एनआईटी में बायोडिग्रेडेबल सीफूड पैकेजिंग का विकास किया गया
प्रेस विज्ञप्ति - एनआईटी राउरकेला ने अपने नवाचार से बायोडिग्रेडेबल सीफूड पैकेजिंग का विकास किया, इसमें बिल्ट-इन स्पॉयलेज सेंसर भी है,
•इस शोध में इंटेलिजेंट पैकेजिंग के विकास में पहली बार कोदो बाजरा (मिलेट) स्टार्च का उपयोग किया गया है।
• कोदो बाजरे के स्टार्च से बनी परत को चुकंदर के छिलके के अर्क के साथ क्रियाशील बनाया गया है, जो 48 घंटों के भीतर अपना रंग लाल (जो ताजे सीफूड को दर्शाता है) से पीले (जो खराब हो चुके सीफूड को दर्शाता है) में बदल देती है। यह उपभोक्ताओं को ताजे और खराब उत्पादों के बीच अंतर करने और सचेत निर्णय लेने में सहायता करता है।
• विकसित की गई यह परत बायोडिग्रेडेबल (जैव विघटनशील) है, जो सतत विकास के लक्ष्यों के अनुरूप है और सीफूड की ताजगी को जांचने का एक गैर-हस्तक्षेपी (non-invasive) तरीका प्रदान करती है।
राउरकेला, 11 अप्रैल 2025 - राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला की एक रिसर्च टीम ने प्रो. प्रीतम सरकार, एसोसिएट प्रोफेसर, खाद्य प्रसंस्करण इंजीनियरिंग विभाग के मार्गदर्शन में एक इंटेलिजेंट फूड पैकेजिंग परत का विकास किया है। इसके लिए प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल सामग्रियों का उपयोग किया गया है। यह पीएच (pH) बदलने से होने वाली प्रतिक्रिया के आधार पर सीफूड की ताजगी की रियल-टाइम निगरानी के लिए डिजाइन की गई है। यह परत खाद्य सुरक्षा बढ़ाने और अपशिष्ट कम करने का व्यावहारिक समाधान बन कर सामने आई है।
यह अभूतपूर्व नवाचार करते हुए रिसर्च टीम ने कोदो बाजरा स्टार्च से पीएच-सेंसिटिव इंटेलिजेंट परत का विकास किया है जिससे सभी प्रकार के सीफूड की ताज़गी की सटीक निगरानी हो सकती है। यह परत आमतौर पर खाद्य पदार्थों की सड़न से संबंधित कम्पाउंड - वाष्प्शील अमीनों का पता लगाने में सक्षम है और रंग में प्रत्यक्ष बदलाव के माध्यम से खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता दर्शाती है।
यह परत कोदो बाजरा (पास्पालम स्क्रोबिकुलैटम) से प्राप्त स्टार्च, गम ट्रागैकैंथ (एक प्राकृतिक पौधे का गोंद) और चुकंदर के छिलके के निचोड़ से विकसित की गई है, जिसमें बीटालेन नामक पीएच-सेंसिटिव पिगमेंट होते हैं। इन प्राकृतिक घटकों की वजह से यह परत बायोडिग्रेडेबल, सुरक्षित और प्रतिक्रियाशील है। इसलिए यह सतत विकास के लक्ष्यों के अनुरूप है और बिना काटे सीफूड की ताज़गी का पता लगाने में सक्षम है।
इस शोध के निष्कर्ष शोधपत्र के रूप में एक जर्नल फूड पैकेजिंग एंड शेल्फ लाइफ में प्रकाशित किए गए हैं। प्रोफेसर प्रीतम सरकार (मुख्य संबद्ध लेखक के रूप में) ने अपने शोध विद्यार्थिओं, श्री राहुल ठाकुर, सुश्री हर्षी सिंघी, श्री वेदसागर राजेश सूर्यवंशी और डॉ. रविचंद्रन संतोष के साथ यह शोधपत्र लिखा है। अन्य सह-लेखकों में एनआईटी राउरकेला के डॉ. खालिद गुल, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के डॉ. स्वरूप रॉय, साउथ डकोटा स्टेट यूनिवर्सिटी, ब्रूकिंग्स, यूएसए के डॉ. श्रीनिवास जनस्वामी और आईआईटी रुड़की के डॉ. कीर्तिराज के. गायकवाड़ शामिल हैं।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है, जो वैश्विक मछली उत्पादन में लगभग 8% का योगदान देता है। यह विश्व स्तर पर झींगा के शीर्ष पांच उत्पादकों में से एक है, जिसमें जमे हुए झींगे भारत का प्रमुख निर्यात उत्पाद हैं। इतने बड़े पैमाने पर समुद्री खाद्य पदार्थों के उत्पादन का महत्व समझते हुए यह जरूरी है कि ताज़गी सुनिश्चित करने और सड़न की समस्या रोकने वाले नवाचार किए जाएं। यही वजह है कि पूरी दुनिया में इंटेलिजेंट पैकेजिंग सिस्टम में दिलचस्पी बढ़ रही है। ये खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की निगरानी रखते हुए उनका संरक्षण सुनिश्चित करते हैं। आम पैकेजिंग सिर्फ सुरक्षा की परत तैयार करते हैं जबकि इससे भिन्न एनआईटी राउरकेला टीम द्वारा विकसित इंटेलिजेंट पैकेजिंग परत अंदर के उत्पाद की स्थिति के बारे में स्पष्ट संकेत देती है। इसलिए इस परत से खाद्य सुरक्षा बढ़ने और अपशिष्ट कम होने की प्रबल संभावना दिखती है।
प्रो. प्रीतम सरकार ने इस शोध प्रक्रिया के बारे में बताया, ‘‘हम ने सबसे पहले कोदो बाजरे को भिगोकर, पीसकर, छानकर और सुखाकर स्टार्च निकाला। चुकंदर के छिलके का निचोड़ अलग से तैयार किया गया और फिर स्टार्च, गम ट्रैगैकैंथ और थोड़ी मात्रा में ग्लिसरॉल के साथ मिला कर परत तैयार की गई। इन्हें सुखाया गया और सीफूड की ताज़गी की निगरानी के लक्ष्य से उनकी पीएच-संेसिटिवटी और प्रभावशीलता का परीक्षण किया गया।’’
चुकंदर के छिलकों में बीटालेन नामक पिगमेंट समूह होता है जो चमकीले रंगों और पीएच-सेंसिटिवटी के लिए जाना जाता है। इन पिगमेंट में एंटीऑक्सीडेंट और एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं इसलिए ये खाद्य पदार्थों से संबंधित उपयोगों के लिए उपयुक्त हैं। मूल रूप से स्टार्च की इस परत में प्राकृतिक कम्पाउंड शामिल किए जाने से बायोडिग्रेडेबल, सुरक्षित और रिस्पांसिव पैकेजिंग मटीरियल तैयार होता है। जब सीफूड खराब होने लगता है और पीएच का स्तर बढ़ जाता है, तो इस परत का रंग बदल जाता है। यह खाद्य पदार्थ की ताज़गी की स्थिति का सूचक है, जो हमें स्पष्ट दिखता है।
इस परत के विकास में कोदो बाजरा स्टार्च और गम ट्रैगैकैंथ चुनने के चलते यह बायोडिग्रेडेबल और पर्यावरण के अनुकूल है। कोदो बाजरा अधिक प्रचलित अनाज नहीं है लेकिन इसमें बेहतरीन परत बनाने के गुण हैं। गम ट्रागैकैंथ के इस्तेमाल से इस मटीरियल की यांत्रिक शक्ति और लचीलापन बढ़ता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसे कृषि उप-उत्पादों के उपयोग से न सिर्फ सतत विकास के लक्ष्य पूरे होंगे बल्कि चुकंदर के छिलके जैसे खाद्य प्रसंस्करण के अपशिष्ट पदार्थ का भी मूल्यवर्धन होगा।
शोध के अगले चरण में यह टीम इस तकनीक के वास्तविक उपयोगों की संभावना तलाशने के लिए समुद्री खाद्य उद्योग के भागीदारों से संपर्क साध रही है। प्रयोगशाला स्तर पर इस परत के उत्पादन की लागत लगभग 900 रुपये प्रति किलोग्राम आंकी गई थी। लेकिन औद्योगिक स्तर पर उत्पादन करने से यह लागत 400 रुपये से 600 रुपये प्रति किलोग्राम होने का अनुमान है। इस तरह यह परत व्यावसायिक उपयोग का बेहतर विकल्प बन सकता है।
Research paper link https://www.sciencedirect.com/science/article/abs/pii/S2214289424001704





