औद्योगिक क्रांति और‌ अपना वजूद खोता मानव

औद्योगिक क्रांति और‌ अपना वजूद खोता मानव

हरहर शम्भू कुमार चौधरी (मुख्य संपादक) 

ये तो सभी जानते है कि भारत गाँव में बसता है और औद्योगिकरण से पहले भारतीय आत्मनिर्भर हुआ करते थे। अपने खानेपिने की चीजें स्वयं खेतों में उगाते थे। अगली फसल के लिए बीज भी वह स्वयं तैयार करते थे। सभी घरों में गाय, भैस, बकरी, जैसे पालतू पशू अधिक संख्या में होते थे। कोई कोई हाथी घोड़े भी रखते थे। दूर सफर और समान ढुलाई के लिए बैलगाड़ी और तांगां एक अच्छी साधन हुआ करता था। जो प्रदुषण मुक्त होने के साथ साथ गाँव के कच्चे रास्तो में चलने के लिए सक्षम था। बैलगाड़ी और तांगा का निर्माण गाँव के ही बढ़ई किया करते थे। सरसों, सूरजमुखी, कुसूम, डोरी, जैसे तिलहन फसलों से तेल निकाला जाता था। तेल निकालने का काम गाँव में ही तेली द्वारा किया जाता था। घर घर में गेहूं पीसने के लिए चक्की हुआ करती थी। मशाला कुटने के लिए ओखल और धान और चूड़ा कुटने के लिए ठेंकी हुआ करती थी।यह सब काम अब मील में होने लगी। घर के आंगन इतने बड़े होते थे कि पूरी बारात आराम से बैठ सकते थे।

किसी के घर में विवाह या धार्मिक उत्सव होने पर हर घर से मेहमानों के लिए खटिया, बिछौना, ओढ़ना और‌ तकिया आता था। गाँव की बेटियां और‌ बहुएं अपने साथ बेलना-चौकी,चाकू, परात आदि लेकर‌ आती थी और पुडी़, शब्जी,खीर, भात बनाने का काम करती थी। जिसके लिए हर घर से अनाज, शब्जी, दूध, दही, शब्जी आदी न्यौता में दिए जाते थै।मेहमानों को मेजबान गाँव वाले धरती पर टाट बिछाकर उसपर बैठा कर गाँव की महिलाओं द्वारा तैयार की हुई हरेपत्तों से बनी पत्तल पर भोजन में अपना प्यार मिलाकर परोश परोश कर खिलाते थे‌, और बीच बीच में उनसे बड़े प्यार से पूछा जाता था कि और कुछ दूं क्या और जबरन एक पूड़ी, मिठाई उनके पत्तल में यह कहकर रख दिया जाता था कि अभी आपने तो कुछ खाया ही नहीं। और भी कुछ रख दिया जाता था यह कहकर कि इसे तो आपने चखा ही नहीं अगर सामने वाला मना करे तो यह कह कर एक और रख दिया जाता था कि हमनें तो देखा ही नहीं, हमारे सामने आपको खाना होगा। और कार्यक्रम संपन्न होने के बाद पूरा गाँव मेहमानों को गाँव के बाहर कुछ दूर तक छोड़ने आते थे। नमस्कार, पायलगी और भेट स्वरूप तोहफे आदान प्रदान किए जाते थे। रिश्तों की यह मिठास अब खोता जा रहा है। 

क्योंकि यह सारे कार्य अब टेंट हाउस और‌ कैटरींग वाले करने लगे है। जो मेहमानों के लिए बफें परोसते है, जहां मेहमानों को पानी तक ढूंढना पड़ता है। 
घर‌ अब फ्लेट हो गए , जहाँ एक छोटी सी जगह पर व्यवस्थित ढंग से लोगों को रहना रास आने लगा है। आंगन एकदम से गायब हो गई। 
आंगन की जगह मैरेज हाल, सामुदायिक भवन और‌ होटलों ने ले ली। सारे अनुष्ठान, शादी व्याह , जन्मदिन सब इन्हीं जगहों पर मनाए जाने लगे। मेहमान आते है खडे़ खडे़ खाते है और‌ उल्टे पांव चले जाते है। इस तरह मेहमान और‌ मेजबान के बीच का भावनात्मक रिश्ता और‌ प्यार एक दम से खत्म हो गया। 
अब लोग नौकरी पेशा हो गए, उन्हे शहरों में रहना भाने लगा। छुट्टी मिली तो आए और नहीं मिली तो नहीं आए। तो कोई मुशकिल से वक्त निकाल कर‌ आया। समय के आभाव में ना किसी से ढंग से मिल पाया और‌ ना ही किसी के साथ वक़्त बिता पाया। 
आपसे एक ही सवाल है, क्या यही जिन्दगी है ? सभ्यता और समाज विहीन।।