आर्य अनार्य की लड़ाई सोशल मीडिया पर गाली गलौज तक पहुंचा जिम्मेदार कौन

कुएं का पानी सिर के ऊपर 

आर्य अनार्य की लड़ाई सोशल मीडिया पर गाली गलौज तक पहुंचा जिम्मेदार कौन

भारत में विचार अब बहस नहीं रहे, बम बन गए हैं। आर्य बनाम अनार्य, आर्य बनाम द्रविड़, मूलनिवासी बनाम विदेशी। यह विमर्श कुएं में था। प्रोफेसरों की क्लास में, किताबों के फुटनोट में। आज यह सिर के ऊपर बह रहा है। सोशल मीडिया पर हर दूसरा लड़का इतिहासकार है और हर तीसरा लड़का तलवार लेकर खड़ा है। सवाल सीधा है। यह आग लगी कैसे? किसने माचिस जलाई? किसने तेल डाला?

सबसे पहले कटघरे में खड़ा करो राहुल सांकृत्यायन को। महापंडित कहते हो, तो सुनो। तीस भाषा का ज्ञानी थे, पर ज्ञान को जहर बनाने का काम भी उन्होंने ही किया। _वोल्गा से गंगा_ लिखी। 1942 में जेल में बैठकर कहानी गढ़ी। वोल्गा के किनारे से आर्य चले। घोड़े पर सवार होकर आए। हड़प्पा उजाड़ा। द्रविड़ों को हराया। दक्षिण भगाया। शूद्र बनाया। यह मैक्समूलर की थ्योरी थी। अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति थी। राहुल जी ने उसे मार्क्स का कुर्ता पहना दिया। आर्य को शासक वर्ग बना दिया। द्रविड़ को शोषित वर्ग। इतिहास को वर्ग-संघर्ष बना दिया। और सबसे बड़ा अपराध यह किया कि अंग्रेजी की थ्योरी को हिंदी में परोसा। कहानी बनाकर। किसान के घर पहुंचा दी। छात्र के बस्ते में डाल दी। पहली बार हिंदी पट्टी के लड़के ने पढ़ा कि तू हारा हुआ है। तेरा दुश्मन चार हजार साल से तेरे ऊपर बैठा है। जगाने के नाम पर जहर घोल दिया। राहुल सांकृत्यायन वामपंथ के स्तंभ थे। सीपीआई के मेंबर थे। लेनिन पुरस्कार लिया था। मकसद भले नेक रहा हो, नतीजा देश के टुकड़े करने वाला निकला।

दूसरे नंबर पर   कांग्रेस पार्टी खड़ी है। अंग्रेज चले गए पर उनकी नीति छोड़ गए। कांग्रेस ने उसे लपक लिया। आजादी के बाद एनसीईआरटी बनी। रोमिला थापर बैठीं। आरएस शर्मा बैठे। बिपिन चंद्रा बैठे। सबने मिलकर _वोल्गा से गंगा_ को सत्य का सर्टिफिकेट दे दिया। कक्षा छह का बच्चा पढ़ने लगा। आर्य बाहर से आए। आक्रमण किया। मूलनिवासियों को गुलाम बनाया। बीज यहीं पड़ा। फिर मंडल आया। जाति को हथियार बनाया। तर्क क्या दिया? हजार साल का शोषण हुआ है। किसने किया? आर्यों ने। कौन आर्य? ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया। कांग्रेस ने वामपंथी शिक्षाविदों को पालना। जेएनयू बनाया। आईसीएचआर बनाया। वहां से डिग्री लेकर निकला इतिहासकार टीवी पर बैठकर बोलने लगा। मूलनिवासी का सिद्धांत फैलाने लगा। दक्षिण में हिंदी विरोध हुआ तो कांग्रेस चुप रही। मान लिया कि उत्तर आर्य है, दक्षिण द्रविड़ है। बांटने का काम सत्ता ने किया। वोट के लिए देश की आत्मा बेच दी।

तीसरे कटघरे में पूरा वामपंथी गिरोह और उसके पाले हुए शिक्षाविद इतिहासकार हैं। इनका काम था तोड़ना। हर चीज को आर्य बनाम द्रविड़ में बदल दिया। रामायण उठाओ तो राम आर्य आक्रमणकारी हो गया। रावण द्रविड़ राजा हो गया। महिषासुर पूज्य हो गया। दुर्गा आक्रमणकारी हो गई। हड़प्पा द्रविड़ सभ्यता हो गई। वैदिक सभ्यता विदेशी हो गई। सबूत मांगा तो कह दिया कि ब्राह्मणों ने जला दिया। डीएनए आया तो मुंह छुपा लिया। राखीगढ़ी की रिपोर्ट 2019 में आई। साढ़े चार हजार साल पुराने कंकाल में स्टेपी जीन शून्य मिला। मतलब हड़प्पा वाले यहीं के थे। बाहर से कोई नहीं आया। पर ये गिरोह चुप रहा। क्योंकि सच बोलते ही दुकान बंद हो जाती। इनका इतिहास अनुसंधान नहीं था। राजनीतिक प्रोजेक्ट था। जनता को लड़ाओ, कुर्सी बचाओ।

चौथा मुलजिम सिनेमा है। बंबई का सिनेमा। साठ साल से एक ही स्क्रिप्ट चला रहा है। ठाकुर हमेशा अत्याचारी। मूंछ पर ताव देता हुआ। गरीब की इज्जत लूटता हुआ। ब्राह्मण हमेशा हास्यकारी। लालची, धूर्त, पाखंडी। जनेऊ हिलाता हुआ, दक्षिणा मांगता हुआ। और शूद्र? शूद्र हमेशा दबा कुचला। रोता हुआ। मजबूर। सिस्टम का मारा। वही गांव जलाता है ठाकुर। वही मंदिर में जाने से रोकता है ब्राह्मण। वही पुलिस बुलाता है बनिया। फिर आता है हीरो। अक्सर निचली जाति से। या फिर एंग्री यंग मैन। वह अकेला सिस्टम से लड़ता है। यह स्क्रिप्ट किसने लिखी? वही वामपंथी लेखक। वही कांग्रेसी सोच। सलीम-जावेद से लेकर अनुराग कश्यप तक। शोले का ठाकुर याद करो। लगान का कचरा याद करो। आर्टिकल 15 याद करो। हर जगह विलेन की जाति तय है। हर जगह पीड़ित की जाति तय है। सिनेमा ने समाज नहीं दिखाया। समाज को गढ़ा। नफरत बोई। उत्तर भारत में ठाकुर-ब्राह्मण के खिलाफ जहर भरा। दक्षिण में पहले से था। पेरियार ने रामायण जलाई थी। डीएमके ने ब्राह्मण भगाए थे। हिंदी सिनेमा ने उत्तर में वही काम किया।

नतीजा क्या हुआ? सोशल मीडिया आ गया। अब हर हाथ में स्क्रीन है। ट्विटर पर ट्रेंड चलता है यूरेशियन ब्राह्मणों भारत छोड़ो। यूट्यूब पर वीडियो है डीएनए प्रूफ ब्राह्मण विदेशी। इंस्टा रील पर महिषासुर एंथम बज रहा है। नवरात्रि में दुर्गा का विरोध। दशहरे पर रावण जिंदाबाद। शादी टूट रही हैं। मोहल्ले बंट रहे हैं। लड़का नौकरी पर जाता है तो पूछा जाता है तुम आर्य हो या मूलनिवासी। यह अब विचार नहीं रहा। पहचान बन गया। गाली बन गया। युद्ध बन गया।

सच क्या है? सच यह है कि आर्य नस्ल नहीं थी। भाषा का परिवार था। द्रविड़ भी भाषा का परिवार था। खून सबका मिला हुआ है। उत्तर भारतीय के डीएनए में तीस प्रतिशत दक्षिण का अंश है। दक्षिण भारतीय के डीएनए में बीस प्रतिशत उत्तर का अंश है। हम सब संकर हैं। राखीगढ़ी बोल रही है कि कोई आक्रमण नहीं हुआ। डेविड राइक बोल रहा है कि प्रवास हुआ, युद्ध नहीं। हड़प्पा की सील पर योगी बैठा है। वही योगी काशी में बैठा है। संस्कृति टूटी नहीं, बहती रही। गंगा की तरह।

पर सच से किसको मतलब। राहुल सांकृत्यायन ने लकीर खींची। कांग्रेस ने उस पर दीवार बना दी। वामपंथियों ने उस पर करंट दौड़ा दिया। सिनेमा ने उस दीवार पर पोस्टर चिपका दिए। ठाकुर को विलेन बना दिया। ब्राह्मण को जोकर बना दिया। शूद्र को सिर्फ रोता हुआ दिखाया। कभी यह नहीं दिखाया कि चंद्रगुप्त मौर्य शूद्र था। कभी नहीं दिखाया कि वेदव्यास मछुआरिन का बेटा था। कभी नहीं दिखाया कि सुहेलदेव पासी था। क्योंकि दिखाते तो कहानी फेल हो जाती। एजेंडा फेल हो जाता।

अब बाढ़ सिर के ऊपर है। इलाज क्या है? पहला काम। एनसीईआरटी की किताब फाड़ो। आर्य आक्रमण शब्द हटाओ। बच्चों को बताओ कि तुम सिंधु के वारिस हो। तुम हारे हुए नहीं हो। दूसरा काम। सिनेमा की स्क्रिप्ट बदलो। विलेन की जाति मत लिखो। हीरो की जाति मत लिखो। कहानी लिखो। तीसरा काम। सोशल मीडिया पर सच की रील बनाओ। डीएनए दिखाओ। राखीगढ़ी दिखाओ। चौथा काम। नेताओं का मुंह बंद करो। जो वोट के लिए आर्य-द्रविड़ करे, उसे सत्ता से बाहर करो।

राहुल सांकृत्यायन से नफरत नहीं है। उनकी यायावरी सलाम है। उनकी विद्वता सलाम है। पर उनकी थ्योरी कब्र में दफन करो। वह अंग्रेजों की थी। वह झूठ थी। कांग्रेस ने उसे पाला। वामपंथ ने उसे बेचा। सिनेमा ने उसे भुनाया। और आज हम सब भुगत रहे हैं।

कुएं का पानी अब सिर तक आ गया है। डूबना है या तैरना है, फैसला तुम्हारा है। डूबे तो देश डूबेगा। तैरे तो एक नाम बचेगा। भारत।