बेल्जियम नीदरलैंड की संयुक्त मेजबानी में होगा हाॅकी का महासंग्राम
पुरूष-महिला विश्व कप हॉकी : बेल्जियम-नीदरलैंड की संयुक्त मेजबानी में होगा महासंग्राम
सतीश शर्मा (उप संपादक)
विश्व हॉकी का सबसे बड़ा महाकुंभ एक बार फिर दस्तक दे चुका है। 15 से 30 अगस्त तक बेल्जियम और नीदरलैंड की संयुक्त मेजबानी में एफआईएच हॉकी विश्व कप का 16वां संस्करण खेला जाएगा। खास बात यह है कि पहली बार पुरुष और महिला विश्व कप का आयोजन एक साथ हो रहा है। बेल्जियम के वेव्रे और नीदरलैंड के आम्स्टेलवीन में दुनिया की 16-16 शीर्ष टीमें विश्व चैंपियन बनने के लिए जूझेंगी। भारतीय पुरुष टीम 51 वर्षों से चले आ रहे विश्व कप पदक के सूखे को समाप्त करने उतरेगी, जबकि महिला टीम पहली बार विश्व कप पदक जीतकर इतिहास रचने की कोशिश करेगी। भारतीय पुरुष टीम अपने अभियान की शुरुआत 15 अगस्त को वेल्स के खिलाफ करेगी। पूल डी में भारत का दूसरा मुकाबला 17 अगस्त को इंग्लैंड और तीसरा मुकाबला 19 अगस्त को चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के खिलाफ होगा। महिला टीम 16 अगस्त को चीन के खिलाफ अभियान शुरू करेगी। इसके बाद 18 अगस्त को दक्षिण अफ्रीका और 20 अगस्त को इंग्लैंड से मुकाबला होगा।
51 साल से अधूरा है स्वर्णिम सपना
भारत उन चार देशों में शामिल है, जिन्होंने अब तक आयोजित सभी पुरुष विश्व कप में भाग लिया है। भारत के अलावा नीदरलैंड, जर्मनी और स्पेन ही ऐसी टीमें हैं, जिनकी मौजूदगी हर विश्व कप में रही है। विश्व कप के शुरुआती वर्षों में भारतीय हॉकी ने अपनी श्रेष्ठता का शानदार परिचय दिया। 1971 में कांस्य, 1973 में रजत और 1975 में स्वर्ण—पहले तीन विश्व कप में भारत लगातार पोडियम खड़ा दिखाई दिया। लेकिन 1975 के कुआलालंपुर विश्व कप में पाकिस्तान को हराकर जीता गया स्वर्ण आज भी भारतीय हॉकी की सबसे चमकदार उपलब्धि बना हुआ है। उसके बाद से विश्व कप में भारत की कहानी उम्मीद, निराशा और संघर्ष के बीच झूलती रही है। पदक तो दूर, भारतीय टीम उसके बाद कभी सेमीफाइनल तक भी नहीं पहुंच सकी। पिछले 12 संस्करणों में सात बार भारत क्वार्टर फाइनल की बाधा भी पार नहीं कर पाया। यह आंकड़ा उस देश के लिए निश्चित रूप से चिंताजनक है, जिसने कभी विश्व हॉकी पर अपना दबदबा कायम किया था। इसलिए 2026 विश्व कप भारत के लिए पुराने गौरव को वापस पाने का मौका है।
घरेलू मेजबानी, लेकिन सफलता अभी दूर
भारत ने चार बार पुरुष विश्व कप की मेजबानी की है। 1982 में मुंबई, 2010 में दिल्ली, 2018 में भुवनेश्वर और 2023 में भुवनेश्वर-राउरकेला ने दुनिया की श्रेष्ठ हॉकी टीमों का स्वागत किया। घरेलू दर्शकों की जबरदस्त मौजूदगी और हॉकी के प्रति जुनून के बावजूद भारत इन चारों अवसरों पर विश्व कप ट्रॉफी से दूर रहा। 2018 में टीम क्वार्टर फाइनल तक पहुंची, जबकि 2023 में नौवें स्थान पर रही। यह विरोधाभास भी भारतीय हॉकी की कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है—मेजबानी में सफलता, लेकिन घरेलू मैदान पर भी पदक जीतने में विफलता।
ओडिशा : भारतीय हॉकी की मजबूत धड़कन
जब भारतीय हॉकी की बात होती है तो ओडिशा का उल्लेख स्वाभाविक रूप से सामने आता है। देश की हॉकी प्रतिभाओं की नर्सरी के रूप में पहचान बना चुके इस राज्य ने भारतीय टीम को लगातार अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी दिए हैं। 2026 विश्व कप में भारतीय पुरुष टीम में ओडिशा के दो खिलाड़ी—अमित रोहिदास और शिलानंद लकड़ा—शामिल हैं। महिला टीम में सुनेलिता टोप्पो राज्य की एकमात्र प्रतिनिधि हैं। ओडिशा और विश्व कप का रिश्ता हालांकि नया नहीं है। इसकी जड़ें 1982 के जूनियर विश्व कप तक जाती हैं, जब पीटर तिर्की ने भारतीय टीम में जगह बनाई थी। सीनियर विश्व कप में ओडिशा के खिलाड़ियों को अपनी पहचान बनाने के लिए 1998 तक इंतजार करना पड़ा। उस वर्ष दिलीप तिर्की और लाजरुस बारला ने भारतीय टीम में जगह बनाई। इसके बाद ओडिशा के खिलाड़ियों की उपस्थिति भारतीय विश्व कप टीमों में लगातार मजबूत होती गई। पुरुष वर्ग में दिलीप तिर्की (3 विश्व कप 1998, 2002, व 2006), अमित रोहिदास (2018, 2023 व 2026 ), , लाजरुस बारला (1998 व 2022), इग्नेश तिर्की ( 2002 और 2006) , प्रबोध तिर्की (2006), बीरेंद्र लकड़ा (2014 और 2018), नीलम संजीप खेस (2023) तथा शिलानंद लकड़ा (2026) ने भारतीय जर्सी पहनकर ओडिशा का गौरव बढ़ाया है। महिला विश्व कप में खेलने वाली ओड़िशा की पहली खिलाड़ी ज्योति सुनीता कुल्लू बनी। ज्योति ने 1998 और 2006 के विश्व कप में देश का प्रतिनिधित्व किया । ज्योति कुल्लू के बाद सुभद्रा प्रधान और बिनीता टोपो (2006 व 2010), मुक्ता प्रभा बारला (2010) सुनीता लकड़ा, नमिता टोपो, लिलिमा मिंज (2018) और दीपग्रेस एक्का (2018 और 2022) की विरासत अबसुनेलिता टोपो (2026) तक पहुंच चुकी है। दिलीप तिर्की और ज्योति सुनीता कुल्लू की एक और खास उपलब्धि है। दोनों 2006 विश्व कप में भारतीय टीमों की कप्तानी कर चुके हैं। यह उपलब्धि ओडिशा की हॉकी विरासत को और समृद्ध बनाती है।
आयोजन से प्रायोजन तक ओडिशा की भूमिका
ओडिशा ने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय हॉकी के विकास में केवल खिलाड़ियों के माध्यम से ही योगदान नहीं दिया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की मेजबानी और प्रायोजन के जरिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2018 और 2023 के पुरुष विश्व कप तथा 2021 के जूनियर पुरुष विश्व कप की मेजबानी ओडिशा ने की। भुवनेश्वर और राउरकेला अंतरराष्ट्रीय हॉकी के प्रमुख केंद्रों के रूप में उभरे। 2018 में ओडिशा ने भारतीय हॉकी के चहुंमुखी विकास के लिये दस वर्ष तक जिम्मेदारी उठाने की घोषणा की जिसे अब बढ़ाकर 2036 तक कर दिया गया है। ओड़िशा ने प्रायोजक बनकर भारतीय खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने में मदद की है।
महिला हॉकी : अब पदक की बारी
भारतीय महिला हॉकी की कहानी संघर्ष और संभावनाओं से भरी है। 1974 में पहली बार महिला विश्व कप आयोजित हुआ। इस प्रतियोगिता में अजिन्दर कौर की कप्तानी में भारतीय दल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए चौथा स्थान प्राप्त किया। यह भारतीय महिलाओं का अबतक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। इस प्रतियोगिता में भारत ने लीग स्टेज में मजबूत नीदरलैंड्स को 1-0 से हराकर पूरी दुनिया को चौंका दिया था। हालांकि नीदरलैंड ही बाद में चैंपियन बना। लेकिन बाद के विश्व कप में भारत अपनी छाप छोड़ने में विफल रहा है। अब तक आयोजित 15 महिला विश्व कप में भारतीय टीम सात बार क्वालीफाई तक नहीं कर सकी है। 1974 में हासिल चौथा स्थान आज भी उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। 2026 में यह तस्वीर बदलने का अवसर है। खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिली हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टीम ने कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। एफआईएच महिला नेशंस कप जैसे खिताब ने टीम के आत्मविश्वास को मजबूती दी है। दल की कप्तान सलीमा टेटे ने तो इस बार पदक जीतने का भरोसा दिया है।
1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक में पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने के साथ भारतीय हॉकी के स्वर्णिम युग की शुरुआत हुई थी। 1973 में भी नीदरलैंड की धरती पर भारतीय टीम दूसरे विश्व कप में फाइनल तक पहुंचा था। मेजबान नीदरलैंड से टाईब्रेकर में हारकर भारत को रजत पदक मिला थाअब 2026 में विश्व कप फिर नीदरलैंड और बेल्जियम की धरती पर है। भारतीय पुरुष हॉकी के लिए पिछले कुछ वर्ष उम्मीदों से भरे रहे हैं। टोक्यो 2020 और पेरिस 2024 ओलंपिक में लगातार दो कांस्य पदक जीतने के बाद टीम ने यह साबित किया कि वह विश्व की शीर्ष टीमों को चुनौती देने की क्षमता रखती है। हरमनप्रीत सिंह के नेतृत्व में मौजूदा टीम की फिटनेस, कौशल, अनुभव और मजबूत बेंच स्ट्रेंथ से उम्मीदों को पंख लगे हैं। जर्सी को लेकर उठे विवाद ने जरूर मैदान के बाहर चर्चा पैदा की है, लेकिन खिलाड़ियों के लिए असली चुनौती मैदान पर है। ऐसे में जरूरी है कि विवाद पीछे छूटे और पूरा ध्यान विश्व कप अभियान पर केंद्रित हो।
भारत के सामने इस बार दो अलग-अलग लक्ष्य हैं।
पुरुष टीम के सामने 51 वर्ष का पदक सूखा खत्म करने की चुनौती है। महिला टीम के सामने विश्व कप इतिहास का पहला पदक जीतने का सपना हैशटैग।
क्या पुरुष टीम 51 वर्षों का इंतजार खत्म करेगी?
क्या भारतीय महिलाएं पहली बार विश्व कप पोडियम पर पहुंचेंगी?
इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए
देश के करोड़ों हॉकी प्रेमियों की उम्मीद भरी निगाहें 15 से 30 अगस्त के बीच हॉकी के मैदान पर टिकी होंगी। ओलिंपिक पदक के बाद शायद इस बार विश्व कप पदक भी भारतीय खिलाड़ियों के गले की शोभा बने यह सपना खिलाड़ियों के साथ हर भारतीय देख रहा होगा।





