चरणों की आवश्यकता नहीं रह जाएगी।
इसके भावी अध्ययन में बायोचार से अवशोषित एंटीबायोटिक दवाओं को पुनः प्राप्त करने और शुद्ध करने पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। इस तरह एक मूल्यवान संसाधन मिलेगा, जो लाभदायक हो सकता है और जिससे फार्मास्यूटिकल उत्पादन की लागत कम हो सकती है और दवाओं को अधिक किफायती बनाते हुए वंचित समुदायों के लिए सुलभ बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त एंटीबायोटिक-मुक्त बायोचार का बतौर उर्वरक एक नया उपयोग संभव हो सकता है जिससे शून्य-अपशिष्ट प्रक्रिया का लक्ष्य भी पूरा होगा।
इस परियोजना का वित्त पोषण विज्ञान और इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड (इम्प्रिंट-2: अनुसंधान नवाचार और प्रौद्योगिकी का प्रभावीकरण, भारत सरकार की योजना के तहत) ने किया और यह अनुसंधान कैडिला फार्मास्युटिकल लिमिटेड, अहमदाबाद, भारत के सहयोग से किया गया।