शहीद-ए-आजम भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रखर, बौद्धिक और लोकप्रिय क्रांतिकारियों में से एक थे। उनके अदम्य साहस, क्रांतिकारी विचारों और सर्वोच्च बलिदान ने देश की युवा पीढ़ी को आंदोलित किया और स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी।
भगत सिंह के जीवन का विस्तृत परिचय निम्नलिखित है:
1. प्रारंभिक जीवन और परिवार
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जन्म: भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 (कुछ दस्तावेजों के अनुसार 27 सितंबर) को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव (अब पाकिस्तान) में हुआ था।
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देशभक्त परिवार: उनका पूरा परिवार स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ था। उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह सक्रिय रूप से स्वतंत्रता आंदोलनों में शामिल थे। देशप्रेम की यह भावना भगत सिंह को विरासत में मिली थी।
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शिक्षा: उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के दौरान ही वे विभिन्न राष्ट्रीय गतिविधियों और नाटकों में हिस्सा लेने लगे थे।
2. क्रांतिकारी गतिविधियों की शुरुआत
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असहयोग आंदोलन का प्रभाव: शुरुआती दौर में वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित थे, लेकिन 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद जब गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया, तो युवा भगत सिंह की सोच में बदलाव आया। उन्हें लगा कि ब्रिटिश शासन को केवल अहिंसक तरीकों से उखाड़ फेंकनामुश्किल है।
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नौजवान भारत सभा: वर्ष 1926 में उन्होंने युवाओं को संगठित करने के लिए 'नौजवान भारत सभा' की स्थापना की।
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हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA): जल्द ही वे चंद्रशेखर आजाद के संपर्क में आए और 'HRA' (हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन) से जुड़ गए। बाद में उन्होंने और उनके साथियों ने मिलकर इसका नाम बदलकर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' कर दिया, जिसका उद्देश्य समाजवादी विचारधारा के आधार पर स्वतंत्र भारत की स्थापना करना था।
3. प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएं
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सॉन्डर्स हत्याकांड (1928): साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाठीचार्ज में महान राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई थी। इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे.पी. सॉन्डर्स को लाहौर में गोली मार दी।
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केंद्रीय विधानसभा बम विस्फोट (1929): 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश सरकार की बहरी कानों तक अपनी आवाज पहुंचाने के लिए दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। बम का उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं, बल्कि सरकार को चेताना था। विस्फोट के बाद उन्होंने भागने से इनकार कर दिया और "इंकलाब जिंदाबाद!" के नारों के साथ अपनी गिरफ्तारी दी।
4. जेल का जीवन और वैचारिक योगदान
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जेल के भीतर भी भगत सिंह का संघर्ष जारी रहा। भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार और भेदभाव के खिलाफ उन्होंने और उनके साथियों ने 64 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल की।
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जेल में रहते हुए उन्होंने जमकर अध्ययन किया। उन्होंने कार्ल मार्क्स, लेनिन और दुनिया भर के समाजवादी विचारकों को पढ़ा। उनके द्वारा लिखे गए लेख और पत्र (जैसे "मैं नास्तिक क्यों हूं?") आज भी उनके गहरे राजनीतिक और दार्शनिक ज्ञान को दर्शाते हैं।
5. शहादत (23 मार्च 1931)
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लाहौर षड्यंत्र केस में अदालत ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मौत की सजा सुनाई।
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तय तारीख से एक दिन पहले यानी 23 मार्च 1931 की शाम को लाहौर जेल में इन तीनों अमर क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी दे दी गई। अंग्रेजों ने उनकी बढ़ती लोकप्रियता से डरकर तय समय से पहले ही चुपचाप उनका अंतिम संस्कार सतलुज नदी के किनारे कर दिया था।
भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के विचारक, लेखक और दूरदर्शी स्वप्नद्रष्टा थे, जिनका जीवन आज भी देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।