औद्योगिक नगरी तालचेर की वायु मंड़ल में घुलता जहर

औद्योगिक नगरी तालचेर की वायु मंड़ल में घुलता जहर

अनुराग आचार्य (व्योरोचीफ) 

तालचेर में करोड़ों रुपए खर्च कर नये जंगल की सृष्टि करने कार्य कागजों में ही सिमट कर रह गया। तालचेर का वातावरण में जहरिला  होने का दावा जब अलग-अलग सरकारी और निजी शोध संस्थान कर रहे हैं तो आम जनता के माथे पर चिंता की रेखाएं खीचना लाजमी है। 
लेकिन तालचर को हर 5 साल में सुधारने का वादा करने वाले राजनेता 5 साल में एक बार चुनाव के वक्त ही नजर आ रहे हैं।

वे लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ कर तालचेर की आराध्य देवी माँ हिंगुला का वास्ता देकर मतदान करवा रहे हैं।  पर्यावरणविदों का मत है कि यदि उन्होंने तालचर के लोगों के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाई होती तो आज उन्हें यह विकट स्थिति नहीं देखनी पड़ती।जब अंग्रेजों ने पहली बार तालचेर क्षेत्र के हंडीधुआ में भूमिगत कोयला खनन शुरू किया तब से आज तक इस क्षेत्र में नित नये खुली मुंह वाली कोयला खदाने विकसित हो रही है।  आज तलचेर और कनिहा क्षेत्र में 9 खुले गड्ढे वाली कोयला खदानें और 3 भूमिगत कोयला खदानें हैं।  इन कोयला खदानों से रोजाना हजारों टन कोयला ट्रकों और ट्रेनों से निर्यात किया जाता है। 
भले ही राज्य और केंद्र को इससे बहुत अधिक राजस्व की प्राप्ति हो रही है, लेकिन तालचेर की जनता का हाल आज व्यापार के बीच में मारे जाने के अलावा कुछ नहीं है।
जल, थल, और नभ, आज प्रदूषित होकर विभिन्न घातक बीमारियों को जन्म दे रही है। इन बीमारियों से स्थानीय जनता गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं, और कुछ अभी भी अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 
 हर साल समृद्धि की खातिर विभिन्न स्थानों पर पेड़ लगाने पर अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं, पर यह पेड़ सोशल मीडिया पर दिखावा मात्र साबित हो रहा है। 

पर्यावरणविदों ने बार-बार शिकायत की है कि इन पेड़ों की हकिकत जमीनी स्तर पर जांच की जाए तो असली तथ्य जनता के सामने आ सकते हैं। एक साल में कितने बृक्ष लगाए हैं और कितने मर गए और कितने बड़े हुए है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि तालचेर की स्थिति भयावह हो जाने के बाद भी कोई ध्यान नहीं दे रहा है।  आज तक एमसीएल तालचेर से राजस्व गांवों, बस्तियों, एकडो़ वन भूमि और कृषि भूमि, जलाशयों, तालाबों आदि का अधिग्रहण करके कोयला निकालता रहा है।
 खनन से मिलने वाली राजस्व को लेकर सरकार ने दो फंड बनाए हैं।
इस फंड़ से जिला खनन और सामाजिक उत्तरदायित्व निधि जैसे कई कार्य किए गए हैं और खनन और बंजर भूमि के विकास के लिए व्यवस्था की गई है।  तलचेर की भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, पेयजल की बहुविध समस्याएँ अभी भी हैं, लेकिन जब इन दोनों निधियों का यहाँ ठीक से निवेश नहीं किया जा रहा है, तो सवाल यह है कि बाहरी क्षेत्र के हित में निवेश कैसे किया जा रहा है?
 तालचेर प्रखंड और कनिहा प्रखंड सहित तालचेर नगर परिषद के 21 वार्ड कोयले की धूल और धुएं से प्रभावित हैं.  घर-द्वार, गलियों, कुओं, तालाबों और नदियों के किनारे हर जगह कोयले का भंडार देखा जा सकता है!  यह दुर्भाग्य की बात है कि गरीबी और स्थानीय लोगों के मूल अधिकारों को छीनने की इस मुख्य समस्या पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है।