आस्था संघर्ष और जनसहयोग की गाथा कांसबहाल का श्री जगद्धात्री मंदिर

आस्था संघर्ष और जनसहयोग की गाथा कांसबहाल का श्री जगद्धात्री मंदिर

सतीश शर्मा (उप संपादक) 

कहते हैं, जहां श्रद्धा होती है, वहां ईश्वर का वास होता है। मंदिर केवल ईंट-पत्थरों से खड़ा कोई भवन नहीं होता, बल्कि वह भक्तों की आस्था, तपस्या, त्याग और सामूहिक संकल्प का साकार रूप होता है। किसी मंदिर की भव्यता उसके शिखर और स्थापत्य से जितनी दिखाई देती है, उससे कहीं अधिक उसकी नींव में छिपी उन अनगिनत श्रद्धाओं में होती है, जिन्होंने उसे आकार दिया। कांसबहाल के राज्य राजमार्ग-10 (बीजू एक्सप्रेसवे) के किनारे महताब रोड पर स्थित श्री जगद्धात्री मंदिर ऐसी ही अटूट आस्था और सामूहिक साधना की कहानी कहता है। आज यहां मां जगद्धात्री के साथ मां लक्ष्मी-नारायण, भगवान शिव, शनिदेव और पंचमुखी श्रीहनुमान श्रद्धालुओं को अपनी कृपा और आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं।  मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही एक ऐसी आध्यात्मिक अनुभूति होती है, जिसमें वर्षों की भक्ति, संघर्ष और जनसहयोग की गाथा मानो जीवंत हो उठती है।

भजन-कीर्तन से जागा मंदिर का संकल्प
इस मंदिर की कहानी वर्ष 1989 से शुरू होती है। गांधी कॉलोनी में कुछ श्रद्धालुओं ने भजन मंडली का गठन किया। नियमित रूप से होने वाले भजन-कीर्तन और धार्मिक आयोजनों ने लोगों के मन में देवी के एक स्थायी मंदिर की स्थापना का भाव जगाया।
भक्ति का यह भाव धीरे-धीरे संकल्प में बदलने लगा। लोगों ने मिलकर देवी का मंदिर बनाने का निर्णय लिया। 27 जनवरी 1991 को मां जगद्धात्री की प्रतिमा का उद्धार किया गया।और उसी वर्ष उसे गांधी कलोनो के लक्ष्मी नारायण मंदिर में मंदिर में स्थापित कर दिया गया। 

 जब सात भक्तों ने देखा एक जैसा स्वप्न
मंदिर के इतिहास में 22 दिसंबर 1992 की रात का विशेष स्थान है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, उस रात सात श्रद्धालुओं को एक समान स्वप्न आया कि मां जगद्धात्री की प्रतिमा को वंहा से लाकर वर्त्तमान मंदिर स्थल पर स्थापित किया जाए।  इस स्वप्न ने श्रद्धालुओं के मन में मंदिर निर्माण के संकल्प को और दृढ़ कर दिया। तत्काल एक बैठक कर मंदिर निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया। जिस जगह मंदिर बनने का स्वप्न में आदेश हुआ उसे एक निजी कंपनी अपनी भूमि होने का दावा कर रही थी। इसे लेकर थोड़ा विवाद भी हुआ।
परंतु भक्तों की आस्था को किसी प्रशासनिक आदेश से विचलित नहीं किया जा सका। उनके लिए यह केवल मंदिर निर्माण का प्रयास नहीं था, बल्कि मां के प्रति समर्पण और विश्वास का विषय था।
,27 दिसंबर 1992, श्रद्धालुओं ने भव्य शोभायात्रा निकाली और मां जगद्धात्री की प्रतिमा को वर्तमान मंदिर स्थल पर स्थापित कर दिया।
इसके साथ मंदिर की आध्यात्मिक यात्रा का नया अध्याय शुरू हुआ।
छोटी-सी झोपड़ी से भव्य मंदिर तक
श्रद्धालुओं के सामूहिक सहयोग से अत्यंत छोटे झोपड़ी नुमा रूप में  मंदिर की शुरुआत हुई। चापधारी मिश्र को प्रथम पुजारी बनाया गयाऔर कुछ लोगों नियमित पूजा-अर्चना की व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाली । वहीं से आरंभ हुई पूजा और सेवा की परंपरा आज एक विस्तृत मंदिर परिसर का रूप ले चुकी है। मंदिर निर्माण को नई दिशा मिली 7 जून 1994 को, जब पुरी के शंकराचार्य ने मंदिर का शिलान्यास किया। इसके बाद मंदिर के निर्माण और विकास का कार्य निरंतर आगे बढ़ता गया। अक्षय तृतीया, 2003 को मंदिर में भव्य प्राण-प्रतिष्ठा समारोह आयोजित किया गया। यह अवसर मंदिर के इतिहास में एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पड़ाव बन गया। इसके बाद भी मंदिर का विकास रुका नहीं। समय के साथ मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अन्य निर्माण कार्य भी हुए। 

मंदिर की शक्ति है जनसहयोग

आज मंदिर की व्यवस्था मां श्री जगद्धात्री सेवा परिषद के नाम से गठित आठ सदस्यीय ट्रस्ट द्वारा संचालित की जा रही है।
मुख्य ट्रस्टी पी. एन. प्रसाद के अनुसार, मंदिर परिसर की कुछ दुकानों से किराये के रूप में आय होती है, लेकिन यह मंदिर की समस्त व्यवस्थाओं के लिए पर्याप्त नहीं है। श्रद्धालुओं द्वारा दिए जाने वाले अनुदान से भी मंदिर की गतिविधियों को सहयोग मिलता है। आवश्यकता पड़ने पर ट्रस्ट के सदस्य स्वयं मिल-जुलकर खर्च की कमी पूरी करते हैं।
यही जनसहयोग इस मंदिर की सबसे बड़ी शक्ति है। किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि अनेक श्रद्धालुओं के छोटे-बड़े योगदान ने इस मंदिर को आकार दिया है।
मंदिर की स्थापना से जुड़े चापधारी मिश्र इस यात्रा को ईश्वर की कृपा का परिणाम मानते हैं। उनका कहना है—“यह मंदिर प्रभु की कृपा से स्थापित हुआ है। शुरुआत में बहुत कठिनाइयां आईं, लेकिन ईश्वर ही उनका समाधान भी करते गए। आज यह हमारे क्षेत्र में आस्था का एक प्रमुख केंद्र बन गया है। इसके निर्माण में बहुत से लोगों का परिश्रम लगा है। सभी लोगों पर प्रभु की असीम अनुकंपा बनी रहे, यही हमारी मंगलकामना है।”

पूरे वर्ष गूंजता है भक्ति का स्वर
श्री जगद्धात्री मंदिर में वर्ष भर धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजनों की श्रृंखला चलती रहती है। दोनों नवरात्र, शीतल षष्ठी, जन्माष्टमी, अष्टप्रहरी, शनि जयंती और जगद्धात्री पूजा जैसे पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए जाते हैं। विशेष पर्वों के अवसर पर मंदिर परिसर भक्तों से भर जाता है। घंटियों की ध्वनि, शंखनाद, मंत्रोच्चार और भजन-कीर्तन से वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु मां जगद्धात्री के दर्शन कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
आस्था की ज्योति आज भी प्रज्वलित
गांधी कॉलोनी की एक छोटी-सी भजन मंडली से शुरू हुई यह यात्रा आज एक ऐसे मंदिर के रूप में सामने है, जो कांसबहाल के धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भव्यता नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी सामूहिक आस्था है। किसी ने श्रम दिया, किसी ने धन दिया, किसी ने सेवा की और किसी ने अपनी श्रद्धा अर्पित की। इन सभी प्रयासों ने मिलकर मां जगद्धात्री के इस मंदिर को आकार दिया। यह मंदिर सभी श्रद्धालुओं के समर्पण की साक्षी है, जिन्होंने इस मंदिर के निर्माण में अपना योगदान दिया। इस मंदिर की कहानी बताती है कि जब मन में विश्वास हो, हृदय में भक्ति हो और समाज एकजुट होकर किसी पवित्र कार्य के लिए आगे बढ़ता है तो कठिनाइयां भी अंततः मार्ग छोड़ देती हैं।