आपदाएं यूं ही हमारे दरवाजों पर दस्तक देने नहीं आतीं
नितिन सिन्हा (संपादक, दैनिक खबर सार)
सुन सको तो सुन लो...
आपदाएं यूं ही हमारे दरवाजों पर दस्तक देने नहीं आतीं,
हम उन्हें बुलाते हैं अपने गांव, अपने शहर,अपनी बस्तियों और अपनी गलियों में बार-बार.
जबकि आपदाएं बताती रही हैं हमें हर बार,
कि हमने सीमाएं लांघना जारी रखा है,,
जंगल के जंगल काटने बंद नहीं किए हैं,
वादियों से जमीन लूटना नहीं रोका है,
नदियों-नालों के प्राकृतिक रास्ते संकरे कर दिए हैं,
समुंदर में घुसकर कृत्रिम शहर बसाना नहीं छोड़ा है,
पहाड़ों की छातियों में अब भी बारूद बांध रहे हैं।।
जबकि कई बार हमें पर्यावरण विदों ने चेतावनियाँ दीं थी, हमें समझाया-बुझाया था और हमारी जमीनों की भूख को शांत करने को कहा था।। उन्होंने हमें चेताया था कि कैसे आपदाएं हमारा सब_कुछ तबाह करने का अवसर खोज रही हैं, तब हमने उन्हें 'अर्बन नक्सली', 'विकास विरोधी',"देशद्रोही" और न जाने क्या-क्या कहा था,यहां तक कि उनकी हंसी भी उड़ाई थी,, आज जब धरती सूखने लगी है, हवाएं गर्म हो गई हैं,जलवायु में बड़े बदलाव आ गए हैं,,नदी-तालाबों से पानी गायब होने लगा है,बर्फीले तूफानों ने कोहराम मचाना शुरू कर दिया है,हिमनदों से भयंकर सैलाब बहकर आने लगा है और जलधि (समुद्र) धरती को डुबाने लगी है. अब हमें हमारी भूल याद आ रही है,,हम विचार रहे हैं कि प्रकृति की जिस लूट को हमने 'विकास' का नाम दिया है,वास्तव में उसने अपना परिचय प्रचंड 'विनाश' के रूप में हमें दिया है।। सच है कि आपदा यूं ही हमारे दरवाजे पर दस्तक देने नहीं आईं है,हमने इसे बुलाया है अपने गांव,अपने शहर,अपनी बस्तियों और अपनी गलियों में हर बार की तरह इस बार भी ! —





