करमा पर्व - इस पर्व में होती है करम बृक्ष की पूजा

करम / करमा झारखंड, बिहार,उडिशा,पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार भादो मास की एकादशी  के दिन और कुछ एक स्थानों पर इसी के आसपास के दिनो में मनाया जाता है। इस त्यौहार में श्रद्धालु प्रकृति की पूजा करते हैं,और प्रकृती से अच्छी फसल की कामना करते हैं,बहनें अपने भाइयों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं।

भादो मास की एकादशी का मनाया जाने वाला इस त्यौहार की तैयारी बहने सप्ताह भर पहले से ही शुरु कर देती है। बहनें अपने भाई की मंगल कामना करते हुए एकादशी से सप्ताह भर पहले ही कुर्थी (कुरथ)धान, गेहूं,मूंग और उर्द इन पांच प्रकार के अनाजों का जावा करती है, इसके लिए इन अनाजों को रेत में मिलाकर एक बड़े बर्तन में रख दिया जाता है और प्रत्येक दिन संध्या बेला में इस जावा का विधिवत पुजन कर इस जावा को जल अर्पण करती है।  एकादशी तक इस जावा से छोटे छोटे पौधे उग आते हैं।इन जावा को पूजा के दिन करम बृक्ष के पास रख कर इसके चारो ओर दीप प्रज्वलित कर विधि अनुसार पूजा किया जाता है। कर्म पूजा एकादशी के दिन पूजा करने वाले दिन भर उपवास कर उस स्थान पर बृृक्ष ना हो तो संध्या बेला में कर्म वृक्ष के शाखा को कुल्हाड़ी के एक ही वार से काट कर लाते हैं,शाखा को काटते वक्त इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि शाखा एक ही वार में काट जाए।काटने के बाद इस शाखा को गाजे बाजे के साथ नाच गान करते हुए लाया जाता है और अपने अखाड़ा (पूजा स्थली) या अपने आंगन में रोपित कर विधिवत पूजा करते हैं। इस शाखा के चारों बहने अपने जावा को रखकर और दीप प्रज्वलित कर पूजा करती है।पूजा हो जाने के बाद करम डाल के चारो ओर वर्गाकार चैन बनाकर गाँव के लोग रात भर गीत गाते हुए नाचते हैं।इस अवसर पर गाए जानेवाली गीत को कलयुगी, व नृत्य को करमनाच कहा जाता है। करम गीत और करम नाच पश्चिम ओडिशा,झारखण्ड,बंगाल,व छत्तीसगढ़ का लोकगीत व लोकनृत्य भी है। 

ओराम समाज के लोग करम पर्व के बाद नये वर,बधू की तालश शुरू करते है। वही कुर्मी समाज की महिलाएँ अपने भाइयों,पुत्रो की कुशलता के लिए या अपनी मनोकामना पूर्ती के लिए या पूर्ण होने पर इस त्यौहार को मनाती है।
पश्चिम ओडिशा में ओराम, मुंडा, खडिया, कुर्मी,व अन्य जाती के लोग भी इस त्यौहार को मनाते है। यह त्यौहार नये अन्न खाने (नुआखाई) के बाद मनाया जाता है कई लोग करम पुजा के बाद नुआखाई मनाते है।