तालचर कॉलेज के संस्थापकों की उपेक्षा

तालचर कॉलेज के संस्थापकों की उपेक्षा

अनुराग आचार्य (व्यौरोचीफ) 

अपना खून पसीना देकर बनाए गए तालचर कॉलेज के पूर्वजों को कॉलेज के अधिकारी, राजनेता और प्रशासन पूरी तरह से भूल रहे हैं।  संयोग से, 1969 से तालचेर में ब्राह्मणी नदी के तट पर ब्रिटिश शासन में पुरानी कचेरी में तालचेर के राजा सौभाग्य चंद्र देव की मदद से तालचेर कॉलेज की स्थापना की गई थी।  तालचेर क्षेत्र के पुर्वज, स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता बृंदावन महापात्र ने सबसे पहले अपनी जमीन बेचकर ₹20510,दिए थे बाद में कॉलेज के सुधार के लिए तालचेर क्षेत्र के प्रमुख समाजसेवियों व दिग्गजों में विक्रम थंब, जगदानंद मिश्र, विक्रम दास, हदीबंधु सीठ, रत्नाकर मिश्रा, बमदेव मिश्रा, सच्चिदानंद दास ने घर-घर जाकर इस तालचर कॉलेज के लिए भीख मांगी.  इसके साथ ही नरसिंह शल्फी दास, हैहम खान ने भी कुछ धनराशि दान की और उस समय के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय मोहन प्रधान कनिहा प्रखंड से महाविद्यालय के उज्ज्वल भविष्य के लिए धन भी दिया और उन्हें मान्यता देकर मदद करने का भी प्रयास किया। सरकारी स्तर पर कॉलेज को 1971 में, विश्वविद्यालय की आधिकारिक मान्यता मिली।  कॉलेज को 1974 में स्थानांतरित कर दिया गया था जब तालचेर के राजा साहब ने ब्राह्मण नदी, राजाबट्टी, तालचेर के तट पर पुराने ब्रिटिश स्वामित्व वाले कचेरी में चलवनकुट्टा के सामने लगभग 13 एकड़ जमीन दी थी।  तब से लेकर अब तक कॉलेज की प्रगति दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है और आज यह तालचेर क्षेत्र को गौरवान्वित कर रहा है।अफसोस की बात है कि स्थानीय प्रशासन, तालचेर कॉलेज के अधिकारी और राजनेता उन महापुरुषों को पूरी तरह से भूल चुके हैं।  हालाँकि, इन पूर्वजों की स्मृति को संरक्षित करने के लिए, कॉलेज में एक हॉल बनाया गया था और अगली पीढ़ी की स्मृति में उनके चित्र स्थापित किए गए थे, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।  1969 को भले ही 53 साल बीत चुके हों, लेकिन इस बात को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि उनकी अनदेखी क्यों की जा रही है।