सोशल मीडिया का गलत उपयोग चिंता का विषय

सोशल मीडिया का गलत उपयोग चिंता का विषय

सोशल मीडिया को बंद करना समाधान नहीं है। समाधान है—जिम्मेदार उपयोगकर्ता, जागरूक समाज, सतर्क प्रशासन और जवाबदेह डिजिटल व्यवस्था। तभी सोशल मीडिया समाज को जोड़ने और मजबूत करने का माध्यम बनेगा, उसे बांटने और भ्रमित करने का नहीं।

सोशल मीडिया आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। सूचना, संवाद, शिक्षा, व्यापार और जनजागरूकता के क्षेत्र में इसने क्रांतिकारी बदलाव लाया है। कुछ ही सेकंड में कोई खबर हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। लेकिन जिस तेजी से सोशल मीडिया का विस्तार हुआ है, उसी तेजी से इसके दुरुपयोग की समस्या भी गंभीर होती जा रही है।

आज सोशल मीडिया पर बिना सत्यापन के खबरें, अफवाहें, भ्रामक वीडियो और आपत्तिजनक टिप्पणियां तेजी से प्रसारित हो रही हैं। कई बार लोग किसी पोस्ट की सच्चाई जाने बिना उसे आगे साझा कर देते हैं। परिणामस्वरूप एक झूठी सूचना देखते ही देखते ऐसा रूप ले लेती है, जिससे समाज में भ्रम, तनाव और विवाद पैदा हो सकता है।

सोशल मीडिया का एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि कुछ लोग इसे चरित्र हनन और व्यक्तिगत बदनामी का माध्यम बना रहे हैं। किसी व्यक्ति की तस्वीर या वीडियो को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत करना, उसके बारे में अपमानजनक टिप्पणी करना अथवा बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाना न केवल सामाजिक रूप से नुकसानदायक है, बल्कि कई मामलों में कानूनी परेशानी भी पैदा कर सकता है।

राजनीति और सामाजिक मुद्दों में भी सोशल मीडिया की भूमिका बढ़ी है। लोकतंत्र में विचारों की अभिव्यक्ति आवश्यक है, लेकिन असहमति को दुश्मनी में बदलना और राजनीतिक बहस को गाली-गलौज तक पहुंचा देना स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत नहीं है। आलोचना तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि अफवाह और व्यक्तिगत हमलों पर।

इसका सबसे गंभीर प्रभाव बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है। लगातार मोबाइल और सोशल मीडिया के उपयोग से समय की बर्बादी के साथ-साथ मानसिक दबाव, आभासी दुनिया पर निर्भरता और सामाजिक व्यवहार में बदलाव जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। लाइक, कमेंट और फॉलोअर्स की दौड़ कई युवाओं को वास्तविक जीवन से दूर कर रही है।

ऐसे समय में सवाल केवल यह नहीं है कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग कौन कर रहा है? सवाल यह भी है कि हम स्वयं कितने जिम्मेदार सोशल मीडिया उपयोगकर्ता हैं।

हर नागरिक को किसी भी सूचना को साझा करने से पहले उसकी सत्यता जांचनी चाहिए। किसी की निजी तस्वीर, वीडियो या जानकारी को उसकी अनुमति के बिना प्रसारित करने से बचना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है।

सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। फर्जी खबरों, साइबर अपराध, फर्जी खातों और आपत्तिजनक सामग्री पर प्रभावी निगरानी जरूरी है। लेकिन केवल कानून बना देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। डिजिटल साक्षरता और जिम्मेदार नागरिक व्यवहार भी उतना ही आवश्यक है।

सोशल मीडिया अपने आप में न अच्छा है, न बुरा। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से करते हैं। यही मंच समाज को जोड़ सकता है और यही मंच समाज में भ्रम भी फैला सकता है।इ सलिए समय की मांग है कि हम सोशल मीडिया को मनोरंजन का साधन भर नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल किए जाने वाले सार्वजनिक मंच के रूप में देखें।ए क क्लिक से खबर फैल सकती है, लेकिन एक गलत क्लिक किसी की जिंदगी भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए पोस्ट करने से पहले सोचें, साझा करने से पहले जांचें और बोलने से पहले जिम्मेदारी समझें।

सोशल मीडिया का गलत उपयोग चिंता का विषय

संपादकीय

सोशल मीडिया ने दुनिया को हमारी हथेली में ला दिया है। आज किसी घटना की जानकारी कुछ ही मिनटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। शिक्षा, रोजगार, व्यापार, जनजागरूकता और लोकतांत्रिक संवाद के लिए यह एक शक्तिशाली माध्यम बन चुका है। लेकिन यही शक्ति जब बिना जिम्मेदारी के इस्तेमाल होती है, तो इसका दुष्परिणाम भी उतना ही गंभीर होता है। सोशल मीडिया का गलत उपयोग आज समाज के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गया है।

हमारे अपने आसपास इसके उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। भुवनेश्वर या प्रदेश के किसी कस्बे में सड़क दुर्घटना की तस्वीर सामने आते ही कुछ लोग बिना घटना की सही जगह और समय जाने उसे अलग इलाके का बताकर प्रसारित कर देते हैं। कभी पुरानी बाढ़ की तस्वीर को वर्तमान बारिश से जोड़ दिया जाता है, तो कभी किसी दूसरे जिले की घटना को अपने इलाके की घटना बताकर व्हाट्सऐप समूहों में डाल दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि वास्तविक जानकारी आने से पहले अफवाह लोगों के बीच पहुंच जाती है।

एक स्थानीय दुकानदार का उदाहरण लें। उसने अपने व्यवसाय के प्रचार के लिए सोशल मीडिया पर दुकान का मोबाइल नंबर और स्थान साझा किया। कुछ समय बाद उसके नाम और तस्वीर का इस्तेमाल कर किसी ने फर्जी प्रोफाइल बना ली और ग्राहकों से ऑनलाइन भुगतान मांगना शुरू कर दिया। दुकानदार को तब पता चला, जब एक ग्राहक ने फोन कर पूछा कि उसने पैसे भेजे थे, सामान क्यों नहीं मिला। यह काल्पनिक स्थिति नहीं, बल्कि आज के डिजिटल माहौल में किसी भी छोटे कारोबारी के सामने पैदा हो सकने वाला वास्तविक खतरा है।

इसी तरह एक सामान्य परिवार की कल्पना कीजिए, जहां किसी सदस्य को सोशल मीडिया पर संदेश मिलता है कि सरकार की किसी योजना का लाभ पाने के लिए लिंक पर क्लिक कर आधार या बैंक संबंधी जानकारी भरनी है। संदेश सरकारी भाषा और लोगो के साथ इतना वास्तविक दिखाई देता है कि व्यक्ति भरोसा कर लेता है। कुछ ही समय बाद उसके खाते से रकम निकल जाती है। सवाल यह है कि तकनीक का इस्तेमाल करने वाला आम नागरिक ऐसी चालबाजी से कैसे बचे?

फर्जी और भ्रामक खबरों का प्रसार भी गंभीर समस्या है। चुनाव के समय नेताओं के नाम से फर्जी बयान, सरकारी योजनाओं के नाम पर नकली घोषणाएं और पुरानी घटनाओं के वीडियो को नई घटना बताकर साझा करने के मामले सामने आते रहते हैं। स्थानीय व्हाट्सऐप समूह इसका सबसे आसान माध्यम बन जाते हैं। मोहल्ले, बाजार, विद्यालय या सामाजिक संगठन के समूह में किसी व्यक्ति द्वारा भेजी गई सूचना को लोग अक्सर इसलिए सही मान लेते हैं क्योंकि उसे भेजने वाला परिचित होता है। लेकिन परिचित व्यक्ति भी गलत सूचना का शिकार हो सकता है।

मॉर्फ्ड वीडियो और डीपफेक ने समस्या को और गंभीर बना दिया है। किसी स्थानीय जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक अथवा व्यवसायी की आवाज और चेहरे के साथ छेड़छाड़ कर ऐसी सामग्री बनाई जा सकती है, जिससे वह व्यक्ति कुछ ऐसा कहता या करता हुआ दिखाई दे जो उसने वास्तव में कभी किया ही नहीं। किसी छोटे शहर या कस्बे में ऐसी सामग्री का नुकसान और अधिक हो सकता है, क्योंकि वहां व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और सामाजिक पहचान का महत्व बहुत बड़ा होता है।

व्यक्तिगत स्तर पर भी सावधानी जरूरी है। मान लीजिए किसी परिवार का कोई सदस्य शादी या किसी सामाजिक समारोह की तस्वीर सोशल मीडिया पर डालता है। तस्वीर देखकर कोई अजनबी उसके परिवार, बच्चों, स्थान या निजी जीवन से संबंधित जानकारी जुटा सकता है। आगे चलकर वही जानकारी ठगी या उत्पीड़न में इस्तेमाल हो सकती है। इसलिए हर तस्वीर सार्वजनिक करने से पहले यह सोचना जरूरी है कि उसे कौन-कौन देख सकता है और उससे कौन-सी निजी जानकारी सामने आ रही है।

सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत बदनामी का खतरा भी बढ़ा है। किसी व्यक्ति से विवाद हुआ तो उसकी तस्वीर के साथ आपत्तिजनक टिप्पणी कर देना, अधूरी घटना को पूरा सच बताकर पोस्ट कर देना या निजी बातचीत का स्क्रीनशॉट सार्वजनिक कर देना आज बेहद आसान हो गया है। एक पोस्ट कुछ मिनट में सैकड़ों लोगों तक पहुंच सकती है, लेकिन उसे हटाने के बाद भी उसका स्क्रीनशॉट और कॉपी इंटरनेट पर बनी रह सकती है।

साइबर ठगी के मामले में भी सावधानी जरूरी है। नौकरी, निवेश, ऑनलाइन पुरस्कार, पार्ट-टाइम काम या किसी परिचित की आपात मदद के नाम पर संदेश भेजे जाते हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि ठगी करने वाला व्यक्ति अब केवल पैसा ही नहीं मांगता, बल्कि भरोसा पैदा करता है। पहले छोटी रकम का लेन-देन, फिर बड़ा प्रस्ताव और अंत में भारी आर्थिक नुकसान—यह तरीका किसी भी सोशल मीडिया उपयोगकर्ता को निशाना बना सकता है।

कई बार सोशल मीडिया की अफवाहें सामाजिक तनाव का कारण भी बन जाती हैं। किसी संवेदनशील घटना की आधी-अधूरी जानकारी, पुरानी तस्वीर या भड़काऊ टिप्पणी को हजारों लोग साझा कर देते हैं। ऐसी स्थिति में प्रशासन के लिए भी सच्चाई स्पष्ट करना कठिन हो जाता है। एक जिम्मेदार नागरिक का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह अपुष्ट सामग्री को आगे न बढ़ाए।

इस समस्या का एक और व्यक्तिगत पहलू है—हम स्वयं सोशल मीडिया के आदी होते जा रहे हैं। सुबह उठते ही मोबाइल देखना, हर घटना को पोस्ट करना, लगातार लाइक और कमेंट की प्रतीक्षा करना और दूसरों की जिंदगी से अपनी तुलना करना धीरे-धीरे सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। परिवार के सदस्य एक ही कमरे में बैठे होते हैं, लेकिन बातचीत कम और स्क्रीन पर ध्यान अधिक होता है। यह भी सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल का एक शांत लेकिन गंभीर रूप है।

यहां सवाल है—क्या हर वायरल सामग्री सच होती है? बिल्कुल नहीं। किसी पोस्ट पर हजारों लाइक या लाखों व्यूज होना उसकी सत्यता का प्रमाण नहीं है। किसी खबर को साझा करने से पहले कम-से-कम यह देखना चाहिए कि उसका स्रोत क्या है, खबर कब की है और क्या किसी विश्वसनीय माध्यम ने इसकी पुष्टि की है।

स्थानीय स्तर पर स्कूल, कॉलेज, पंचायत, नगर निकाय, सामाजिक संगठन और पत्रकारिता संस्थान डिजिटल जागरूकता अभियान चला सकते हैं। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि फर्जी लिंक की पहचान कैसे करें, संदिग्ध अकाउंट से कैसे बचें, निजी जानकारी सार्वजनिक करने के क्या खतरे हैं और किसी आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार पर शिकायत कहां की जा सकती है।

मीडिया की जिम्मेदारी भी यहां महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है—पहले सत्यापन, फिर प्रकाशन। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही सामग्री को समाचार मान लेना पत्रकारिता नहीं है। स्थानीय पत्रकारों को विशेष रूप से यह सावधानी बरतनी होगी कि सनसनी की दौड़ में अपुष्ट सामग्री को खबर का रूप न दिया जाए।

दरअसल, समस्या सोशल मीडिया के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके अनियंत्रित और गैर-जिम्मेदार इस्तेमाल में है। जिस मंच से बाढ़, दुर्घटना या आपदा के समय मदद पहुंचाई जा सकती है, उसी मंच से अफवाह भी फैलाई जा सकती है। जिस माध्यम से किसी जरूरतमंद की आवाज प्रशासन तक पहुंच सकती है, उसी माध्यम से किसी निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी नष्ट की जा सकती है।

इसलिए सोशल मीडिया पर स्वतंत्रता के साथ संयम, सत्यापन और जिम्मेदारी भी जरूरी है।

एक क्लिक से खबर फैलती है, लेकिन उसके पीछे किसी व्यक्ति का सम्मान, किसी परिवार की सुरक्षा और कभी-कभी पूरे समाज का माहौल जुड़ा होता है। इसलिए पोस्ट करने से पहले सोचें, साझा करने से पहले जांचें और प्रतिक्रिया देने से पहले ठहरें।

सोशल मीडिया को बंद करना समाधान नहीं है। समाधान है—जिम्मेदार उपयोगकर्ता, जागरूक समाज, सतर्क प्रशासन और जवाबदेह डिजिटल व्यवस्था। तभी सोशल मीडिया समाज को जोड़ने और मजबूत करने का माध्यम बनेगा, उसे बांटने और भ्रमित करने का नहीं।